शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

नाम कीर्तन करना, चिन्तन करना पुण्य हो सकता है, भक्ति नहीं, सुकृति भी हो सकती है किन्तु भक्ति नहीं।

एक बार हिरण्यक्षिपु ने श्रीप्रह्लाद जी से पूछा कि कोई अच्छी बात जो अब तक सुनी उसके बाते में बताओ तो प्रह्लाद महाराज ने कहा कि जहाँ सन्त-साधु नहीं आते, वो घर रहने के लायक नहीं है, ऐसा घर तो अन्धे कुँए के समान है। 

अन्धा कुँआ अर्थात् जहाँ पानी न हो, और कोई अगर उसमें गिर जाये तो कोई नहीं आयेगा बचाने के लिये। जिस घर में सन्तों का आना-जाना नहीं होता, उस घर के लोग परेशान रहते हैं। ऐसे घर में सभी परेशान होते हैं, दुःखी होते हैं लेकिन उन्हें बताने वाला नहीं होता कि तुम्हारे दुःख का कारण क्या है?  वैसे दुखी तो सभी हैं लेकिन उनको कोई बताने वाला नहीं होगा कि दुःख का कारण क्या है। बिमारी है, लेकिन उसको बताने वाला भी तो कोई होना चाहिये। ऐसे घर के वासी, जहाँ सन्त नहीं आता जीवन भर व्यर्थ के कामों से परेशान रहकर, मनुष्य जन्म समाप्त कर लेते हैं और यह सुवर्ण  अवसर गंवा देते हैं। हिरण्यक्षिपु को गुस्सा बहुत आया कि मैंने जिनके पास इसे पढ़ने के लिए भेजा, उन्होंने इसे ये शिक्षा दी। क्योंकि वो तो नास्तिक न-1 है। उसने जब इनके शिक्षक को पूछा कि क्या तुमने इसको ये शिक्षा दी, तो उन्होंने कहा - नहीं ये शिक्षा हमने नहीं दि।

-- अच्छा! इसको ठीक से पढ़ाओ।
पिछले अनुभव को याद रखते हुए हिरण्यक्षिपु ने इस बार नये ढंग से पूछा कि तुम्हारे गुरु ने जो तुमको शिक्षा दी, उसमें से कोई अच्छी बात बताओ…तब प्रह्लाद महाराज जी ने नवधा भक्ति के बार में बतया।

इसमें सबसे बढ़िया बात जो सामने आयी………उसका सार ये है कि भगवान की कथा, महिमा सुननी चाहिये, भक्तों की महिमा सुननी चाहिये, बोलनी चाहिये, चिन्तन करना चाहिये। लेकिन मूल बात है कि अपने आप को भगवान के चरणों मे समर्पित करने क बाद ही नवधा भक्ति होती है।

कोई व्यक्ति हरिकथा सुन रहा है, कीर्तन सुन रहा है तो हम यह नहीं कह सकते कि श्रवण-भक्ति हो रही है उसकी। एक व्यक्ति ज़ोर-ज़ोर से भगवन का नाम-गान कर रहा है, किन्तु ज़रूरी नहीं कि उसकी कीर्तन-भक्ति हो रही है। श्रीप्राह्लाद महाराज जी, श्रीनारद गोस्वामी जी की बात बता रहे हैं।
पिताजी के प्रश्न करने पर प्रहलादजी ने सोचा कि गुरु की शिक्षाओं में से बोल रहे हैं तो गुरु तो वो होता है तो अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाये। जो मेरे वर्तमान गुरु हैं, वे मुझे अन्धकार की ओर ले जा रहे हैं। स्वयं भी अन्धकार में ही हैं। गुरु तो मेरे नारद जी हैं जिन्होंने मुझे भागवत कथा सुनाई, अतः उनकी बात सुनाऊँगा।

नारद जी अर्थात् जिनकी बात कभी रद्द नहीं होती, कटती नहीं, बेकार नहीं जाती। 
....................तो………………उन्होंने कहा कि अपने आप को भगवन के चरणों में समर्पित करके जब हरिकथा श्रवण होगी तो श्रवण-भक्ति होगी, अपने आप को भगवान के चरणों में समर्पित करके जब हरिकथा बोली जायेगी तो कीर्तन-भक्ति होगी। उससे पहले तो हरिकथा सुनना, कीर्तन करना, चिन्तन करना पुण्य हो सकता है, भक्ति नहीं, सुकृति भी हो सकती है किन्तु भक्ति नहीं।

मंगलवार, 2 जुलाई 2019

तुम मेरा सुख चाहते हो या अपना सुख…


एक बार श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने अपने भक्तों से कहा की उन्हें वृन्दावन जाने की बहुत इच्छा है। महाप्रभु जी की तीव्र - उत्कण्ठा को देख कर भक्तों ने उन्हें विजयदश्मी के दिन जाने का परामर्श दिया। भक्तों की इच्छा के अनुसार ही श्रीमहाप्रभु जी ने विजयदश्मी के दिन, वृन्दावन के लिए यात्रा प्रारम्भ की।

राजा प्रतापरुद्र ने जाने के पथ पर अनेक प्रकार से सहायता की।

चित्रोत्पल नदी पार होने पर श्रीराय रामानन्द, महाराज प्रतापरुद्र और 


हरिचन्दन, श्रीमहाप्रभु के साथ चल पड़े।

भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी का विच्छेद सहन न कर सकने के कारण श्रीगदाधर पण्डित भी श्रीमहाप्रभु जी के साथ चल पड़े। तब श्रीमहाप्रभु जी ने आपको अपना क्षेत्र संन्यास व्रत छोड़ने के लिए मना किया।
इसके जवाब में श्रीगदाधर पण्डित जी, श्रीमहाप्रभु जी से बोले, 'जहाँ आप हैं, वहीं पुरुषोत्तम धाम (नीलाचल) है । जहाँ तक क्षेत्र संन्यास की बात है -- भाड़ में जाये मेरा क्षेत्र संन्यास्।'

{कुछ समय पहले आपने श्रीपुरुषोत्तम धाम में क्षेत्र संन्यास (पुरुषोत्तम क्षेत्र कभी भी न छोड़ने का व्रत) का व्रत लिया था। तब श्रीमहाप्रभु जी ने आपको श्रीटोटा गोपीनाथ जी की सेवा प्रदान करते हुए यमेश्वर टोटा (अर्थात् यमेश्वर के उपवन) में रहने के लिए निर्देश दिया था }



श्रीमन्महाप्रभु जी ने पुनः श्रीगोपीनाथ जी की सेवा छोड़ने को निषेध किया तो पण्डित जी बोले, 'आपके पादपद्मों के दर्शनों से ही करोड़ों गोपीनाथों की सेवा हो जायेगी।'

श्रीमन्महाप्रभु जी के यह कहने पर कि श्रीगोपीनाथ जी की सेवा छोड़ने में दोष होगा, आपने कहा, 'प्रतिज्ञाभंग और गोपीनाथ जी की सेवा त्याग का जो दोष होगा, वह मेरा ही होगा। आप बस चलने की आज्ञा प्रदान करें। मैं अकेले ही शची माता (श्रीमहाप्रभु जी की माता जी) के दर्शन करने जाऊँगा, आपको कोई कष्ट नहीं दूँगा।'

श्रीगदाधर जी की अद्भुत श्रीगौरांग प्रीति को समझने की श्रीमन्महाप्रभु जी के अंतरंग पार्षदों के अतिरिक्त और किसी की सामर्थ्य नहीं है। राग मार्ग का प्रेम आसानी से समझ में नहीं आता। श्रीगदाधर जी महाप्रभु जी के लिए अपनी प्रतिज्ञा, कृष्ण-सेवा, सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार हैं। 


कटक में पहुँचने के पश्चात् श्रीमहाप्रभु जी ने श्रीगदाधर पण्डित को बुला कर कहा कि ये तो निश्चय हो गया कि तुम अपना उद्देश्य, प्रतिज्ञा और सेवा छोड़ दोगे तथा मेरे साथ चलने में तुम्हें सुख होता है किन्तु ये बताओ कि तुम मेरा सुख चाहते हो कि अपना सुख चाहते हो? यदि मेरा सुख चाहो तो नीलाचल वापिस चले जाओ। और अब यदि कोई बात बोली तो तुम्हें मेरी शपथ।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी अपनी रचना 'श्रीगौर पार्षद एवं गौड़ीय वैष्णव-आचार्यों के संक्षिप्त जीवन चरित्र' में बताते हैं की श्रीकृष्ण लीला में जो श्रीमती राधा जी हैं, गौर-लीला में वे ही श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामी जी हैं।

शुद्ध भक्ति गंगा के भगीरथ


आज से 528 साल पहले नन्द-नन्दन श्रीकृष्ण सारे जीवों को अपना प्रेम वितरण करने के लिए श्रीचैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुये। परन्तु शुद्ध भक्ति अथवा प्रेम-धर्म की शिक्षा के अभाव में एक समय ऐसा भी आया जब गौड़ीय जगत में एक तरह का अंधकार छा गया। शिक्षित समाज चैतन्य महाप्रभु का नाम लेने से ही नाक-भौं सिकोड़ने लगा। उस समय भगीरथ की तरह शुद्ध भक्ति गंग़ा का पुनः प्रवाह इस जगत में लेकर आये --- श्रील भक्ति विनोद ठाकुर।

श्रील भक्ति विनोद ठाकुर और श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद जी ने हम सब के कल्याण के लिए चैतन्य महाप्रभु की शिक्षा का इतने सुन्दर तरीके से प्रचार-प्रसार किया कि आज पूरे विश्व में 4000 से अधिक प्रचार केन्द्र और 6000 से अधिक website भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी व श्रीभक्ति विनोद ठाकुर जी की विचार-धारा का प्रचार-प्रसार कर रही हैं।

श्रीचैतन्य महाप्रभु के पार्षद श्रीरूप-सनातन जी ने जिस प्रकार अपने दिव्य प्रभाव से श्रीब्रज-मण्डल में श्रीकृष्ण जी की लीला स्थलियों को प्रकाशित किया, उसी प्रकार श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी ने श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के प्रकट-स्थान व श्रीमहाप्रभु जी की विभिन्न लीला-स्थलियों को प्रकाशित किया इसीलिये श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी को सप्तम गोस्वामी कहा जाता है ।

एक स्वरचित भजन में आपने कहा है कि अपने दुर्लभ मानव जन्म के प्रति हमेशा सजग रहें क्योंकि ये स्वर्ण अवसर कभी भी छिना जा सकता है। इसके इलावा आपकी अपने परिवार, समाज व देश के प्रति जो भी कर्तव्य हैं, उन्हें करें परन्तु जीवन की हरेक परिस्थिति में बड़े यत्न के साथ हरिनाम का आश्रय लिये रहें।

जीवन अनित्य जानह सार, ताहे नानाविध विपद भार,
नामाश्रय करि यतने तुमि, थाकह आपन काजे ।
अखिल भारतीय श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के प्रधानाचार्य, परमाराध्य श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी कहते हैं --

गौड़ीय मठ = श्रील भक्ति विनोद ठाकुर

एवं

गौड़ीय मठ -  (minus) श्रील भक्ति विनोद ठाकुर = 0, अर्थात् श्रील भक्ति विनोद ठाकुरजी के बिना गौड़ीय मठ = 0

श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी की जय !!!!

गुरुवार, 13 जून 2019

मारबि राखबि यो इच्छा तोहारा

भगवान से मांग-मांग करके इतनी ज़िन्दगी जी ली है हमने, क्या हुआ, क्या हम सुखी हुये? 

उसका कारण यह है कि हमने अपने आप को उनको समर्पित नहीं किया है। 
भगवान की वो बात, कि 
तू करता है वो, जो तू चाहता है, 
होता है वो जो मैं चाहता हूँ। 
तू कर वो जो मैं चाहता हूँ, 
तो होगा वो जो तू चाहता है। 

अतः एक बार अपने आप को उनको समर्पित करके तो देखो, एक बार दिल से यह कह के तो देखो कि हे भगवान कुछ नहीं मांगता हूँ मैं, बस आप प्रसन्न रहें, आपकी सेवायें मिलती रहें, आपके भजन में लगा रहूँ, बस यही चाहिये। तब देखो क्या होता है? सुख मिलता है कि नहीं?

जब प्रह्लाद जी की तरह भगवान से भगवन की सेवायें माँगेगे, ध्रुव जी की तरह भगवान से कुछ नहीं मांगेगे, हमारे श्रील रूप गोस्वामी - श्रील सनातन गोस्वामी जी की तरह भगवान से भगवान की भक्ति ही चाहेंगे, तब प्रह्लाद जी की तरह, ध्रुव जी की भगवद् प्राप्ति के बाद का जीवन, हनुमान जी की तरह जीवन, रूप गोस्वामी - सनातान गोस्वामी की तरह जीवन आनन्द से भरपूर रहेगा।

इसलिये कहते हैं -- जब मैंने आपके चरणों में अपने को दे ही दिया तो मैं आपका हूँ मेरी सारी जिम्मेवारियां आपकी हैं। मेरा कोई उतरादायित्व नहीं है, न ही मेरी कोई इच्छा है, बस ये इच्छा है कि मेरी रज़ा उसी में हो जिसमें आपकी रज़ा है। हे भगवान जो आपको पसन्द हो, वही हम चाहेंगे और कुछ नहीं।

ब तक ये भावना नहीं आयेगी, तब तक हम आगे नहीं बढ़ सकते भक्ति में और न ही सुखी हो सकते हैं।

महान वैष्णवाचार्य श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी ने भजन लिखा कि प्रभो, मैंने आपके श्रीचरणों में अपने आप को समर्पित कर दिया है, अब मुझे कोई चिन्ता नहीं है कि आप मुझे बहुत सम्पदा दे रहे हो या सब कुछ मुझ से ले रहे हो। मैं तो चौकीदार हूँ। आप मुझे सामान दोगे संभाल के रखने के लिये तो मैं रख लूंगा, आप मालिक हैं सामान अगर मंगवा लेंगे तो मैं वापिस दे दूँगा।

जहाँ तक एक समर्पित भक्त की स्थिति हो जाती है, वो कहता है


मारबि राखबि यो इच्छा तोहारा। 
नित्यदास प्रति तुया अधिकारा॥

हे प्रभो! अब चाहे आप मुझे मारो अथवा रखो, अपने इस नित्य दास के प्रति आपका पूरा अधिकार है। मैं इस संसार में रहूँ या ना रहूँ, ये सब  आपकी इच्छा पर निर्भर करता है। मैं कुछ नहीं कहूँगा…क्योंकि  मैं आपका सेवक हूँ। बस सेवा में लगा के रखना, चाहे मुझे आप कहीं भी रखो। 

……यानि कि  भगवद् भक्त को मौत का खौफ़ भी नहीं होता है। 


सनातन  गोस्वामी जी ने एक जगह लिखा …कि शुकदेव गोस्वामी जी जब परीक्षित महाराज को भागवत कथा सुना कर चले गये तो परीक्षित महाराज मन ही मन में सोचने लगे कि ॠषि बालक ने मुझे शाप दिया था कि सात दिन में तक्षक नाग से डसने पर मेरी मृत्यु हो जायेगी। सात दिन तो हो गये। मेरे गुरुदेव परमहंस शुकदेव गोस्वामी जी ने भागवत कथा भी सुना दी, अब कब ये तक्षक आयेगा और मुझे डसेगा। कब मैं धाम की ओर कूच करूँगा? 


यह भी सोचते हैं कि हो सकता कि तक्षक ना आये, मैंने जो भागवत कथा सुनी उससे मेरी मौत टल गयी हो। फिर एक और विचार आया कि नहीं नहीं, तक्षक्र को आना चाहिये मुझे डसना चाहिये…। उससे ॠषि की बात झूठी नहीं पड़ेगी, मैं भी रहना नहीं चाहता हूँ। मैं तो अब प्रभु के दरबार में Back to God, Back to Home, जाना चाहता हूँ। 
तक्षक की इंतज़ार में उसे बुलाते हुए परीक्षित महाराज बैठे हैं कि तभी माता उतरा आती है और देखती है कि मेरा पुत्र एक तरह से मौत के मुँह में बैठा है और कभी भी तक्षक आयेगा और ये हमेशा के लिये दूर चला जायेगा। लेकिन वो देखती है कि कितने आनन्द से  बैठा है, चेहरे पर कोई शिकन नहीं, कोई चिन्ता नहीं, कोई डर नहीं, 

…उतरा ने अपने पुत्र से कहा - बेटा आज जो तेरी स्थिति  है…कि  तू मौत का इंतज़ार आनन्द से कर रहा है, ये जो स्थिति है ये तुझको प्रदान करी,  है तेरे गुरुदेव शुकदेव गोस्वामी ने। ये जो तेरे चेहरे पर आनन्द झलक रहा है, मुझे बता कि उसका क्या राज है| जो भी तूने अपने गुरूदेव से सुना, मुझे उसका सार ही सुना दे। 

इधर परीक्षित महाराज सोचते हैं कि मैं इस चन्तन में था कि कथाओं का स्मरण करते करते कूच करूँगा लेकिन माँ आ गयी है और माँ ने मुझे आदेश किया है, अब मैं उनकी बार पूरी कर देता हूँ। 

.............माँ मैंने वही सुना जो आपने भी सुना। जब मेरे गुरुदेव शुकदेव गोस्वामी जी कथा सुना रहे थे, तो आप भी तो वहीं बैठी हुई थीं!

उतरा ने कहा - बेटा बैठी तो मैं थी किन्तु मन नहीं था।


-- आप क्या सोच रही थीं, माँ।

-- इस दर्द को तू नहीं समझ सकता है, उसे माँ ही समझ सकती है। जिसका गुणवान पुत्र उसे छोड़ कर जा रहा हो वह माँ अपने पुत्र अलावा किस तरफ ध्यान करेगी? मैं तो दिन गिन रही थी…तेरे चेहरे की रौनक देख कर मैंने जाना कि मैं गलत थी। जिसको तक्षक ने डसना है व इतने आनन्द में है… तो बेटा जो भी है सार बात बता…।

माँ के कहने पर परीक्षित महाराज जी सार बात बताते हैं।

श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी ने लिखा-  मारबि राखबि यो इच्छा तोहारा…ऐसी स्थिति हो जाती है अगर भगवान के शरणागत हो जायें तो।

We have always asked for something from Supreme Lord. We always want something from Him. Has this given us any happiness? Even if our desire is fulfilled, happiness eludes us. Why?

This is because, we have not surrendered unto Him.


Supreme Lord says, 


You do what you want, 

but results are per My desire. 
You do what I want,
then results will be per your desire.


Hence atleast once try to surrender unto Him. Atleast once say from the core of your heart - O Lord! I do not desire anything. I want You to be happy. I only want Your services. I want to perform bhajan. 

Once this desire is from your heart, peace will descend.

When we will desire for services like Prahlad Maharaj, Dhruv Maharaj, Srila Sanatan Goswami, Srila Rupa Goswami, automatically we will be happy. This we can observe from the pastimes of these devotees of Supreme Lord.

That is why it is prayed - When  have surrendered unto You, my all the responsibilities are Yours. I have not responsibility. I have no desire. My only desire is Your desire. O Lord! I will do, what You like.

Till we get this desire, neither can we progress in bhajan and nor we will be at peace.


Great Vaishnav Acharya Srila Bhakti Vinod Thakur wrote in one of His bhajans - O Lord, I have surrendered myself unto Your Lotus Feet. I have no worries. I am worries whether you provide me with money or whether you maintain me without money. I am like a watchman. Whatever You will give me, I shall preserve. You are the Owner. Whenever You will ask me to return the objects, I shall return to You immediately.

A surrendered devotee will always say from his heart --

Marabi rakhabi yo icchha tohara, nityadas prati tuya adhikara.

O Lord! You may kill me or let me live. This is your choice. You have complete right on this slave of Yours.Whether I live in this world or not will depend on Your desire. I will not say anything, as I am Your servant. The only condition would be that please continue to engage me in Your services.

.................this means a pure devotee of Supreme Lord is not afraid of death.

Srila Sanatan Goswami mentions that when Srila Sukadeva Goswami left after reciting Sreemad Bhagavatam to King Parikshit, he was wandering that its been 7 days and now Takshak will come over to kill me. When shall I leave to dham?

He had second thoughts. It is possible that Takshak may not come as I have listened to Sreemad Bhagavatam for 7 days. Then he thinks, no.....no......words of a sage should not go wrong. I want to Go Back to God, Back to Home.

While waiting for Takshak, mother of King Parikshit approaches him and observes that his son is patiently waiting for his death. She asks him how are you so calm? Your Gurudeva has blessed you by His words. Can you repeat some of them again?

King Parikshit was meditating on pastimes of Sree Krishna. But answered to his mother............He said - O Mother! You were also listening to what He was saying!


Mother - Yes, but my thoughts were totally on you. I was thinking about you throughout.,


King Parikshit then summarized the lectures of Srila Sukadeva Goswami.



Srila Bhakti Vinod Thakur wrote - 
marabi, rakhabi yo ichha tohara, 

.....this is the situation of surrendered soul.