शनिवार, 20 अक्तूबर 2018

आपका जीवन भी है कष्टों से त्रस्त, बिना कुछ खर्च किए करें ये काम

भगवान जगन्नाथ जी से हमारा गहरा सम्बन्ध है, नित्य सम्बन्ध है, वास्तविक सम्बन्ध है, सुन्दर सम्बन्ध है, आनन्दायक सम्बन्ध है। 


वे हैं जगन्नाथ्। जगत के नाथ, संसार के मालिक, सारे संसार वासियों के मालिक्। 

हम हैं संसार के वासी। इस नाते वे हमारे कर्ता-धर्ता, स्वामी , मालिक हैं। 
जगन्नाथजी और हमारा गहरा सम्बन्ध है। वे हमारे नित्य प्रभु हैं, हम उनके नित्य दास हैं। चाहे हम मानव बनें, चाहे देवता, चाहे कीट-पतंग, कोई भी जनम हो, वे हमारे नित्य प्रभु हैं, हमारे नाथ हैं और हम उनके नित्य दास हैं। 


इसीलिये जगन्नाथजी दोनों बाज़ू पसार कर खड़े हैं जैसे एक माँ अपने बच्चे को बुलाती है -- आजा, आजा। बच्चे को माँ की गोद में सबसे ज्यादा सुख मिलता है, सुकून मिलता है, शान्ति मिलती है। 

इसी प्रकार भगवान जगन्नाथजी दोनों बाज़ू पसार कर हमें बुला रहे हैं - मेरे बच्चो, मेरी बच्चियों, मेरे पास आओ। क्यों इस संसार में भटक रहे हो, कामना-वासना के दलदल में फंसे हो, आध्यात्मिक-आदिभैतिक-आदिदैविक क्लेशों परेशान हो रहे हो। मेरे पास आओ।  सुकून भरी ज़िन्दगी जीयो। तुम मेरे हो, मेरे पास आओ। मेरे पास तुम्हें आनन्दमय ज़िन्दगी मिलेगी, परम सुख मिलेगा।
श्रीगीता जी में भगवन श्रीकृष्ण अर्जुन को यही कहते हैं - तुम भगवान कि शरण लो। अवश्य ही उनकी शरण लो। भगवान ये नहीं कह रहे की शरण लेनी चाहिये, बल्कि कह रहे हैं शरण में चला जा। 


सारी शंकाओं को छोड़ कर, सारे भ्रमों को छोड़ कर भगवान की शरण में चला जा। इससे भगवान की कृपा मिलेगी। उससे परम शान्ति मिलेगी, यह जन्म-मृत्यु का चक्कर खत्म हो जायेगा, यह जो भटकना है यह खत्म हो जायेगा। भगवान का शाश्वत धाम मिलेगा। वहाँ नित्य जीवन मिलेगा, अगर भगवान जगन्नाथ की शरण में जायेगा तो। क्योंकि तू उनका है, उनका था, और जब उनका बन के रहेगा तो परम सुख मिलेगा।

भगवान जगन्नाथजी से हमारा गहरा सम्बन्ध था, उनसे ही नित्य सम्बन्ध रहेगा। जब हम उनको भुला देंगे तो हमें सभी प्रकार के कष्ट सताते रहेंगे। वे हमारे नित्य प्रभु हैं, हमारे लिये ही हमें बुला रहे हैं कि तुम मेरे बच्चे हो, मेरे पास आओ, इधर-उधर क्यों भटक रहे हो।

रविवार, 14 अक्तूबर 2018

जब शिवजी महाराज ने आपको सद्गुरु के पास भेजा।

जगद्गुरु श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर 'प्रभुपाद' जी के शिष्य श्रील भक्ति कुसुम श्रमण गोस्वामी महाराज जी ने 1925 में श्रील प्रभुपाद जी का आश्रय लिया था।

एक समय की बात है, पश्चिम बंगाल के 24 परगना ज़िला के अन्तर्गत रहने वाले एक पति-पत्नी की तीव्र इच्छा जागी कि बहुत समय संसार-संसार कर लिया, अब सद्गुरु का आश्रय कर हरि-भजन किया जाय।
उन्होंने सद्गुरु की खोज करनी प्रारम्भ की। भारत के बहुत से स्थानों पर भी घूमे, यहाँं तक कि श्रीधाम वृन्दावन भी गये किन्तु उन्हें कोई सफलता हाथ नहीं लगी।

घूमते-घूमते, खोजते - खोजते वे श्रीचन्द्रशेखर शिवजी के मन्दिर में एक दिन आये। वहाँ उन्हें बड़ा अच्छा लगा और कुछ दिन वहीं ठहरने का मन बनाया। श्रीचन्द्रशेख शिवजी से अपने हृदय की प्रार्थना की व उनके शरणागत हुये। वैष्णव अग्रागण्य शिव जी महाराज उनकी सरलता व शरणागति से प्रसन्न हुए व तीसरे दिन उनसे कहा -- तुम श्रीधाम मायापुर में जाओ। वहाँ श्रीचैतन्य मठ में जाना। वहाँ श्रीमठ के आचार्य श्रीमद् भक्ति कुसुम श्रमण महाराज हैं, वही आपके गुरू होंगे।
यह आदेश प्राप्त कर वो पति-पत्नी दोनों श्रीधाम मायापुर में आये, व श्रील महाराज के दर्शन कर कृतार्थ हुए। उनसे हरिनाम दीक्षा लेकर पति-पत्नी दोनों ने अपना जीवन सार्थक किया।

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2018

जब श्रील प्रभुपाद ने भक्तों की प्राण-रक्षा की।

जगद्गुरु श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद जी सनातन धर्म व शुद्ध भक्ति के प्रचार के लिये अपने प्रचारकों को विभिन्न स्थानोंं पर भेजते थे।

ऐसे में एक बार आपने श्रीभक्ति सुधीर याचक महाराज, श्रीराधारमण ब्रह्मचारी, श्रीसत्यगोविन्द ब्रह्मचारी को ब्रह्म देश (म्यानमार) में प्रचार के लिये जाने का आदेश दिया। आपने उनका जल-जहाज का टिकट भी बनवा दिया।

निर्धारित दिन तीनों भक्तों ने बड़े ही उत्साह के साथ श्रील प्रभुपाद जी को प्रणाम किया व जाने की अनुमति माँगी।

श्रील प्रभुपाद ने बड़े ही गम्भीर स्वर में कहा -- ब्रह्म देश में प्रचार के लिये अभी नहीं जा सकते।

तीनों ने एक ही स्वर में 'जी, अच्छा' कहा व कमरे में लौट गये। किन्तु मन में विचार उठा कि क्या कारण हुआ कि श्रील प्रभुपाद जी ने यात्रा का टिकट बनवाकर, यात्रा वाले दिन, जाने को मना कर दिया?

उसी दिन शाम के समय श्रील प्रभुपाद जी ने आप तीनोंं के साथ-साथ अन्य मठवासियों को अपने कमरे में बुलाया व कहा -- सब बड़े ही ध्यान से खबरें सुनें।

रेडियो में शाम के संवाद में कहा -- आज दिन में इस समय पर इस नम्बर का जहाज, हावड़ा बाबूघाट से ब्रह्म-देश जाने के समय मध्य समुद्र में सम्पूर्ण डूब गया। इस घटना से एक भी व्यक्ति जीवित नहीं बचा।

यह संवाद सुनकर श्रील प्रभुपाद जी ने कहा -- राधारमण! आज इसी जहाज में तुम सब जाते तो कैसा होता?

किसी के पास कोई जवाब नहीं था।

रविवार, 30 सितंबर 2018

……आग, आग, मेरा देह जल रहा है, पानी दो, पानी दो।

जगद्गुरु श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद जी के शिष्य श्रील भक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी महाराज जी एक बार पुरी धाम में रह रहे थे। सर्दियों के दिन थे।

एक रात्री में बहुत छटपटा कर आपने उच्च स्वर से कहा -- आग, आग, मेरा देह जल रहा है, पानी दो, पानी दो।

यह सुनकर समस्त मठवासी आपके पास आये और कहीं भी आग न देखकर कहा -- गुरू महाराज! आग कहाँ है? कुछ दिखाई नहीं दिया।

श्रील महाराज जी ने कहा -- तुम सबको दिखाई नहीं दिया, मैं तो देखता हूँ।


महाराजजी इस प्रकार रात भर आग की जलन से छटपटाते रहे। सुबह चार बजे के बाद महाराजजी की जलन शान्त हुई।  

तब उन्होंने कहा-- देखो मेरे सभी मठों मे तलाश करो, कहीं कुछ अघटन हुआ है। 

आपके कहने के अनुसार खोज-बीन प्रारम्भ हुई। 

कुछ ही समय में पता चला कि कोलकाता बिहाला श्रीमापल्ली मठ के पुजारी रात्री में ठाकुर को शयन करवाकर मन्दिर बन्द करके आया किन्तु अन्दर में मोम-बत्ती नहीं बुझाई। मोम गलने से उसकी आग से श्रीगिरिधारी जी का ढकाहुआ कम्बल जलने लगा और रात्री भर जलता रहा। 
प्रातः मंगला आरती के लिये पुजारी ने जैसे ही मन्दिर का दरवाज़ा खोला, अन्दर से धुँआ उठता देख वो फटाफट अन्दर गया और शीघ्रता से आग को बुझाया। 

यह सुनकर श्रील महाराज जी तुरन्त पुरी से बिहाला आये व श्रीभगवान गिरिधारी का पुनः शीतल जल से महाभिषेक करके असंख्य बार क्षमा माँग कर उनकी सेवा प्रकाश की।

शनिवार, 22 सितंबर 2018

शुद्ध भक्ति गंगा के भगीरथ


आज से 529 साल पहले नन्द-नन्दन श्रीकृष्ण सारे जीवों को अपना प्रेम वितरण करने के लिए श्रीचैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुये। परन्तु शुद्ध भक्ति अथवा प्रेम-धर्म की शिक्षा के अभाव में एक समय ऐसा भी आया जब गौड़ीय जगत में एक तरह का अंधकार छा गया। शिक्षित समाज चैतन्य महाप्रभु का नाम लेने से ही नाक-भौं सिकोड़ने लगा। उस समय भगीरथ की तरह शुद्ध भक्ति गंग़ा का पुनः प्रवाह इस जगत में लेकर आये --- श्रील भक्ति विनोद ठाकुर।

श्रील भक्ति विनोद ठाकुर और श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद जी ने हम सब के कल्याण के लिए चैतन्य महाप्रभु की शिक्षा का इतने सुन्दर तरीके से प्रचार-प्रसार किया कि आज पूरे विश्व में 4000 से अधिक प्रचार केन्द्र और 6000 से अधिक website भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी व श्रीभक्ति विनोद ठाकुर जी की विचार-धारा का प्रचार-प्रसार कर रही हैं। 

श्रीचैतन्य महाप्रभु के पार्षद श्रीरूप-सनातन जी ने जिस प्रकार अपने दिव्य प्रभाव से श्रीब्रज-मण्डल में श्रीकृष्ण जी की लीला स्थलियों को प्रकाशित किया, उसी प्रकार श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी ने श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के प्रकट-स्थान व श्रीमहाप्रभु जी की विभिन्न लीला-स्थलियों को प्रकाशित किया इसीलिये श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी को सप्तम गोस्वामी कहा जाता है ।

एक स्वरचित भजन में आपने कहा है कि अपने दुर्लभ मानव जन्म के प्रति हमेशा सजग रहें क्योंकि ये स्वर्ण अवसर कभी भी छिना जा सकता है। इसके इलावा आपकी अपने परिवार, समाज व देश के प्रति जो भी कर्तव्य हैं, उन्हें करें परन्तु जीवन की हरेक परिस्थिति में बड़े यत्न के साथ हरिनाम का आश्रय लिये रहें।

जीवन अनित्य जानह सार, ताहे नानाविध विपद भार,
नामाश्रय करि यतने तुमि, थाकह आपन काजे ।

अखिल भारतीय श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के प्रधानाचार्य, परमाराध्य श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी कहते हैं --

गौड़ीय मठ = श्रील भक्ति विनोद ठाकुर  

एवं 

गौड़ीय मठ -  (minus) श्रील भक्ति विनोद ठाकुर = 0, अर्थात् श्रील भक्ति विनोद ठाकुरजी के बिना गौड़ीय मठ = 0

श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी की जय !!!!