रविवार, 17 नवंबर 2019

एक प्रार्थना

वृत्र नाम के भगवान के एक भक्त की श्रीमद् भागवत में चर्चा है। हवन कुन्ड से उनका प्राकट्य हुआ था। उनको जिस दिन भगवद् अनुभूति हुई, उन्हें भगवान संकर्षण अर्थात् बलराम जी के अंश श्रीसंकर्षण की अनुभूति हुई, उसी दिन भगवान उनके समक्ष प्रकट हो गये और भगवान ने कहा कि मुझ से वर्दान मांगो, तो वृत्र भगवान से कहता है कि हे प्रभु! मुझे ये वरदान दें कि मेरी मित्रता, मेरा लगाव, मेरा प्रेम आपके प्रेमी भक्तों से हो जाये, बस मुझे यही चाहिये कि आपके प्रेमी भक्तों से मेरी मित्रता हो जाये।


जब वृत्र की इन्द्र से युद्ध की ठन गई तो युद्ध में ही वृत्र इन्द्र से बोला -- तुम मुझे अपने वज्र से मार दो, क्योंकि मैं अपने प्रभु के पास जाना चाहता हूँ। हुआ यह था कि इससे पहले जब इन्द्र ने उस पर गदा से वार किया था तो वृत्र ने बायें हाथ से गदा को पकड़ा और उलता मारा था जिससे इन्द्र, ऐरावात हाथी के साथ चक्कर खाता हुआ पीछे जा गिरा था। वृत्र के ऐसा कहने पर कि मुझो मारो, इन्द्र मन ही मन सोचता है कि इसके पास वो कला है, जो भी अस्त्र शस्त्र का प्रयोग करूँगा, ये बायें हाथ से पकड़ कर मुझे मारेगा, और ये वज्र तो अमोघ है, ये मुझे ज़िन्दा ही नहीं छोड़ेगा।  

अतः इस डर से इन्द्र वृत्र के कहने पर भी उस पर वज्र से वार नहीं करता।  उसको ऐसा करते देख वृत्रासुर उसे समझाते हैं कि ये वज्र वैसा नहीं है, इसे तो भगवान ने दधिचि की हड्डियों से बनवाया था, मुझे मारने के लिए, इसलिए मारो मुझे। वृत्र जानते हैं कि इन्द्र से सोच कर घबरा रहा है कि मैं इसका स्वर्ग का राज्य ले लूँगा, लेकिन मुझे तो उस राज्य की इच्छा ही नहीं है, अब इसको कौन समझाये, व्यक्ति जैसा होता है वो दूसरों को भी वैसा ही सोचता है। 

अतः वृत्र मन ही मन अपने प्रभु से बात करने लगा, हे प्रभु मेरी तो ऐसी स्तिथि है जैसे चिड़िया के छोटे-छोटे बच्चे उड़ना चाहते हैं, उड़ नहीं सकते भूख लगी है, चींची करते हैं कि कब माँ आयेगी और उनके मुख में दाना डालेगी। प्रभु मेरी भी वैसी ही स्थ्तिति है मैं उड़ कर आपके पास आ नहीं सकता हूँ केवल यहाँ से पुकार सकता हूँ, रो सकता हूँ। हे प्रभु! मैं भी तमो-रजो-गुणों की रस्सी से बँधा हुआ हूँ, मैं आपके पास आ नहीं सकता हूँ, प्रभु आप मेरे पास आयें तो ही होगा। 

प्रभु मैं ये भी नहीं चाह्ता हूँ कि मुझे आप मोक्ष दो, संसार में बहुत कष्ट हैं संसार के लोग दुःखी हैं, मुझे उनसे बचाओ, मेरी तो केवल यही प्रार्थना है कि मुझे अपने भक्तों का संग दे दीजिये।

गुरुवार, 24 अक्तूबर 2019

शुभ कार्य को टालना नहीं चाहिये

एक महान वैष्णव आचार्य भक्ति विनोद ठाकुर जी ने शरणागत भक्त के  हृदय के भावों को लिखा -- 

मारोबी राखोबी, जो इच्छा तोहारा……
हे भगवन्! आप मुझे रखो चाहे मारो, मैं कुछ नहीं बोलूँगा। ऐसी स्थिति को प्राप्त कर लेता है, शरणागत भक्त्। मृत्यु, कंग़ाली, बेइजजती, बिमारी आदि से कोई भय नहीं होता उसे।  बहुत पैसा मिले, दीर्घ जीवन मिले, बहुत सम्मान मिले तो भी ठीक और अगर नहीं मिले तो भी ठीक। शरणागत भक्त का एक ही भाव होता है कि मैं वो क्या क्रिया करूँ कि जिससे मेरे ठाकुर प्रसन्न रहें। 24 घंटे इसी भाव में डूबकर भक्ति के अनुकूल कार्यों को, भगवान कि प्रसन्नता के अनुकूल कार्यों को करता रहता है और भक्ति के प्रतिकूल कार्यों को करता ही नहिं, बल्कि उनके लिये भाव उठे तो उसे भी तिरस्कार कर देता है।  

कभी-कभी पुराने संस्कार वश मन में तो भाव आ सकते हैं, उनको वो टाल देताहै, हटा देता है। 

भगवान श्रीरामचन्द्र के बाण से जब रावण ज़मीन पर गिर गया तो भगवान श्रीराम ने श्रीलक्ष्मण को बोला - रावण बहुत ज्ञानी है, इसका प्रशासन बहुत अच्छा रहा है क्योंकि इसने अपने राज्य को बहुत समृद्ध रखा था। इससे कुछ ज्ञान लिया जाना चाहिये। हमारे पूज्य हैं, हमारे पिताजी, दादाजी आदि की उम्र से भी ज्यादा उम्र के हैं, तो जाओ कुछ शिक्षा लेकर आओ। 
बड़े भाई की आज्ञा से गये, प्रणाम किया व कहा --- मैं श्रीराम का अनुज लक्ष्मण आपसे कुछ शिक्षा लेने आया हूँ। रावण कुछ नहीं बोला। चुपचाप लेटा रहा। श्रीलक्ष्मण ने दो-तीन बार प्रार्थना की, लेकिन  रावण कुछ नहीं बोला।  

श्रीलक्ष्मण वापिस लौट गये और श्रीराम से कहा --- आप क्या बात कर रहे हैं, वो हमें उपदेश-निर्देश देगा? जिसके सारे वंश को खत्म कर दिया, अपने आप को जो इतना शक्तिशाली मानता था, देवता उससे डरते थे, वो हमारे विरुद्ध बहुत कुछ सोचता होगा। 

भगवान श्रीराम ने कहा -- ज्ञानी, ऐसा नहीं करते, चलो मैं भी चलता हूँ।  

भगवान श्रीराम गये, उन्होंने हाथ जोड़े और कहा -- राजा दशरथ के पुत्र मैं और मेरा अनुज लक्ष्मण आपके सामने आपको हाथ जोड़कर अभिवादन करते हैं और आपसे कुछ ज्ञान प्राप्ति कि इच्छा रखते हैं। हमें कुछ उपदेश दीजिये। 

रावण हल्का सा मुस्कुराया व बोला -- लक्षमण ये है ज्ञान लेने का तरीका। मैं जानता हूँ श्रीराम परब्रह्म हैं। परब्रह्म होते हुये भी देखो वो किस तरह मेरे पैरों की ओर खड़े हैं। ज्ञान लेने के लिये झुकना होता है। तुम मेरे सिरहाने पर खड़े होकर बोल रहे थे। श्रीराम! आपको मैं क्या ज्ञान दूँ? आप तो ज्ञान के भण्डार हैं। फिर भी आपको अपना अनुभव मैं बताता हूँ। वहाँ पर बहुत सी बातें उसने बोलीं, उनमें कुछ बात यह है मैं इतना शक्तिशाली था कि देवता मेरे अधीन कार्य करते थे। ग्रह मेरे घर में पानी भरते थे। मैंने एक दिन सोचा कि लंका वासियों के लिये और अच्छा करते हैं। क्या करूँ? मैं कुछ ऐसा करता हूँ कि यहाँ से स्वर्ग तक सीढ़ियाँ बना देता हूँ ताकि अगर उनकी घूमने कि इच्छा हो तो वे स्वर्ग में रह के आये, हो कर आये, मैं ये कर सकता था क्योंकि सारे देवता मेरे अधीन थे और जिन दिनों मैं ये सोच रहा था कि मैं यह करूँ, उन दिनों श्रीराम आपने मेरी बहिन के नाक-कान कटवा दिये तो वो रोते-रोते आयी और बोली भैया! ये मेरी नहीं आपकी नाक कटी है, मैं तो तिलमिला गया। मुझे गुस्सा आ गया। उसने सारी बात बताई तो मैंने कहा जिन्होंने मेरी बहिन की नाक काटी है उनकी स्त्री को उठा कर ले आऊँगा। और मैं सीताजी को ले आया, उसका परिणाम आप देख ही रहे हो। 

लक्ष्मण मैं यह कहना चाहता हूँ कि मेरे मन में बड़े ही अच्छा कार्य करने की इच्छा थी, स्वर्ग तक मार्ग बनाने की, सीढ़ी बनाने की। किन्तु मैं दूसरे की पत्नी को उठा कर ले आया। मैंने अच्छे कार्य को टाल दिया और बुरा कार्य करने चल दिया। परिणाम ये है। मेरा अनुभव है कि शुभ कार्य को टालना नहीं चाहिये, अच्छा कोई विचार मन में आ जाये, कोई बात मन में आ जाये, तो उसे शीघ्रता से कर देना चाहिये, बुरे विचार को टाल देना चाहिये। 

भक्त यही करता है, भक्ति के अनुकूल कार्यों को करता है और प्रतिकूल भाव को टालता है।

बुधवार, 16 अक्तूबर 2019

भगवद्-भक्तों की स्थिति

भगवान का शरणागत भक्त अपने हृदय में केवल भगवान की कृपा को ही अनुभव करता है। वो ऐसी स्थिति में होता है तो बहुत धन हो तो भी खुश नहीं और बहुत कंगाल हो तो तो भी शिकायत नहीं,  दीर्घ जीवन है तो सेवा में व्यस्त, अचानक मौत देखेगा तो केवल अपने प्रभु को स्मरण ही करेगा।

एक बार डाक्टर ने जब श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के प्राक्तन आचार्य श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज से कहा कि अब ज्यादा समय नहीं है तो उन्होंने कहा कि मुझे वहाँ ले चलो जहाँ मेरे गुरुजी ने शरीर छोड़ा था, मैं वहीं शरीर छोड़ूँगा। उनके सेवक जब यह सुनकर रोने लगे तो वे हैरान होकर बोले -- इसमें रोने की क्या बात है? सारी ज़िन्दगी क्या बोलते रहे हैं? भगवान कृष्ण कहते हैं जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु अवश्य होगी। हमने सारी ज़िन्दगी भगवान कृष्ण की बात का प्रचार किया है कि जो आया है वो जायेगा ही, मृत्यु लोक है ये इसमें रोने की क्या बात है? ये क्या प्रचार हुआ, कि दूसरों को तो सुना रहे हैं और जब अपने पर आये तो रोने लगे। 
हमारे चण्डीगढ़ मठ के पूर्व इन्चार्ज श्रील निष्किन्चन महाराज जी ने इस संसार से जाने से कुछ दिन पहले, 1-2 सप्ताह पूर्व अपने सेवकों को कहा -- लड़को! कोई शुभ दिन देखो, मैंने जाना है। वो ऐसे बोल रहे हैं जैसे उन्होंने किसी दूसरे शहर घूमने जाना है। उन्होंने स्वयं ही अपने जाने का दिन निश्चित कर लिया -- एकादशी तिथि। उन्हें एकादशी से बहुत प्यार था। उस दिन मंगला आरती से पहले मन्दिर आ गये और सभी से बारी-बारी महामन्त्र सुनाने के लिये कहा और कहा की इसे जपते रहना, मैंने आज चले जाना है। उस दिन जो भी मिला, उससे महामन्त्र सुनते और बताते कि मैंने चले जाना है।

हमारी गुरु बहिन ने कहा -- महाराज आप ऐसे कैसे बोल रहे हैं कि मैंने चले जाना है, आपसे तो बहुत कुछ सीखना है मैंने। आपने कहा -- मैंने जो सिखाना था, सिखा दिया, मैंने आज चले जाना है।

उसी रात को दूध का गिलास हाथ में ले और भगवद् स्मरण करते-करते चले गये। यह है भगवद्-भक्तों की स्थिति। 

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2019

जब श्रीमती राधाजी ने आपको अपना कहा


प्रसिद्ध टीकाकार व महान वैष्णवाचार्य श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर्जी ने श्रील कृष्ण दास कविराज गोस्वामीजी के सम्बन्ध में जो लिखा है उससे यह पता चलता है कि श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी जी श्रीमती राधारानी जी के निजजन थे तथा स्वाभाविक रूप से ही उनके हृदय में भगवत् तत्त्व प्रकाशित था।

श्रील कविराज गोस्वामीजी ने कामगायत्री के अक्षरों की संख्या 25 बोलने

के स्थान पर 24-1/2 (साढ़े चौबीस) क्यों बोली, समझ न आ पाने के कारण श्रील चक्रवर्ती पादजी बहुत विह्वल हो उठे। यहाँ तक कि इस विह्वलता से उन्होंने राधाकुण्ड के तट पर देह त्याग का संकल्प ले लिये।

देहत्याग का संकल्प करने पर मध्यरात्रि को तन्द्रावस्था में उन्होंने स्वप्न में देखा -- स्वयं वृषभानुनन्दिनी जी उनके पास आकर कह रही हैं - 'हे विश्वनाथ! हे हरिबल्लभ! आप उठो! कृष्णदासकविराज ने जो लिखा वह सत्य ही है। वह मेरी नर्म सहचरी है। मेरे अनुग्रह से ही वो मेरे अन्दर की सब बातें जानते हैं। उनके वाक्यों पर सन्देह नहीं करना। 'वर्णागमभास्वत' ग्रन्थ में लिखित है कि 'य' कार के पश्चात् 'वि' अक्षर रहे, तो वह 'य' कार आधा अक्षर कहलाता है। अत वह 'य' कार ही आधा अक्षर है। '
श्रील कृष्ण्दास कविराज जी ने के श्रीपाट श्रीझामटपुर में श्रीनित्यानन्द


प्रभुजी का अति छोटा पादपीठ मन्दिर है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इसी स्थान पर श्रील कविराज गोस्वामीजी ने श्रीनित्यानन्द प्रभुजी की कृपा प्राप्त की थी।

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी जी की जय!

श्रील रघुनाथ भट्ट गोस्वामी - तिरोभाव तिथि पर विशेष

श्रील रघुनाथ भट्ट गोस्वामी जी जब श्रीमन्महाप्रभु जी के पास नीलाचल में रहते थे, तब आप बीच-बीच में श्रीमन्महाप्रभु जी को निमन्त्रित करके अपने घर में बहुत प्रकार के परम सुस्वादु व्यंजन तैयार करके भोजन कराते थे। रघुनाथ भट्ट गोस्वामी जी रसोई बनाने में अत्यन्त सुनिपुण थे। श्रीमन्महाप्रभु जी भक्त के द्वारा प्रेम से दिये अमृत के समान पकाये व्यंजनादि का भोजन करके परम तृप्ति का अनुभव करते थे। आपका अपूर्व कण्ठस्वर था। आप भागवत का पाठ करने के समय भागवत का एक एक श्लोक इतने सुमधुर कण्ठ स्वर में व बहुत से रागों के साथ पाठ करते थे, जिसे सुनने मात्र से ही भक्तिगण आपके प्रति परम आकृष्ट हो उठते थे।