रविवार, 18 नवंबर 2018

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज 'विष्णुपाद' -- कुछ स्मृतियाँ

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भारत के राष्ट्रपति श्री राधाकृष्णन जी आपसे आशीर्वाद प्राप्त करते हुये।

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अपने गुरुभाइयों के साथ आप




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अपने प्रियतम शिष्य के साथ  


 आपके प्रियतम शिष्य -- श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी।


रविवार, 11 नवंबर 2018

कौन है परम नियन्ता?

जिस ज्ञानी ने वेदों का ठीक से अध्ययन किया हो और भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभुजी जैसे महापुरुषों से ज्ञान प्राप्त किया हो तथा यह जानता हो कि इन उपदेशों का किस प्रकार उपयोग करना चाहिये, वही यह समझ सकता है कि भौतिक तथा आध्यात्मिक जगतों के मूल श्रीकृष्ण ही हैं।

इस प्रकार के ज्ञान से वह भगवद्भक्ति में स्थिर हो जाता है। वह व्यर्थ की टीकाओं से या मूर्खों के द्वारा कभी पथभ्रष्ट नहीं होता। 

सारा वैदिक साहित्य स्वीकार करता है कि श्रीकृष्ण ही ब्रह्माजी, शिवजी तथा अन्य समस्त देवताओं के स्रोत हैं। 

अथर्व वेद में (श्रीगोपाल तापनी उपनिषद् 1/24) कहा गया है ----

यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च गापयति स्म कृष्णः 

--- प्रारम्भ में श्रीकृष्ण ने ब्रह्माजी को वेदों का ज्ञान प्रदान किया और उन्होंने भूतकाल में वैदिक ज्ञान का प्रचार किया।  

पुनः नारायण उपनिषद् में (1) कहा गया है -- 


अथ पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत प्रजाः सृजेयेति 

--- तब भगवान ने जीवों की सृष्टि करनी चाही।

उपनिषद् में आगे कहा गया है -- 

नारायणाद् ब्रह्मा जायते नारायणाद् प्रजापति प्रजायते 
नारायणाद् इन्द्रो जायते। 
नारायणादष्टौ वसवो जायन्ते नारायणादेकादश रुद्रा जायन्ते नारायणाद्द्वादशादित्याः
---- श्रीनारायण से ही श्रीब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, श्रीनारायण से ही प्रजापति उत्पन्न होते हैं, श्रीनारायण से ही इन्द्र और आठ वसु उत्पन्न होते हैं, श्रीनारायण से ही ग्यारह रुद्र तथा बारह आदित्य उत्पन्न होते हैं। ये श्रीनारायण, श्रीकृष्ण के ही आंश हैं। 

वेदों का ही कथन है ---

ब्रह्मण्यो देवकीपुत्रः 

--- देवकी-पुत्र श्रीकृष्ण ही भगवान् हैं। (नारायण उपनिषद् 4)

एको वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा न ईशानो नपो नाग्निसमौ नेमे 
द्यावापृथिवी न नक्षत्राणि न सुर्यः

-- सृष्टि के प्रारम्भ में केवल भगवान नारायण थे। न ब्रह्मा थे, न शिव। न अग्नि थी, न चन्द्रमा, न नक्षत्र और न ही सूर्य (महा उपनिषद् 1)।

महा उपनिषद् में यह भी कहा गया है कि शिवजी परमेश्वर के मस्तक से उत्पन्न हुए। अतः वेदों का कहना है कि ब्रह्मा और शिव के स्रष्टा भगवान की ही पूजा की जानी चाहिए।

मोक्ष धर्म में श्रीकृष्ण कहते हैं  --

प्रजापतिं च रुद्रं चाप्यहमेव सृजामि वै। 
तौ हि मां न विजानीतो मम मायाविमोहितौ॥
मैंने ही प्रजापतियों को, शिव को तथा अन्यों को उत्पन्न किया, किन्तु वे मेरी माया से मोहित होने के कारण यह नहीं जानते कि मैंने ही उन्हें उत्पन्न किया।

श्रीवराह पुराण में भी कहा गया है --

नारायणः परो देवस्त्स्माज्जातश्च्तुर्मुखः।
तस्माद्रुद्रोऽभवद्देवः स च सर्वज्ञतांं गतः॥

श्रीनारायण भगवान हैं, जिनसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए और फिर ब्रह्मा से शिव उत्पन्न हुए।

भगवान श्रीकृष्ण समस्त उत्पतियों के स्रोत हैं और वे सर्वकारण कहलाते हैं। 

वे स्वयं कहते हैं -- चूँकि सारी वस्तुएँ मुझ्से उत्पन्न हैं, अतः मैं सभी का मूल कारण हूँ। सारी वस्तुएँ मेरे अधीन हैं, मेरे ऊपर कोई भी नहीं है। 

श्रीकृष्ण से बढ़कर कोई परम नियन्ता नहीं है। जो व्यक्ति प्रामाणिक गुरु
से या वदिक साहित्य से इस प्रकार श्रीकृष्ण को जान लेता है, वह अपनी सारी शक्ति श्रीकृष्णभावनामृत में लगाता है,, और सचमुच ज्ञानी पुरुष बन जाता है।

-- श्रील ए. सी. भक्ति वेदान्त स्वामी महाराजा जी (संस्थापक आचार्य , इस्कान)

शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

यदि श्रीगौरांग महाप्रभुजी न होते तब क्या होता?

श्रील वासुदेव घोष जी, भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के प्रिय पार्षद थे।  आप प्रसिद्ध सुकण्ठ कीर्तनीया थे।

श्रीगोविन्द घोष व श्रीमाधव घोष आपके भाई थे।

जब श्रीनित्यानन्द प्रभुजी, गौड़ देश में श्रीकृष्ण नाम प्रचार के लिये आये तो श्रील वासुदेव घोष भी उनके साथ आये थे।

श्रीगोविन्द, श्रीमाधव व श्रीवासुदेव -- इन सब के कृष्ण-कीर्तन में श्रीमहाप्रभु व श्रीनित्यानन्द जी नृत्य करते है।

श्रील वासुदेव घोष जी ने श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की महिमा में कई भजन लिखे। उनमें से एक  कुछ ऐसे है --

(यदि) गौर ना हइत, तबे कि हइत, केमने धरिनाम दे'।
राधार महिमा प्रेमरस सीमा, जगते जानात के?॥

मधुर वृन्दाविपिन माधुरी, प्रवेश चातुरी सार।
वरज युवती, भावेर भकति, शकति हइत का'र?॥

गाओ गाओ पुनः, गौरांगेर गुण, सरल करिया मन।
ए भव सागरे, एमन दयाल, ना देखिये एकजन॥

(आमि) गौरांग बलिया, ना गेनु गलिया, केमने धरिनु दे'।
वासुर-हिया, पाषाण दिया, (विधि) केमने गड़ियाछे॥

अर्थात्

यदि श्रीगौरांग महाप्रभुजी न होते तब क्या होता? मैं किस प्रकार से इस शरीर को रख पाता? राधाजी की महिमा व उन्नत उज्जवल रस की बात जगत् को कौन बताता?

मधुर वृन्दावन की जो माधुरी है, उसमें प्रवेश पाने का चातुर्य ही सार है तथा वृज-गोपियों की जो परकीया भाव की भक्ति है, किसकी शक्ति थी जो वहाँ तक पहुँच पाता? 

इसलिये बार-बार श्रीगौरांग महाप्रभुजी के गुणों का सरल मन से, निष्कपट मन से कीर्तन करो। इस भवसागर में इस प्रकार का दयालु और कोई नहीं दिखाई देता।

श्रीवासुदेव घोषजी दीनता से अपने बारे में कहते हैं कि मैंने भी न जाने कैसे इस शरीर को धारण किया हुआ है? कारण श्रीगौरांग नाम करने के बावज़ूद भी चित्त द्रवित नहीं हो रहा है। मुझे लगता है कि विधि ने शायद मेरे इस हृदय को पाषाण से निर्मित किया है।

श्रील भक्ति सर्वस्व गिरि महाराज जी

आपका प्राकट्य ढाका शहर में अनुमानित 1306 बंगाब्द में हुआ था। आप एक सम्भ्रान्त परिवार से थे।

बचपन से ही आप दुनियावी वस्तुओं में रुचि नहीं रखते थे। अच्छे-अच्छे भोजन के प्रति आपकी स्वाभाविक उदासीनता थी। यहाँ तक कि बचपन में आप दूसरे बच्चों के साथ खेलने में भी ज्यादा रुचि नहीं रखते थे।

बचपन से ही आप गम्भीर प्रकृति के थे। साधु-सन्तों से मेलजोल तथा धार्मिक कार्यों में आपकी बचपन से ही रुचि  थी।

आपके माता-पिता ने आपको नाम दिया 'इन्दु-बाबू'। सन् 1912  के 
नवम्बर में हुये कार्तिक मास व्रत के समय जगद्गुरु श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद जी ने ढाका के प्रसिद्ध धनी श्रीसनातन दास जी के यहाँ बहुत दिन श्रीमद् भागवत् पर कथा की। फिर श्रील भक्ति प्रदीप तीर्थ महाराजजी ने भी बहुत दिन तक वहीं पर श्रीमद् भागवत् पाठ किया। उन दिनों आप उनकी कथा सुनने जाते रहे। वैष्णवों की संगति व उनसे हरिकथा श्रवण का ऐसा प्रभाव हुआ कि आप श्रील प्रभुपाद के चरणाश्रित हो गये।

दीक्षा के बाद आपका नाम हुआ -- श्रीगौरेन्दु ब्रह्मचारी। 1925 में आपको श्री प्रभुपाद जी ने संन्यास प्रदान किया व आपको नाम दिया -- त्रिदण्डी स्वामी भक्ति सर्वस्व गिरि महाराज।


आपने अपना एक मठ श्रीधाम वृन्दावन में स्थापित किया था। जिसको आपने नाम दिया - 'श्रीविनोद वाणी गौड़ीय मठ'। संसार से जाने का आपको पूर्वाभास पहले ही हो गया था। इसलिये आपने इस धराधाम से जाने से पूर्व अपना मठ श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी को प्रदान कर दिया।

गुरुवार, 8 नवंबर 2018

इस प्रकार गोवर्धन जी वृज - भूमि पर आये

श्रीकृष्ण ने अवतरण से पहले अपने निज-धाम चौरासी कोस भूमि, गोवर्धन और यमुना नदी को पृथ्वी पर भेजा। गोवर्धन भारत के पश्चिम  प्रदेश में, शालमली द्वीप में द्रोण पर्वत के पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुये। 

एक बार पुलस्त्य मुन तीर्थ भ्रमण कर रहे थे। मार्ग में विचित्र पुष्प व फलों वाले वृक्षों एवं झरने वाले परम रमणीय द्रोणाचल-नन्दन गिरिराज गोवर्धन को देखकर बड़े प्रसन्न हुये। 

मुनि द्रोणाचल से मिले और उनसे बोले - मैं काशी में रहता हूँ, काशी में गंगाजी हैं और विश्वेश्वर महादेव जी हैं, वहाँ जाने से पापी लोग भी तत्क्षण मुक्त हो जाते हैं। मेरी इच्छा है कि मैं गोवर्धन को काशी में स्थापित पर उस पर तपस्या करूँ। आप अपना पुत्र मुझे दान में दे दें। उस समय गोवर्धन का आकार आठ योजन (चौंसठ मील) लम्बा, पाँच योजन तक फैला तथा दो योजन ऊँचा था।  

(आजकल गोवर्धन की लम्बाई सात मील देखी जाती है, हालांकि परिक्रमा 
का रास्ता चौदह मील का है)
गोवर्धन ने एक शर्त पर मुनि के साथ जाना स्वीकार किया, वह ये कि मुनि यदि भारी समझ कर उन्हें रास्ते में कहीं भी नीचे उतार देंगे तो गोवर्धन वहीं रह जायेंगे। 

पुलस्त्य मुनि ने गोवर्धन को अपनी हथेली पर उठाया और धीरे-धीरे काशी की ओर चलने लगे। मार्ग में वे वृजमण्डल आये। वहाँ के अपूर्वे सौन्दर्य के दर्शन करते ही गोवर्धन को श्रीकृष्ण की बाल्यलीला, किशोर लीला आदि स्मरण हो आयी। श्रीगोवर्धन की वहीं ठहरने की इच्छा हो गयी। उन्होंने अपना भार इतना बढ़ाया कि उस भार से परेशान होकर मुनि अपनी प्रतिज्ञा भूल गये। मुनि ने प्रतिज्ञा की थी की वे रास्ते में गोवर्धन जी को नहीं उतारेंगे, सीधा काशी ले जायेंगे। 

अधिक भार होने के कारण मुनि ने श्रीगोवर्धन को वहीं उतार दिया। पुलस्त्य मुनि ने थकान के कारण थोड़ी देर विश्राम किया, फिर गोवर्धन को उनकी हथेली पर आने के लिये कहा। श्रीगोवर्धन ने इन्कार कर दिया। मुनि फिर उन्हें अपनी शक्ति से उठाने का प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुये। अन्ततः मुनि ने क्रोध में श्राप दिया - तुम ने मेरा मनोरथ पूर्ण नहीं किया इसलिये प्रतिदिन तुम्हारा तिल के समान आकार कम होता जायेगा।

तभी से गोवर्धन पर्वत एक-एक तिल करके छोटे हो रहे हैं। 
कहते हैं जब तक पृथ्वी पर भगीरथी गंगा और गोवर्धन गिरि हैं तब तक कहीं भी कलि के प्रभाव की प्रबलता नहीं होगी।

स्वयं भगवान श्रीकृष्ण जी ने श्रीगोवर्धन जी के तत्त्व को और उनकी महिमा को प्रकाशित किया है। श्रीकृष्ण ने ही देवताओं की पूजा बन्द करवाकर श्रीगोवर्धन पूजा का प्रवर्तन किया।

'गोवर्धन' शब्द का एक अर्थ इन्द्रीय-वर्द्धन भी होता है। इसलिये ऐसा भी कहा जाता है कि श्रीकृष्ण तथा कृष्ण-भक्तों के इन्द्रिय-वर्द्धन का नाम हो गोवर्धन पूजा है।