बुधवार, 18 जनवरी 2017

भगवान ने जब स्वयं अपने हाथों से श्लोक को पूरा लिखा

श्रीजयदेव जी भगवान श्रीकृष्ण के प्रेमी भक्त थे।  आपके हृदय में श्रीकृष्ण प्रेम हिलोरें लेता रहता था। उसी प्रेम के ओत-प्रोत होकर आपने अमृत-रस के समान 'गीत-गोविन्द' नामक ग्रन्थ की रचना करनी प्रारम्भ की। ऐसे में एक दिन मान-प्रकरण में आप, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण श्रीमती राधा - रानी के पैर पकड़ेंगे, इस बात को लिखने का साहस नहीं कर पाये। 

उसी उधेड़बुन में आप नदी में स्नान करने चले गये। आपको स्नान जाते हुए देख, भगवान श्रीकृष्ण स्वयं, जयदेव जी के रुप में आपके घर में प्रवेश करने लगे।

आपकी पत्नी आपको इतनी शीघ्रता से अन्दर आता देख बोली -- 'अभी-अभी तो आप स्नान करने गये थे, और इतनी जल्दी आप वापिस कैसे आ गये?'

जयदेव रूपी भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया -- 'जाते-जाते एक बात मन 
में आ गई । बाद में कहीं भूल न जाऊँ, इसलिए लिखने आ गया। '

जयदेव रूपी भगवान श्रीकृष्ण ने भीतर जाकर, उन लिखे हुए पन्नों पर 'देहि पद पल्लवमुदारं' --- लिख कर कर उस श्लोक को पूरा कर दिया।

कमरे से बाहर आ कर जयदेव रूपी भगवान श्रीकृष्ण ने कहा --' अच्छा बहुत भूख लगी है। खाने के लिए कुछ है ? '

श्रीमती पद्मावती जी ने आसन बिछाया, आपको बिठाया और ठाकुर को अर्पित किया हुआ भोग, आपके आगे सजाया। भगवान रूपी जयदेव उसे 
खाने लगे। कुछ देर बाद हाथ धोकर, अन्दर विश्राम को चले गए।

श्रीमती पद्मावती जी अभी पति द्वारा छोड़ा हुआ प्रसाद पाने बैठी ही थीं की किसी ने दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने उठ कर द्वार खोला तो देखा जयदेव जी खड़े हैं। बड़ी हैरानी से बोलीं --'अभी आप स्नान से आये, कुछ लिखा, प्रसाद पाया, विश्राम के लिए भीतर चले गये ---------- मेरे मन में कुछ सन्देह होता है कि वो कौन थे और आप कौन हैं?'

परम भक्त जयदेव जी सब समझ गये। आप शीघ्रता से घर के भीतर गये 

। आपका सारा ध्यान उस अधूरे श्लोक की ओर था जिसे आप आधा लिखा छोड़ कर गये थे। आप अपनी पोथी खोल कर दिव्य अक्षरों का दर्शन करने लगे। रोमांच हो आया आपको तथा प्रेमावेश में आपका हृदय उमड़ आया। आपकी आँखों से अश्रु-धारायें प्रवाहित होने लगीं। आपने अपनी पत्नी से कहा --'पहले मैं नहीं आया था, मेरे रूप में श्रीकृष्ण आये और उन्होंने वो श्लोक पूरा किया। तुम धन्य हो, तुम्हारा जीवन सार्थक है । तुमने श्रीकृष्ण का दर्शन किया और अपने
हाथों से भोजन करवाया।'

श्रीजयदेव गोस्वामी जी की जय !!!!!

रविवार, 15 जनवरी 2017

क्या है श्रीकृष्ण और श्रीनारायण में अन्तर?

एक बार भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी दक्षिण भारत के श्रीरंग क्षेत्र में गये। वहाँ पर श्री महाप्रभु जी ने श्रीवैंकट भट्ट जी के घर में रहने का निर्णय लिया। श्रीवैंकट भट्ट, श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी जी के पिताजी हैं। जब श्रीमहाप्रभु वहाँ पर गये तब श्रीगोपाल भट्ट अभी छोटी आयु के बालक थे।
अन्तर्यामी भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी श्रीवैंकट भट्ट और उनके परिवार के लोगों की सेवा से सन्तुष्ट थे, परन्तु श्रीमहाप्रभु जी ने यह जान लिया था कि श्रीवैंकट भट्ट जी के मन में कुछ अभिमान है। श्रीवैंकट भट्ट 
जी कुछ ऐसा सोचते थे की श्रीनारायण ही सर्वोत्तम आराध्य हैं। श्रीनारायण अवतारी हैं और श्रीकृष्ण, श्रीराम, श्रीनृसिंह, आदि उनके अवतार हैं क्योंकि श्रीनारायण का जन्म नहीं होता। जबकि श्रीकृष्ण व श्रीराम का जन्म होता है। श्रीचैतन्य महाप्रभु तो श्रीनारायण के अवतार श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं, जबकि वे स्वयं अवतारी श्रीनारायण की पूजा करते हैं।

दर्पहारी भगवान मधुसूदन जी सबके अभिमान (दर्प) का नाश कर देते हैं।

एक दिन श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने मज़ाक-मज़ाक में ही श्रीवैंकट भट्ट से कहा, 'देखो भाई वैंकट ! आपके आराध्य श्रीनारायण के समान ऐश्वर्य किसी और का नहीं है। आपकी आराध्य लक्ष्मी देवी तो ऐश्वर्य की देवी हैं। उनके ऐश्वर्य की भी भी कोई तुलना नहीं है।  और इसके विपरीत मेरे आराध्य श्रीकृष्ण का कोई ऐश्वर्य नहीं है, वे तो जंगल के फूलों की माला और मोर का पंख आदि धारण किये रहते हैं । वे नन्द ग्वाले के पुत्र हैं, ग्वाल-बालकों के साथ जंगल में बछड़े चराते हैं। मेरी आराध्य गोपियों का भी कोई ऐश्वर्य नहीं है, वे दरिद्रा हैं, ग्वालिनें हैं। मैं आपसे एक प्रश्न करना चाहता हूँ कि आपकी आराध्य लक्ष्मी देवी ने श्रीकृष्ण के संग की इच्छा से, श्रीकृष्ण की रास लीला में प्रवेश करने के 
लिए वृन्दावन के श्रीवन में तपस्या क्यों की थी?'

श्रीवैंकट भट्ट जी ने साथ-साथ ही बोला, 'इसमें दोष क्या है, जो लक्ष्मीपति नारायण हैं, वे ही राधापति कृष्ण हैं।'

सिद्धान्तस्त्व भेदेऽपि श्रीश-कृष्ण-रूपयो: । 
रसेनोत् कृष्यते कृष्णरूप मेषा रस स्थिति: ॥

(श्रीकृष्ण में अधिक रस होने के कारण ही लक्ष्मी देवी जी ने श्रीकृष्ण का संग प्राप्त करने की लालसा की थी)

श्रीमन्महाप्रभु जी ने कहा, 'मैं दोष की बात नहीं करता। श्रीकृष्ण और श्रीनारायण के तत्त्व में कोई भेद नहीं है। एक ही हैं, बस रस का अन्तर है। माधुर्य लील में जो श्रीकृष्ण हैं, ऐश्वर्य लील में वे ही श्रीनारायण हैं। श्रीकृष्ण की लीला में जो श्रीमती राधिका हैं, वे ही श्रीनारायण की लीला में श्रीमती लक्ष्मी हैं। इसलिये श्रीकृष्ण के संग की इच्छा से तपस्या करने पर भी श्रीलक्ष्मी देवी जी के सतीत्त्व की हानि नहीं हुई थी। फिर भी श्रीकृष्ण के संग की लालसा से उन्होंने वृन्दावन में तपस्या की थी।'

आप से मेरा यह दूसरा प्रश्न है, 'श्रीलक्ष्मी देवी जी ने तपस्या करने पर भी श्रीकृष्ण की रास लीला में प्रवेश का अधिकार क्यों नहीं पाया?'
श्रीवैंकट भट्ट इसका कोई उत्तर न दे पाये और उत्तर न दे सकने पर बहुत दु:खी हुये।

श्रीमन्महाप्रभु जी ने श्रीवैंकट भट्ट का दु:ख दूर करने के लिये तसल्ली देते हुए कहा, 'अरे, आपने स्वयं ही तो कहा था कि सिधान्ततः श्रीलक्ष्मीपति नारायण और श्रीराधापति कृष्ण में कोई भेद नहीं है। तब भी श्रीकृष्ण में रसोत्कर्षता अधिक है। श्रीनारायण कें ढाई रसों की अभिव्यक्ति है जबकि नन्दनन्दन श्रीकृष्ण में पाँच मुख्य और सात गौण रस, परिपूर्ण मात्रा में हैं। ऐश्वर्य विग्रह श्रीनारायण के लिये ऐश्वर्यमयी श्रीमती लक्ष्मी जी हैं। वे श्रीमती लक्ष्मी जी ही माधुर्य लीला पुष्टि के लिये श्रीमती राधिका जी हैं। '

'श्रीमती रधिका और गोपियों के आनुगत्य के बिना श्रीकृष्ण के माधुर्य का आस्वादन नहीं हो सकता। लक्ष्मी देवी जी ने गोपियों का अनुगत्य नहीं किया और ऐश्वर्य भाव लेकर तपस्या की, इसलिये बार-बार उन्हें भगवान नारायण का ही संग मिला, श्रीकृष्ण का संग प्राप्त नहीं हो सका। इसके विपरीत श्रुतियों ने गोपियों का आनुगत्य करके, राग-मार्ग से भगवान श्रीकृष्ण की सेवा प्राप्त की थी।'

'श्रीकृष्ण का एक सजीव लक्षण यह है कि वे अपने माधुर्य से सभी जीवों के चित्तों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। व्रजवासियों के भाव के अनुसार श्रीकृष्ण के चरणों की प्राप्ति होती है। कारण, व्रजवासी श्रीकृष्ण को ईश्वर के रूप में नहीं मानते। कोई-कोई उनको पुत्र मानकर ऊखल से बान्धते हैं तो कोई उनको सखा समझकर उनके कन्धों पर चढ़ते हैं। ऐश्वर्य ज्ञान से वे उनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं जोड़ते। जो व्रजवासियों के भाव के अनुसार उनका भजन करेगा, वह ही व्रज में वास्तविक रूप से व्रजेन्द्रनन्दन को प्राप्त करेगा।'

'रासलीला के दौरान, श्रीकृष्ण के अन्तर्ध्यान होने पर, मेरी आराध्या 
गोपियों ने व्याकुल भाव से श्रीकृष्ण के लिए विलाप किया था, जिस पर श्रीकृष्ण उनके सामने चतुर्भुज नारायण के रूप में प्रकट हुये। गोपियाँ, श्रीनारायण का संग करने की बात तो दूर, वहाँ ठहरी भी नहीं, उनको प्रणाम करके चली गईं। किन्तु श्रीमती राधा-रानी जी के वहाँ उपस्थित होने से श्रीकृष्ण की दो भुजायेँ गायब हो गयीं और वे दो भुजा वाले मुरलीधर के रूप में प्रकट हो गये। उस स्थान को इसी कारण से पौसधाम या पैठधाम बोलते हैं। यह स्थान गोवर्धन के निकट है। नन्दनन्दन श्रीकृष्ण ही अवतारी हैं तथा श्रीनारायण, श्रीराम, श्रीनृसिंह, आदि उनके अवतार हैं।'

'यांर भगवत्ता हइते अन्येर भगवत्ता।
स्वयं भगवान् बलिते तांहातेइ सत्ता॥'

'एते चांश कलाः पुंस कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।
इन्द्रारि व्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे॥' (भा .1/3/28)

(जिनकी भगवत्ता से दूसरों की भगवत्ता होती है, उनको ही स्वयं भगवान् कहते हैं, क्योंकि उनसे ही सबकी सत्ता है।)

श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु जी की कृपा से, उनके संग के प्रभाव से श्रीवैंकट 
भट्ट, उनके भाई श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती जी, श्रीवैंकट भट्ट के पुत्र श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी तथा अन्य परिवार के सदस्य श्रीलक्ष्मीनारायण जी की उपासना छोड़ कर सम्पूर्ण रूप से श्रीराधा-कृष्ण जी की उपासना में लग गये और श्रीराधा-कृष्ण जी के एकान्तिक भक्त हो गये।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी जी ने अपने ग्रन्थ ' श्रीगौरपार्षद गौड़ीय वैष्णाचार्यों के संक्षिप्त चरितामृत ' में बताया है की श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी जी भगवान श्रीकृष्ण की लीला में विलास मंजरी हैं।

श्रील गोपाल भट्ट गोस्वामी जी की जय !!!!!

शनिवार, 14 जनवरी 2017

केवल एक पुण्य के बल पर जीवात्मा ने बनाया यमराज, इन्द्र, ब्रह्मा अौर शिव जी को अपना कहार

एक गांव में दो भार्इ रहते थे। दोंनों के स्वाभाव में बहुत अतंर था। बड़ा भार्इ साधु-सेवी एंव भगवान के भजन में रुची रखने वाला था। दान-पुण्य करने वाला एंव सरल हृदय वाला था। छोटा भार्इ अच्छे स्वभाव का था परंतु व्यापारी मस्तिष्क का था। उसे साधु-सेवा, भजन अौर दान देना अच्छा नहीं लगता था। अत: वह बड़े भार्इ से सहमत न था। उग्र-विरोध तो नहीं करता था पर समय-समय पर अपनी असहमति प्रकट करता था, बड़े भार्इ को इस बात का दुख था कि उसका छोटा भार्इ मानव जीवन के वास्तविक लक्ष्य श्री भगवान की प्राप्ति में रुचि न रख कर दुनियादारी में ही व्यस्त है। बड़े भार्इ की अच्छी नीयत थी। वह समय-समय पर उसे नम्रता व युक्तियों से समझाता था अौर दूसरे अच्छे लोगों से भी कहलवाता, उपदेश दिलवाता पर छोटे भार्इ पर कोर्इ प्रभाव नहीं होता।
एक बार उनके गुरु जी अपनी शिष्य मण्डली सहित उनके गांव में अाए तो बड़ा भार्इ उनको अपने घर भिक्षा (भोजन) कराने की इच्छा से निमंत्रण देने पहुंचा। वहां बात ही बात में उसने अपने छोटे भार्इ की स्थिति बतलार्इ तो गुरु जी ने न जाने क्या विचार कर कहा कि तुम एक काम करना जिस दिन तुम्हारा छोटा भार्इ घर में रहे उस दिन हमें भोजन के लिए बुलाना अौर हमें लाने अौर वापिस भिजवाने के समय बाजा साथ रखना। तुम्हारा छोटा भार्इ जो करे उसे करने देना, शेष सारी व्यवस्था हम कर लेंगे। 
गरु जी की अाज्ञानुसार सारी व्यवस्था हुर्इ। बजते हुए बाजे के साथ उनके गुरुजी शिष्यमण्डली सहित अा रहे थे। उस दिन घर में ज्यादा रसोर्इ बनते देखकर छोटे भार्इ ने बड़े भार्इ से पुछा कि," रसोर्इ किसके लिए बन रही है?" 
तब बड़े भार्इ ने कहा," अाज हमारे गुरु जी शिष्यमण्डली सहित हमारे यहां बाजे-गाजे के साथ भोजन के लिए अा रहे हैं।"
छोटे भार्इ को ये बात बहुत बुरी लगी। उसने कहा अाप जो यह सब चीजें करते हैं, मुझे तो अच्छी नहीं लगती, अाप बड़े हैं, जो चाहें सो करें किंतु मैं ये सब देख भी नहीं सकता इसलिए मैं कमरे में किवाड़ बंद करके बैठ जाता हूं। इससे किसी प्रकार का कलह-क्लेश होने से बच जाएगा। जब जाएंगे तब बाहर निकलूंगा। इतना कहकर उसने कमरे में जाकर अंदर से किवाड़ बंद कर लिए।
गुरु जी अाए, उन्होंने सब बातों को जान कर कमरे को बाहर से सांकल लगवा दी। भोजन सम्पंन हुअा। फिर गुरुजी ने अपनी सारी मण्डली को बाजे-गाजे के साथ लौटा दिया अौर स्वंय उस कमरे के पास खड़े हो गए।
जब लौटते हुए बाजे की अंदर से अावाज सुनी तब छोटे भार्इ ने समझा कि सब चले गए अौर अंदर की सांकल हटा कर किवाड़ खोलने चाहे किंतु वे बाहर से बंद थे। उसने जोर लगाया तथा बार-बार पुकार कर कहा,"बाहर से दरवाजा किसने बंद किया। जल्दी खोलो।"
गुरु जी ने किवाड़ खोले एवं उसके बाहर निकलते ही उसके हाथ की कलार्इ जो़र से पकड़ ली। गुरु
जी बलवान थे इसलिए वह चेष्टा करके भी न छुड़ा सका तो गुरु जी ने मुस्कराते हुए कहा,"भैया! हाथ छुड़ाना है तो एक बार "राम" कहो।"
उसने अावेश में अाकर कहा मैं यह नहीं कहूंगा। गुरु जी बोले तब तो हाथ नहीं छूटेगा। क्रोध अौर बल का पूरा प्रयोग करके भी जब वह हाथ न छुड़ा सका तो उसने कहा अच्छा 'राम' । छोड़ो हाथ जल्दी अौर भागों यहां से। गुरु जी मुस्कराते हुए यह कह कर बाहर चले गए। तुमहे 'राम' कहा तो बड़ा अच्छा किया पर मेरी बात याद रखना इस 'राम' नाम को किसी कीमत पर कभी बेचना मत। 
यह घटना तो हो गर्इ किंतु कोर्इ विशेष अंतर नहीं अाया। समय अाने पर दोनो भार्इयों की मृत्यु हो गर्इ। विषय वासना अौर विषय कामना वाले लोग विवेकभ्रष्ट हो जाते हैं अौर जाने-अनजाने में छोटे-बड़े पाप करते रहते हैं, पाप का फल तो भोगना ही पड़ता है। मरने के बाद जब छोटे भार्इ की अात्मा को यमलोक ले जाया गया अौर वहां कर्म का हिसाब-किताब देख कर चित्रगुप्त ने बताया कि इस जीव ने मनुष्य योनि में केवल साधु-अवज्ञा ही नहीं बल्कि भजन का विरोध एवं बड़े-बड़े पाप किए हैं पर इसके दृारा एक महान कार्य भी हुअा है। इसकी जिहृा से एक महात्मा के सम्मुख एक बार जबरदस्ती 'राम' नाम का उच्चारण हुअा है।
यमराज ने यह सुन कर मन ही मन उसके प्रति श्रद्धा प्रकट की अौर कहा इस राम नाम के बदले अाप जो चाहे मांग लो, फिर अाप को पापों का फल भोगना पड़ेगा। उसे साधु की कही बात याद अा गर्इ कि इसे किसी भी कीमत पर बेचना मत। उसने कहा कि मैं 'राम' नाम बेचना नहीं चाहता किंतु इसका मुल्य जानना चाहता हूं। 'राम' नाम का मूल्य अांकने में यमराज असमर्थ थे। अत : उन्होंने कहा,"चलो देवराज इन्द्र से पुछने चलते है। तब उस जीव ने कहा मैं एेसे नहीं जाऊंगा। मेरे लिए एक पालकी मंगार्इ जाए अौर उससें कहारों के साथ अाप भी लगेंगे। उसकी बात सुन कर यमराज सकुचाये तो सही पर सारे पापों को नाश कर देने नाले अौर मन बुद्धि से अतीत फलदाता भगवान् नाम के लेने वाले की पालकी उठाना अपने लिए सौभाग्य समझ कर पालकी में लग गए।
पालकी स्वर्ग पहुंची। देवराज इन्द्र ने स्वागत किया अौर यमराज से सारी बात जान कर कहा,"मैं भी 'राम' नाम का मूल्य नहीं जानता हूं। ब्रहृा जी के पास जाना चाहिए।"
उस जीव ने निवेदन किया यमराज के साथ अाप भी पालकी में लगें तो चलूं। इन्द्र ने बात मान ली
अौर पालकी लेकर ब्रह्म लोक में पहुंचे। ब्रह्म जी ने भी 'राम' नाम की महिमा का मूल्य अांकने में असमर्थता प्रकट की अौर जीव के कहने पर पालकी में जुट गए एवं शंकर जी के पास चलने की राय दी। पालकी कैलाश पर्वत पर शिवजी महाराज के पास पहुंची । शिवजी महाराज ने यमराज, इन्द्र एंव ब्रह्म को पालकी में जुटा देख कर अाश्चर्य से सारी बात पूछी तथा बताने पर उन्होंने कहा,"भार्इ! मैं तो दिन-रात 'राम' नाम जपता हूं, उसका मूल्य अांकने की मेरे मन में कभी नहीं अार्इ। अाअो विष्णु भगवान के पास चलते हैं एंव एेसे  भाग्यवान जीव की पालकी में मैं भी लग जाता हूं।"
पालकी में एक अोर यमराज अौर देवराज इन्द्र एवं दूसरी अोर ब्रहृा अौर शिवजी महाराज कहार बने चल रहे थे। पालकी वैकुण्ठ पहुंची। चारों महान देवताअों को पालकी उठाए देख कर भगवान विष्णु हंस पड़े। पालकी वहां दिव्य भूमि पर रखी गर्इ। भगवान ने अादरपूर्वक सबको बिठाया अौर कहा,"अाप लोग पालकी में बैठे हुए इस महाभाग जीवात्मा को उठा कर मेरी गोद में बैठा दीजिए।" 
देवताअों ने वैसा ही किया। तदनन्तर भगवान विष्णु के पूछने पर शिवजी महाराज ने कहा,"इसने एक बार परिस्थिति से बाध्य होकर 'राम' नाम लिया था। इसने 'राम' नाम का मूल्य जानना चाहा पर हम लोगों में से कोर्इ भी 'राम' नाम का मूल्य न बता सका अौर इस जीव की इच्छानुसार पालकी में लग कर अापकी सेवा में उपस्थित हुए हैं। अब अाप बताइए कि  'राम' नाम का क्या मूल्य है। भगवान विष्णु ने मुस्कराते हुए कहा,"अाप जैसे महान देव इनकी पालकी को ढोकर यहां तक लाए अौर अाप लोगों ने इसे मेरी गोद में बैठा दिया, अब यह इस गोद का नित्य अधिकारी हो गया है। 'राम' नाम का पूरा मूल्य तो बताया नहीं जा सकता फिर भी अाप इससे ही मूल्य का अनुमान लगा सकते हैं। इस प्रकार राम नाम का महान मूल्याभास पाकर शंकर अादि देवता लौट गए।
श्रीराम का पवित्र नाम तीन बार पाठ करना से जो फल होता है, श्रीकृष्ण नाम एक बार उच्चारण करने से वही फल होता है इसलिए तीन बार राम-राम का फल एक बार कृष्ण नाम में ही पाया जाता है। इससे ऊपर भी एक अौर नाम है जिसके विषय में श्रीचैतन्य चरितामृत में कहते हैं।
एक कृष्ण नाम से समप्त पापों का नाश हो जाता है एंव प्रेम को उदय करने वाली साधन भक्ति का प्रकाश होता है तत्पश्चात प्रेम के उदय होने पर स्वेद, कम्प, अश्रु इत्यादि विचार उत्पन्न होते हैं एवं अनायास में ही भव बंधन से मुक्त हो जाते हैं। यदि अनेक बार कृष्ण नाम लेने पर भी प्रेम के विचार उत्पन्न नहीं होते तो समझना चाहिए कि निश्चय ही नाम अपराध हो रहे हैं लेकिन चैतन्य-नित्यानन्द के नामों में अपराध के ये सब विचार नहीं हैं। स्वतन्त्र र्इश्वर प्रभु अत्यन्त उदार हैं, नाम लेने से ही प्रेम देने हैं एवं अश्रुधार बहती है। अत: अनर्थयुक्त जीवों के लिए नित्यानन्द प्रभु व श्री चैतन्य महाप्रभु के नाम का कीर्तन करना अर्थात "नितार्इ-गौरांग" "नितर्इ-गौरांग" का कीर्तन करना परम लाभदायक है।
श्रीचैतन्य  गौड़ीय मठ की ओर से
श्री बी.एस. निष्किंचन जी महाराज

रविवार, 8 जनवरी 2017

भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने एकादशी व्रत के लिए इस प्रकार कहा:

प्रभु बले, 'भक्ति-अंगे, एकादशी-मान-भंगे, सर्वनाश उपस्थित हय ।
प्रसाद-पूजन करि', परदिने पाइले तरि, तिथि परदिने ताहि रय॥

श्रीहरिवासर-दिने, कृष्णनामरसपाने, तृप्त हय वैष्णव सुजन ।
अन्य रस नाहि लय, अन्य कथा नाहि कय, सर्वभोग करये वर्जन॥
प्रसाद भोजन नित्य, शुद्ध वैष्णवेर कृत्य, अप्रसाद न करे भक्षण।
शुद्धा एकादशी यबे, निराहार थाके तबे, पारणेते प्रसाद भोजन ॥

अनुकल्पस्थानमात्र, निरन्न प्रसादपात्र, वैष्णवके जानिह निश्चित।
अवैष्णव जन या'रा, प्रसाद-छलेते ता'रा, भोगे हय दिवानिशि रत॥

पापपुरुषेर संगे, अन्नहार करे रंगे, नाहि माने हरिवासर-व्रत।
भक्ति-अंग सदाचार, भक्तिर सम्मान कर, भक्ति-देवी-कृपा-लाभ हवे॥
अवैष्णवसंग छाड़, एकादशीव्रत धर, नामव्रते एकादशी तवे।
प्रसादसेवन आर श्रीहरिवासरे, विरोध ना करे कभु बुझह अन्तरे॥

एक अंग माने, आर अन्य अंगे द्वेष, ये करे निर्बोध सेई, जानह विशेष ।
ये अंगेरे येई देशकालविधिव्रत, ताहाते एकान्तभाव हओ भक्तिरत॥
सर्व अंगेरे अधिपति व्रजेन्द्रनन्दन, याह तेहँ तुष्ट ताहा करह पालन।
'एकादशी-दिने निद्राहार विसर्जन, अन्य दिने प्रसाद निम्मार्लय सुसेवन॥'

शुनिया वैष्णव सब, आनन्दे गोविन्दरव, दण्डवत् पड़िलेन तवे।
स्वरूपादि रामानन्द, पाइलेन महानन्द, 'ओड़िया' 'गौड़िया' भक्त सबे॥

ओहे भाई! गौरांग आमार प्राणधन ।
अकैतवे भज ताँरे, यावे तवे भवपारे, शीतल हैइवे अनुमन॥

अनुवाद : भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने कहा, 'एकादशी पालन शुद्ध भक्ति का अंग है, उसको न मानने से भक्ति का सर्वनाश हो जायेगा। एकादशी के दिन प्रसाद को प्रणाम करके, उसको अगले दिन पाओ, जब तिथि सम्पूर्ण हो जाये। एकादशी तिथि के दिन वैष्णव लोग केवल मात्र श्रीकृष्ण नाम रस का ही पान करते हुए तृप्त रहते हैं। वे न तो कोई अन्य रस लेते हैं, न ही अन्य कोई बात बोलते हैं। वैष्णव लोग इस दिन सभी प्रकार के भोगों का त्याग करते हैं।'

'शुद्ध वैष्णव तो सदा प्रसाद का ही सेवन करते हैं, अन्य कोई द्रव्य तो वे चखते भी नहीं हैं। एकादशी के दिन तो वैष्णव जन निराहार रहते हैं व अगले दिन पारण करते हुए प्रसाद भोजन करते हैं। एकादशी के दिन वैष्णवजन केवल अनुकल्प  अर्थात् अन्नरहित फलाहार का प्रसाद लेते हैं। जो अवैष्णव हैं वे एकादशी के दिन नाम प्रसाद पर छल से दिन-रात अपना इन्द्रिय तर्पण करते हैं। पापियों के संग अन्नहार करते रहते हैं, व हरिवासर व्रत को अर्थात् एकादशी व्रत को नहीं मानते हैं। भक्ति के सभी अंगों को मानने से, भक्ति का सम्मान करने से भक्ति देवी की कृपा प्राप्त होती है। अतः अवैष्णव का संग छोड़, एकादशी का व्रत पालन करना चाहिए।'
प्रसाद सेवन व हरिवासर आपस में विरोधी नहीं हैं, हमें अन्तर समझना चाहिए। भक्ति के एक अंग को मानता और दूसरे से द्वेष करता हो, उस व्यक्ति को बुद्धिहीन जानो। हरिभक्ति के जो भी अंग हों, उसकी जो भी विधि हो, देश-काल नियमानुसार उसको एकान्त भाव से पालन करते हुए भक्ति मार्ग में अग्रसर हो जाओ। सभी भक्ति-अंगों के अधिपति श्रीव्रजेन्द्रनन्दन हैं, जिससे वे सन्तुष्ट होते हों, वही पालन करो। एकादशी के दिन निद्रा-आहार का वर्जन कर, अन्य दिनों में प्रसाद का निर्मल चित्त से सेवन करना चाहिए।

एकादशी का विधान भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी से सुनकर सभी वैष्णव बड़े प्रसन्न हुए तथा आनन्द से 'गोविन्द-गोविन्द' पुकारने लगे। राय रामानन्द जी, स्वरूप दामोदर जी इत्यादि 'उड़िया' 'गौड़िया' सभी भक्तों को बड़ा आनन्द आया। 

हे भाई ! श्रीगौरांग महाप्रभु हमारे प्राणधन हैं। निष्कपट भाव से उनका भजन करो, वे तुम्हें इस भव-सागर से पार कर देंगे तथा साथ ही साथ तुम्हारे शरीर व मन को भी शीतलता प्रदान करेंगे।

बुधवार, 4 जनवरी 2017

हमारे व्यवहार से बच्चों पर बहुत असर पड़ता है।

वर्तमान समाज़ में माता-पिता एक बात से परेशान हैंं। वो यह कि बच्चे उनकी बात नहीं सुनते। उल्ट जवाब देते हैं। मान-सम्मान की बात भूल ही जायेंं। ऐसे में उन्हें सूझता ही नहीं कि क्या करें।

कुछ चिन्तन करने पर इस समस्या के कारण का पता चल सकता है। 

प्राचीन काल की बात है कि एक बार एक राहगीर भारत के भ्रमण पर था। मार्ग में उसे प्यास लगी। दूर-दूर तक कोई आबादी न देख वह प्यास से तड़प उठा। काफी चलने पर उसे एक छोटा स घर दिखाई दिया।

यह सोचकर कि वहाँ पानी ज़रूर मिलेगा, वह घर के नज़दीक पहुँचा तो उसे
गालियों की आवाज़ सुनाई दीं। रुक कर उसने देखा कि वहाँ बरामदे से एक तोता उसकी ओर देखकर उसे गालियाँ दे रहा है और कह रहा है -- तू क्या सोचता है कि मेरा मालिक यहाँ नहीं है, इसलिए तू चोरी करेगा। अभी मेरा मालिक आयेगा और तेरा सिर कलम कर देगा। मैं पिंजरे में बंद हूँ नहीं तो तेरी आँखें नोच डालता।

तोते को ऐसे बोलते देख राहगीर घबरा गया और सोचने लगा कि यही इतना क्रूर है तो इसका मालिक कितना क्रूर होगा?

वह चुपचाप वहाँ से चला गया।

प्यास के मारे उसका बुरा हाल था। कुछ दूर चलने पर एक और घर सा दिखा। घर तो नहीं कुटिया ही थी। कुटिया को देख कुछ हिम्मत हुई लेकिन फिर मन में भय था। इसलिये धीरे-धीरे घर के पास गया। वहाँ जाकर वह ये देखकर हैरान हो गया कि वहाँ भी बरामदे में वैसा जी पक्षी पिँजरे में है। उसे उस तोते की गालियाँ याद आ गयीं और वह उल्टे कदम मुड़ पड़ा।
राहगीर को वापिस जाता देख बड़े प्यार से उस तोते ने कहा --हे पथिक! आप आईये! अभी थोड़ी देर में मेरे मालिक आने वाले हैं, तब तक आप बैठिये। आप को देखकर लगता है कि आप प्यासे हैं। मैं तो पिँज़रे में बंद हूँ। आपको स्वय ही कष्ट करना होगा। उधर मटके में शीतल जल है व लोटा भी रखा है, पानी भरने के लिए। आप पानी पीकर आराम करें।

राहगीर असमंजस में पड़ गया और सोचने लगा कि अभी थोड़ी देर पहले ऐसे ही पिज़रे में बन्द तोते ने मुझ्को कितने अपशब्द कहे और एक यह तोता है कि इतना मीठा बोल रहा है। उसको थोड़ा सा डर लग रहा था कि कहीं कुछ धोखा न हो जाये और वो किसी संकट में फंस जाये।

तभी तोता बोला - आप घबराईये मत। हो सकता है आपने कुछ समय पहले मेरे जैसा ही तोता देखा हो जिसने अपशब्द कहे हों व आपका अपमान किया हो। देखो राहगीर, इसमें उस तोते का कोई दोष नहीं है या मैं
आपसे बड़े सम्मान से बात कर रहा हूँ, इसमें मेरी कोई तारीफ नहीं है। सच्चाई यह है कि वो मेरा ही भाई है। हम दोनों एक ही माता-पिता की सन्तान हैं। उसे एक कसाई ले गया और मुझे इस कुटिया का साधु अपने साथ ले लाये।

वह मेरा भाई सारा दिन उस घर में मार-काट की बातें अथवा गाली-गलौच सुनता रहता है इसलिये उसका स्वभाव भी ऐसा क्रूर सा बन गया। जबकि मैं इन संत के घर पे सत्संग सुनता रहता हूँ और संतों का आपसी सम्मानजनक व्यवहार देखता रहता हूँ। ये सब संग का प्रभाव है। कसाई के साथ रहने से, वह उसकी भाषा, व्यवहार सब सीख गया व वही करता है। जबकि मैं एक साधु पुरुष के साथ रहने के कारण, शालीनता सीख गया।
उपरोक्त कथा से पता लगता है --- 'जैसा करो संग, वैसा चड़े रंग'।

श्रीमद् भगवद् गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि घर के बड़े जैसा आचरण व व्यवहार करेंगे, छोटे भी वैसा ही करेंगे। माता-पिता व समाज़ के प्रतिष्ठित लोगों का बच्चों पर बहुत असर होता है, अतः हमें चाहिये कि हम अपने बड़ों का सम्मान करें, दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करें तथा अपने बच्चों को शिक्षणीय फिल्में दिखायें व बच्चों पर नज़र रखें कि वो इन्टरनेट का उपयोग कैसे कर रहे हैं?

-- श्री भक्ति विचार विष्णु महाराज जी।