गुरुवार, 23 मई 2019

श्रीराय रामानन्दजी की


श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी ने श्रीराय रामानंद जी को अभिन्न विशाखा स्वरूप दर्शन किया था। श्रीराय रामानंद जी के पिता का नाम श्रीराय भवानन्द था। 

श्रील प्रभुपाद जी ने श्रीचैतन्य चरितामृत ग्रन्थ की *अनुभाष्य* नामक टीका में श्रीराय रामानंद जी के बारे में लिखा है कि लौकिक दृष्टि से श्री राय रामानंद जी शूद्र जाति के थे परन्तु ऐसा होने पर भी वे ब्राह्मण अथवा ब्राह्मण-गुरु यानिकी परमहंस स्थिति वाले महान वैष्णव थे ।

राय रामानंद जी का भजन स्थान *"श्रीजगन्नाथ बल्लभ उद्यान"* महाप्रभु जी को अतिप्रिय  था। एक दिन महाप्रभु जी ने इस बगीचे में ही अशोक वृक्ष के नीचे श्रीकृष्ण के दर्शन किये थे। 

देखा जाये तो साधारणतया भक्त प्रश्न करते हैं और भगवान् उत्तर देते हैं ,लेकिन यहाँ भगवान् श्रीमन् महाप्रभु जी प्रश्न करते हैं और राय रामानंद जी उतर देते हैं। 

भक्तों के गुणों को प्रकाश करना,उनकी महिमा बढ़ाना महाप्रभु जी भली -भांति जानते हैं। श्रीराय रामानंद जी की महिमा को प्रकाशित करने के लिए श्रीराय रामानंद जी को वक्ता बनाकर महाप्रभु  स्वयं श्रोता बने हैं .

 गौड़ीय वैष्णवों के लिए ' रामानंद संवाद' अति विशेष संवाद है , जो श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीरामानंद राय के बीच हुआ था। 

प्रस्तुत है --- उस संवाद का कुछ अंश 

महाप्रभु - " सर्वोच्च विद्या क्या है ?"

श्रीरामानन्द- " श्रीकृष्ण की भक्ति। "

महाप्रभु - " सर्वोच्च धन क्या है ?"

श्री रामानन्द - " श्रीराधा कृष्ण के प्रति सहज प्रेम। "

महाप्रभु -" सबसे भारी दु:ख क्या है ?"

श्रीरामानन्द- " श्रीकृष्ण भक्तों के संग से दूर होना। "

महाप्रभु - " परम मुक्ति क्या है ?"

श्रीरामानन्द - " श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम। "

महाप्रभु - " कौन सा गीत सर्वोत्तम है ?"

श्रीरामानन्द - " वह जो राधा -कृष्ण कि लीलाओं से युक्त हो। "

महाप्रभु - " जीवों का परम मंगल किसमें है ?"

श्रीरामानन्द- " श्रीकृष्ण जी के भक्त का संग। "

महाप्रभु - " एकमात्र स्मरणीय वस्तु क्या है ?

श्रीरामानन्द- श्रीकृष्ण के नाम, गुण और लीलायें। 

महाप्रभु - ध्यान योग्य एकमात्र वस्तु क्या है?

श्रीरामानन्द - श्रीराधा-कृष्ण के चरणकमल।

महाप्रभु - रहने योग्य सर्वोत्तम स्थान कौन सा है?

श्रीरामानन्द - जहाँ कहीं भी श्रीकृष्ण अपनी दिव्य लीलाएं करें।

महाप्रभु - श्रवण योग्य सर्वोत्तम विषय क्या है?

श्रीरामानन्द - श्रीराधा-कृष्ण की मधुर लीलाएं।

महाप्रभु - सर्वश्रेष्ठ उपास्य वस्तु क्या है? 

श्रीरामानन्द - श्रीराधाकृष्ण का नाम।

शनिवार, 18 मई 2019

आपकी सेवा से प्रसन्न हो कर श्रीचैतन्य महाप्रभु मूर्ति से साक्षात् प्रकट् हो गये


भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं में जो द्वादश गोपालों के बीच अर्जुन सखा हैं, वे ही भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की लीलाओं में श्रीपरमेश्वर दास (श्रीपरमेश्वरी दास) बन कर आये।

आप श्रीनित्यानन्द जी के प्रधान पार्षद हैं।

आपके श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की एक मूर्ति (विग्रह)  की बहुत भाव से सेवा करते थे। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर श्रीचैतन्य महाप्रभु जी उसमें से साक्षात् प्रकाशित हो गये थे।

एक बार जब आप श्रीमती जाह्नवा देवी के साथ ब्रज की यात्रा पर गये। वहाँ पर श्रीमती जाह्नवा देवी की कृपा से आपको श्रीराधा-गोपीनाथ जी के दर्शन हुये थे। ऐसी लीला के दर्शन कर, आपने श्रीमती जाह्नवा जी के आदेश से श्रीराधा-गोपीनाथ जी की विग्रह प्रतिष्ठा की थी।श्रीचैतन्य चरितामृत के अनुसार आपने श्रीनित्यानन्द जी की एकमात्र शरण ली है, जो आपका स्मरण करेगा उसे कृष्ण-भक्ति प्राप्त हो जायेगी।


श्रील परमेश्वरी दास ठाकुर जी की जय !!!!!!

जब श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने आपके जन्म के बारे में पहले ही बता दिया ।

श्रीचैतन्य महाप्रभु के एक भक्त थे श्रीगंगाधर भट्टाचार्य जी। आपको सभी प्यार से चैतन्य दास कहते थे। एक बार आप श्रीनीलाचल में भगवान चैतन्य महाप्रभु जी के दर्शन करने के लिए गये।

आप वहाँ जाकर श्रीचैतन्य महाप्रभु जी से कुछ कहते इससे पहले ही श्रीमन् महाप्रभु जी ने कहा -'जगन्नाथ जी तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करेंगे।'

वहाँ पर उपस्थित भक्तों को यह जानने की उत्सुकता हुई कि क्या इच्छा पूरी करेंगे तो श्रीमहाप्रभु जी ने बताया कि श्रीचैतन्य दास के हृदय में पुत्र की कामना हुयी है। इसके यहाँ 'श्रीनिवास' नामक पुत्र रत्न जन्म लेगा, जो कि मेरा अभिन्न स्वरूप होकर सब का आनन्द वर्धन करेगा। श्रीरूप आदि के द्वारा मैं भक्ति-शास्त्र प्रकाशित करवाऊँगा एवं श्रीनिवास द्वारा ग्रन्थ-रत्नों का वितरण करवाऊँगा।

शुभ मुहूर्त में श्रीनिवास का जन्म हुआ। 

श्रिनिवास आचार्य के नीलाचल में रहकर श्रील गदाधर पण्डित गोस्वामी जी से श्रीमद भागवत श्रवण की थी। स्वप्न में आपने श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द जी व श्रीअद्वैताचार्य जी की कृपा प्राप्त की थी। 

आपने श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी जी से दीक्षा लेकर, श्रीजीव गोस्वामी जी के आश्रय में शास्त्रों का अध्ययन किया था।

श्रीजीव गोस्वामी जी ने ही आपकि 'आचार्य' की पदवी प्रदान की थी।

आपने श्रीमद् भागवत पाठ व कीर्तन के द्वारा ही प्रचार कार्य किया था। आपके कीर्तन के विशेष सुर थे, जिनको सुनने मात्र से ही चित्त आकृष्ट और प्राण-मन मतवाले हो उठते थे।

आपके सुरों के नाम थे 'मनोहर साही'।

श्रील निवास आचार्य जी की जय !!!!

गौतम बुद्ध और भगवान बुद्ध एक नहीं हैं।


भगवान के प्रमुख दस अवतारों में भगवान बुद्ध, नौवें अवतार हैं। आप भगवान क्षीरोदशायी विष्णु के अवतार हैं।
बलि प्रथा की अनावश्यक जीव हिंसा को बन्द करने के लिये ही आपका अवतार हुआ।
आपकी माता का नाम श्रीमती अन्जना था व आपका प्रकट् स्थान था 'गया' (बिहार), भारत।

विचारणीय बात यह है कि शुद्धोदन व माया के पुत्र, शाक्यसिंह बुद्ध और भगवान बुद्ध एक नहीं हैं। श्रीशाक्यसिंह बहुत ही ज्ञानी व्यक्ति थे, कठिन तपस्या के बाद जब उन्हें तत्त्वानुभूति हुई तो वे बुद्ध कहलाये जबकि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार हैं।

1807 में रामपुर से छपी, अमरकोश में श्रीमान् एच टी कोलब्रुक ने इसको प्रमाणित किया है।
श्रीललित विस्तार ग्रन्थ के 21 वें अध्याय के 178 पृष्ठ पर बताया गया है कि संयोगवश गौतम बुद्ध जी ने उसी स्थान पर तपस्या की जिस स्थान पर भगवान बुद्ध ने तपस्या करने की लीला । इस कारण लोगों ने दोनों को एक ही मान लिया।



जर्मन के वरिष्ट स्कालर श्रीमैक्स मुलर जी के अनुसार शाक्यसिंह बुद्ध अर्थात् गौतम बुद्ध, कपिलावस्तु के लुम्बिनी के वनों में 477 बी सी में  पैदा हुए थे। गौतम बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोदन तथा माता का नाम श्रीमती मायादेवी है । जबकि भगवान बुद्ध की माता का नाम अन्जना था और पिता का नाम हेमसदन था व उनकी प्रकट स्थली 'गया' है । 
एक और बात श्रीमद् भागवत महापुराण (1.3.24) तथा श्रीनरसिंह पुराण (36/29) के अनुसार भगवान बुद्ध आज से लगभग 5000 साल पहले इस धरातल पर आये जबकि Max Muller के अनुसार गौतम बुद्ध 2491 साल पहले आये। 

कहने का तात्पर्य गौतम बुद्ध और भगवान बुद्ध एक नहीं हैं।

बुद्ध पूर्णिमा के शुभ अवसर पर भगवान बुद्ध की जय !!!!

श्रीबुद्ध पूर्णिमा की जय !!!!

शुक्रवार, 17 मई 2019

भगवान नृसिंह देवजी का वात्सल्य प्रेम


भगवान श्रीनृसिंह देव जी हिरण्यक्षिपु का वध करने के बाद उसके ही सिंहासन पर बैठ गये। उस समय आपकी क्रोध से भरी मुद्रा को देख कर कोई भी आपके आगे जाने का साहस नहीं कर पा रहा था।

ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, ॠषि, विद्याधर, नाग, मनु, प्रजापती, गन्धर्व, चारण, यक्ष, किम्पुरुष, इत्यादि सभी ने दूर से ही आपकी स्तुति की क्योंकि सभी आपकी भयानक गर्जना को सुनकर व हिरण्यकश्य्पु के पेट की आतों से लिपटे आपके वक्ष स्थल को देख कर भयभीत हो रहे थे किन्तु साथ ही वे बड़े प्रसन्न थे कि आपने खेल ही खेल में असुर-राज हिरण्यकश्य्पु का वध कर दिया था।
ब्रह्माजी, रुद्रादि की स्तुतियों को सुनकर भगवान का क्रोध शान्त नहीं हुआ। वे लगातार दिल को दहलाने वाली गर्जना कर रहे थे। मामला सुलझता न देख ब्रह्मा जी ने देवी लक्ष्मी जी से प्रार्थना की कि वे जाकर भगवान के क्रोध को शान्त करें। लक्ष्मी जी भी भगवान के ऐसे भयानक रूप के आगे जाने का साहस न जुटा पाईं।

फिर ब्रह्मा जी ने श्री प्रह्लाद से कहा कि वे ही कुछ करें क्योंकि भगवान ने ऐसा क्रोधित रूप श्रीप्रह्लाद महाराज जी की रक्षा के लिए ही तो लिया था।

प्रह्लाद जी ने बड़े सरल भाव से सभी देवी-देवताओं को प्रणाम किया व भगवान श्रीनरसिंह देव के आगे जाकर लम्बा लेटकर उनको दण्डवत प्रणाम किया।

भगवान अपने प्यारे भक्त को प्रणाम करता देखकर वात्सल्य प्रेम से भर गये, उन्होंने प्रह्लाद के सिर पर अपना दिव्य हाथ रखा । जिससे प्रह्लाद को अद्भुत ज्ञान का संचार हो गया। उन्होंने भगवान की स्तुति करनी प्रारम्भ कर दी ।
भगवान श्रीनरसिंह ने प्रसन्न होकर प्रह्लाद से वर माँगने के लिए कहा। प्रह्लाद जी ने कहा - भगवन् ! मेरी कोई इच्छा नहीं है, मुझे कोई वरदान नहीं चाहिए।

भगवान नरसिंह जी ने कहा - प्रह्लाद ! मेरी इच्छा है की तुमको कुछ देता जाऊँ । इसलिए मेरी इच्छा को पूरा करने के लिए ही कोई वर माँग लो।

प्रह्लाद जी ने कहा - हे प्रभु ! मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मेरे दिल में कोई इच्छा ही न हो माँगने की।


भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा - यह तो मज़ाक है। मुझ से कुछ वरदान माँगो।

तब श्रीप्रह्लाद जी ने कहा - 'मेरे पिता ने आप पर आक्रमण किया । कृपया उन्हें क्षमा करते हुए शुद्ध कर दीजिए व उन पर कृपा कीजिए।'


भगवान ने कहा - प्रह्लाद! तुम्हारे पिता ने मेरा दर्शन किया, मुझे स्पर्श किया,  क्या इससे वे शुद्ध नहीं हुए ? 

ये वंश जिसमें तुमने जन्म लिया है, क्या अभी भी अशुद्ध रह गया है? प्रह्लाद ! भक्ति के प्रभाव से तुम्हारा तो कल्याण हुआ ही है, साथ ही साथ तुम्हारे 21 जन्मों के माता-पिता का उद्धार हो गया है, उन्हें भगवद् धाम मिल गया है।

ऐसे कृपा करने वाले हैं -- भगवान नरसिंह देव।


भक्त प्रह्लाद महाराज जी की जय !!!!

भगवान श्रीनृसिंह की जय !!!!!!!

आपके प्रकट् तिथि की जय !!!

श्रीनृसिंह चतुर्दशी की जय !!!!!