बुधवार, 21 अप्रैल 2021

श्रीहनुमान जी जब भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी की लीला में आये

 श्रीमुरारी गुप्त जी के माध्यम से भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने इष्टनिष्ठा की शिक्षा प्रदान की तथा वे भी बताया कि आराध्यदेव में निष्ठा के बिना प्रेम बढ़ता नहीं। हनुमान जी के अवतार मुरारीगुप्त जी महाप्रभु जी का राम रूप से दर्शन करते थे। आपकी इष्ट निष्ठा की परीक्षा लेने के लिये श्रीमहाप्रभु जी ने आपसे कहा - 'सर्वाश्रय, सर्वांशी, स्वयं भगवान्, अखिल रसामृत मूर्ति - व्रजेन्द्रनन्दन श्री कृष्ण के भजन में जो आनन्द है, भगवान के अन्य स्वरूपों की आराधना में वह आनन्द नहीं है।' श्रीमुरारीगुप्त श्रीमहाप्रभु जी को कृष्ण-भजन करने का वचन देने पर भी घर में आकर यह सोचकर कि भगवान श्रीरघुनाथ जी के पादपद्मों को त्याग करना होगा, अस्थिर हो उठे। सारी रात जाग कर ही बिता देने पर, दूसरे दिन प्रातः महाप्रभु जी के पादपद्मों में निवेदन करते हुये बोले -'मैंने अपने इस मस्तक को श्रीरघुनाथ जी के चरणों में बेच दिया है। परन्तु अब मैं पुनः वहाँ से इस सिर को नहीं उठा सकता हूँ। अब इस दुविधा में मैं दुःख पा रहा हूँ कि श्रीरघुनाथ जी के चरण मुझसे छोड़े नहीं जाते। किन्तु यदि नहीं छोड़ता तो आपकी आज्ञा भंग होती है। कुछ समझ में नहीं आता, क्या करूँ ? आप दयामय हैं, मेरे ऊपर ऐसी कृपा करो कि आपके सामने ही मेरी मृत्यु हो जाये, तब यह संशय समाप्त हो जायेगा।'                                                                                                                            

भगवान  श्रीमन्महाप्रभु  मुरारीगुप्त के इष्टनिष्ठायुक्त वाक्य सुनकर परम सन्तुष्ट होकर बोले -'तुम तो श्रीराम जी के किंकर साक्षात् हनुमान हो, तुम भला उनके चरण कमलों को कैसे छोड़ सकते हो? सचमुच वह भक्त धन्य है, जो किसी भी परिस्थिति में अपने प्रभु के चरण नहीं छोड़ता है और वही प्रभु धन्य हैं, जो कभी भी अपने जन को नहीं छोड़ते हैं।'

आपकी भगवान के प्रसाद के प्रति अटूट निष्ठा थी

दुनियावी दृष्टि से आपके अन्दर संसार के प्रति वैराग्य व भगवान के नाम, भगवान के धाम व भगवान के भक्तों तथा यहाँ तक कि भगवान के प्रसाद के प्रति इतना अनुराग था कि यदि कोई भक्त आपको भगवान केए प्रसाद देता तो आप 'ना' नहीं बोलते थे। आपकी धारणा ये थी कि प्रसाद तो भगवान की कृपा होती है। 

संस्कृत में प्रसाद का अर्थ तो कृपा होता है। ये भक्त मुझे भगवान की कृपा दे रहा है, मैं भला इसे मना कैसे कर दूँ? 

कई बार तो ऐसा भी हुआ कि आपके गुरुदेव को हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने प्रसाद बाँटने वाले को निर्देश दिया कि वे श्रीकृष्ण बल्लभ (श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी) को उतना प्रसाद दें जितना वे खा सकें। परमारध्य श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज 'विष्णुपाद' जी ने अपने सेवकों को बताया कि कृष्ण-वल्लभ तो परमहंस है, उसे इन बातों की सुध-बुध नहीं है, तुम्हें ध्यान से उन्हें प्रसाद देना होगा।
ऐसा तो कई बार देखा गया कि आप प्रसाद के साथ पत्तल भी खा गए, ये समझ कर कि इस पत्तल  को कैसे फेंकूँ, इसमें तो जहाँ-तहाँ भगवान का प्रसाद लगा है। ये घटनाएँ ठीक उसी प्रकार हुईं जैसे परम वैष्णव श्रीमाधवेन्द्र पुरीपाद जी के लिए जब श्रीगोपीनाथ भगवान ने खीर चोरी करके पुजारी के हाथोंं उनके पास भिजवाई तो श्रीमाधवेन्द्र पुरी जी ने श्रीगोपीनाथ भगवान के भाव में डूअबकर खीर तो खायी ही, साथ हि साथ मिट्टी के कुल्हड़ को भी तोड़-तोड़ कर खाया जिसमें गोपीनाथजी का खीर 
प्रसाद आया था।

लीला में भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के परम भक्त श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद जी व भगवान गोपीनाथ जी के खीर की कथा निम्न प्रकार से है --

उड़ीसा के श्रीगोपीनाथ मन्दिर में सायंकाल जब श्रीमाधवेन्द्र पुरी जी पहुँचे तो किसी ने उन्हें बताया कि संध्या के समय श्रीगोपीनाथ जी को प्रतिदिन खीर का भोग लगता है। खीर का नाम है ---- 'अमृतकेलि'। मिट्टी  के केंद्रीकरण बर्तनों में भरकर इस अमृत अमान खीर का भोग लगता है। यह खीर गोपीनाथजी की खीर के नाम से प्रसिद्ध है। ये ऐसा दिव्य-भोग है कि पृथ्वी पर और कहीं नहीं मिलता है। 
बात चल ही रही थी कि उसी समय 'अमृतकेलि' खीर का भोग ठाकुरजी को निवेदन किया गया। तब श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद ने मन-मन में विचार किया कि बिना माँगे ही यदि खीर का प्रसाद मिल जाता तो मैं उसका आस्वादन करता और ठीक उसी प्रकार की खीर का भोग अपने गोपालजी को लगाता किन्तु साथ-साथ उन्होंने अपने आप को धिक्कार दिया कि मेरी खीर खाने की इच्छा हुई।

अतः वे ठाकुरजी की आरती दर्शन करके और उन्हें प्रणाम करके मन्दिर से 
बाहर चले आए और सुनसान पड़े बाज़ार में बैठ कर हरिनाम करने लगे। श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद जी अयाचक वृत्ति के थे। उन्हें भूख-प्यास का कोई बोध ही न था। वे हमेशा ही प्रेमामृत पान करके तृप्त रहते थे। इधर पुजारी जी अपने ठाकुरजी की पूजा आदि कार्य स्मापन करके जब सो गए तो स्वप्न में ठाकुरजी कहने लगे ---

उठह पूजारी, कर द्वार विमोचन।
क्षीर एक राखियाछि संन्यासी कारण॥
धड़ार अंचले ढाका क्षीर एक हय।
तोमरा ना जानिला ताहा आमार मायाय॥
माधव पुरी संन्यासी आच्छे हाटेते बसिया।
ताहाके त, एइ क्षीर शीघ्र देह लैया
(चै-च-म-  4/127-129)

अर्थात्] पुजारी! उठो! मन्दिर के दरवाज़े खोलो। मैंने एक संन्यासी के लिए एक पात्र में खीर रखी हुई है जो कि मेरे आंचल के कपड़े से ढकी हुई है। मेरी माया के कारण तुम उसे नहीं जान पाये। माधवेन्द्र पुरी संन्यासी हरि (सप्ताह में एक दिन लगने वाले बाज़ार) में बैठा हुआ है। शीघ्र यह खीर ले जाकर उसे दे दो।
स्वप्न देखकर पुजारी आश्चर्यान्वित हो उठे। स्वप्न टूट्ने पर स्नान करने के पश्चात् मन्दिर स दरवाज़े खोले तो देखा ठाकुरजी के आंचल के वस्त्र के नीचे एक खीर का पात्र रखा हुआ है। उस खीर के पात्र को लेकर पुजारी जी हाट में घूम-घूम कर माधव पुरी जी को ढूँढते हुए इस प्रकार पुकारने लगे --- 

क्षीर लह एइ, याँर नाम माधव पुरी।
तोमा लागि, गोपीनाथ क्षीर कैल चुरी॥
क्षीर लञा सुखे तुमि करह भक्षणे। 
तोमा सम भाग्यवान् नाहि त्रिभुवने॥

[अर्थात् जिसका नाम माधवेन्द्रपुरी है, वह यह खीर ले ले, आपके लिए ही गोपीनाथजी ने यह क्षीर चोरी की है। यह क्षीर लेकर आप सुख से इसे खाओ। आपके समान भाग्यवान तो त्रिभुवन में कोई नहीं है।]

ऐसा सुनकर माधवेन्द्रपुरी जी अपने स्थान पर खड़े हुए और उन्होंने पुजारी
को अपन परिचय दिया। पुजारीजी ने उन्हें खीर दी तथा दण्ड्वत् प्रणाम किया। पुजारीजी ने अपने अवप्न में आए हुए आदेश की बात माधवेन्द्रपुरीपाद जी को कही। पुजारी जी की बाअ सुनकर माधवेन्द्रपुरी जी ने प्रेमाविष्ट हृदय से उस खीर-प्रसाद का सम्मान किया और खीर के बर्तन को धोकर व उसके टुकड़े-टुकड़े करके उसे अपने बहिर्वास में बाँध लिया। वे प्रतिदिन उस मिट्टी के एक टुकड़े को खाते और प्रेमाविष्ट हो उठते।

प्रारम्भ से ही भगवत्-प्रसाद के प्रति आपकी निष्ठा अद्भुत है, आज के समय में भी यदि कोई व्यक्ति आपके चरणों को हाथ लगा दे और आपके हाथ से प्रसाद लेने के लिए हाथ पसारे तो आप स्पष्ट रूप से कह देते --- जाओ पहले हाथ धोकर आओ, आपने पैरों को हाथ लगाया, इन हाथों से प्रसाद नहीं लेते।

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

संसार में सबसे सुखी कौन?

 महाभारत में एक प्रसंग आता है, कि एक बार पाँच पाण्डव वन में भटक गये। भटकते-भटकते उन्हें प्यास लगी। ज्यादा थकावट के कारण सभी एक स्थान पर बैठ गये।


युधिष्ठिर महाराजजी ने पहले नकुल, फिर सहदेव, फिर अर्जुन और अन्त में भीम को भेजा जल की खोज में। जब काफी समय हो गया, कोई नहीं लौटा तब युधिष्ठिर महाराज चिन्तित हुये व स्वयं जल व भाईयों की खोज में निकले। कुछ दूर जाने पर एक सरोवर दिखा व समीप ही अपने भाईयों को मृत पड़े देखा। अपने चारों भाईयों की ऐसी अवस्था देखकर बहुत हैरान हुये व सोचने लगे कि घाव का कोई चिन्ह भी नहीं, तो भी मेरे बलशाली, शूरवीर भाई मृत कैसे? 
धैर्य नहीं खोया! जल की प्यास सताई तो समीप के सरोवर से पानी पीने के लिये उठे। स्वच्छ जल जैसे ही अँजुली में भरा तभी एक ध्वनि हुई,'आप ऐसे जल नहीं पी सकते। जल पीने से पहले आपको मेरे प्रश्नों का उत्तर देना होगा अन्यथा आपकी भी वही हालत होगी जो आपके भाईयों की हुई है।'

युधिष्ठिर महाराज ने सिर उठा कर देख कि एक बगुला प्रश्नों के बारे में
कह रहा है। युधिष्ठिर महाराज ने कहा,'एक बगुला मेरे भाईयों को मार सकता है, ऐसा मैं विश्वास नहीं कर सकता। आप कौन हैं? अपने वास्तविक रूप में आयें।' तब बगुले ने यक्ष का रूप धारण कर लिया और कई प्रश्न किये। बहुत महत्व्पूर्ण प्रश्न हैं, वे सभी। उन्हीं में एक प्रश्न था कि संसार में सबसे सुखी कौन है?
युधिष्ठिर महाराज जी ने उत्तर दिया कि संसार में सबसे सुखी व्यक्ति वह है जो अॠणी है, अर्थात् जिस पर कोई ॠण नहीं है। 

यहाँ पर युधिष्ठिर महाराज केवल धन की बात नहीं कर रहे हैं, उनका कहने का तात्पर्य है समस्त प्रकार के ॠण।

आज के जगत् में आम धारणा हो गयी है धन का ॠण लेने की। कोई होम लोन (Home Loan) ले रहा है तो कोई बिस्नस लोन (Business loan), कोइ पर्सनल लोन (Personal loan) ले रहा है तो कोई पढ़ाई के लिये ॠण (Study loan) ले रहा है। अब तो रोज़मर्रा की वस्तुयें भी उधार मिलने लगी हैं। 
थोड़ा सा अगर हम ध्यान दें तो जब हम पर महीने के प्रारम्भ में किसी मासिक किश्त को उतारने का बोझ आ जाता है तो हमें एक तरह से चिंता लग जाती है। हमारे ही देश में कुछ समय पहले कृषि उत्पादकों ने इसी ॠण की परेशानी में आत्मदाह तक कर लिया था। अभी तक तो हम केवल धन के ॠण के कारण ही चिन्तित हैं, अन्य ॠण का तो हमें ध्यान ही नहीं है।

हमारे शास्त्र हमें बताते हैं कि सभी मनुष्य पाँच प्रकार के ॠण से ग्रस्त हैं।
वे हैं ॠषि ॠण, देव ॠण, माता-पिता का ॠण, अन्य प्राणियों का ॠण तथा राजा का ॠण्। ॠषियों ने हमें ज्ञान दिया, देवता हमें वर्षा-धूप-अनाज, इत्यादि देते हैं, माता-पिता हमें बचपन से प्रारम्भ कर सभी कुछ सिखाते हैं, प्राणी मात्र के कारण हमें कपास, अनाज, बने-बनाये मकान, मोटर कार, जहाज, इत्यादि मिलते हैं। राजा अपनी प्रजा का अपने पुत्रों की तरह पालन करता है, सुरक्षा प्रदान करता है, आदि । अतः हम सब इनके ॠणी हैं।


बैंक की किश्त अगर कुछ महीने ना चुकाओ तो वे ॠण (लोन) देना तो बंद करते ही हैं, साथ ही साथ वह वस्तु भी हमसे छीन लेते हैं। उपरोक्त पाँच प्रकार के ॠण देने वालों में से कोई एक भी अगर ॠण देना बंद कर दे तो सोचिये हमारी क्या अवस्था होगी? धन के ॠण के बिना तो हम जीवन निकाल ही लेंगे परन्तु अनाज, हवा, पानी, इत्यादि के बिना तो हम जी ही नहीं पायेंगे। 

सोचिये तो कितना उपकार है इन सबका हम पर।


कोई भी जगत् का व्यक्ति अपकारी अथवा एहसान-फरामोश नहीं कहलवाना चाहता। अब यह जो पाँच प्रकार के ॠण हैं, इनको चुकाये बगैर तो हम सुखी नहीं हो सकते। राजा का ॠण तो हम टैक्स, इत्यादि देकर चुका देते हैं, परन्तु बाकी तो देते ही नहीं। फिर मजे की बात यह है कि कोई व्यक्ति दुःख नहीं चाहता बल्कि सुख ही चाहता है। अब जब ॠण चुकाये बगैर कोई सुखी नहीं हो सकता तो इसका कोई उपाय तो होगा?
हमारे शास्त्र इसकी युक्ति बताते हैं। वह है भगवान की शरण। भगवान की शरण लेने से वे हमें समस्त प्रकार के ॠणों से मुक्त कर देते हैं। सारी सृष्टि के मूल में भगवान हैं। जैसे किसी पौधे के मूल अथवा जड़ में जल देने से उसके पत्ते, टहनी, इत्यादि सबको जल मिल जाता है। केवल पत्ते या टहनी को जल देते रहने से समस्त वृक्ष को जल नहीं मिलता। उसी प्रकार एक-एक ॠण उतारने से सभी ॠण चुकते नहीं हो सकते। बेहतर है कि हम सभी ॠण देने वालों के मूल में जो हैंं अर्थात् सभी के जो स्रोत हैं, श्रीकृष्ण, उनकी शरण में जायें। भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाने से ही हम सुखी हो सकते हैं

रविवार, 28 मार्च 2021

समाज़ में एकता लाने के लिये श्रीचैतन्य महाप्रभुजी का अवदान

वर्तमान समय में जितने भी समाज, धर्म, मत, विचार, इत्यादि प्रचलित हैं, सभी एक ही बात कहते हैं कि भगवान एक हैं, हम सब उनके बच्चे हैं और हमें उनकी सेवा-आराधना करनी चाहिये। यह सिद्धान्त एक होने पर भी हम देखते हैं कि अधिकतर लोगों का आपस में मतभेद है। इसका कारण यह है कि कहने को तो सभी, उपरोक्त शिक्षा का ही प्रचार करते हैं, किन्तु न तो इस शिक्षा को मानते हैं और न ही जीवन में ढालते हैं। इसी कारण से सारा समाज जातिवाद, धर्मवाद, देशवाद, भाषावाद में बंटा है। हर कोई अपने को एक-दूसरे से श्रेष्ठ साबित करने में जुटा है। 


वास्तविकता तो यह है कि श्रेष्ठ तो केवल भगवान हैं और सर्वश्रेष्ठ धर्म भगवान की सेवा है।

अगर यह बात सभी अपने जीवन में ढालें तो आपस में कभी टकराव नहीं होगा, हिंसा नहीं होगी, झगड़ा नहीं होगा। चारों ओर अमन-शान्ति होगी।

जैसे, एक केन्द्र-बिन्दु से एक वृत्त (circle), दो  वृत्त, तीन  वृत्त (अलग अलग आकार के) बनायें
तो वे आपस में टकरायेंगे नहीं, काटेंगे नहीं। किन्तु अलग-अलग केन्द्र-बिन्दु लेकर बनाये गये  वृत्त आपसे में एक-दूसरे को काटेंगे। इसी प्रकार एक परिवार में, एक समाज़ में, एक देश में, अलग-अलग इच्छाओं को लेकर जब संघर्ष होगा तो आपसी झगड़े - तनाव होगा ही, किन्तु जब एक ही मकसद से कोई संघर्ष होगा तो तनाव-झगड़ा होने का मतलब ही नहीं है।
सभी प्राणी एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। क्योंकि सबका एक ही पिता है। जब सभी को इस बात का ज्ञान होगा, एहसास होगा तो इससे आपस में प्रेम - लगाव पनपेगा। प्रेम-पूर्वक व्यवहार से जीवन सुखमय होगा। भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने इसी शिक्षा के ऊपर ज़ोर दिया व प्रचार किया। उन्होंने कहा कि केवल मात्र भगवान के दिव्य प्रेम की अनुभूति से ही हम आपसे में प्रेम-पूर्वक व्यवहार कर सकते हैं व समाज में एकता ला सकते हैं। इससे ही विश्व में शान्ति स्थापित हो सकती है। दिव्य प्रेम की अनुभूति की ओर मार्ग प्रशस्त होता है, इस ज्ञान से -------- कि भगवान से हमारा क्या सम्बन्ध है और सभी प्राणियों से हमारा क्या सम्बन्ध है?

जब हम सभी आपस में सम्बन्धित हैं तो फिर यह इस जाति का है, वो उस मत का है, इत्यादि का
कोई औचित्य नहीं रह जाता। इसी बात को दर्शाने के लिये भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी शूद्र जाति के श्री गोविन्द के हाथों से पका भोजन करते थे। उन्होंने श्रीकृष्ण-प्रेम के सन्देश देने वालों में अग्रणी बनाया -- श्रील हरिदास जी / चाँद काज़ी / पठान बिजली खान, आदि (मुसलमान), श्रील रूप-सनातन-गोपाल भट्ट (ब्राह्मण),  श्रील राय रामानन्द (शौक्र करण कुल),  श्रीनित्यानन्द जी (अवधूत), राजा प्रतापरुद्र  (क्षत्रीय), इत्यादि। यही नहीं क्या संन्यासी (श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी / श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती), क्या गृहस्थ (श्रीवास पण्डित / श्रीसार्वभौम भट्टचार्य), क्या ब्रह्मचारी (श्रील गदाधर / श्रील शुक्लाम्बर), इत्यादि सभी आश्रम के भक्तों के माध्यम से यही सन्देश दिया की मनुष्य जन्म की सार्थकता भगवान के प्रति प्रेम को जागृत करने में ही है। इतना ही नहीं उन्होंने जंगल के जानवरों, पशु-पक्षियों, यहाँ तक की वृक्ष-लतायों (जिनके अन्दर भी आत्मा है) -- सभी के कल्याण के लिये उपदेश दिया। एक बार ऐसा भी देखा गया कि चतुर्मास व्रत करने बंगाल से ओड़ीसा आ रहे भक्तों के साथ चल रहे कुत्ते को स्नेह दिया व उससे भी कृष्ण-नाम करवाया व अपने हाथों से प्रसाद खिलाया।

वैसे भी हर मनुष्य किसी न किसी की सेवा ही करता है। कभी गुरु की, कभी अपने मन की, कभी अपने बच्चों की, कभी पत्नी की, कभी आफिस में बास की, कभी माता-पिता की, कभी मित्र की, इत्यादि। चाहे मनुष्य अंहकार-वश यही कहे कि मैं स्वामी हूँ किन्तु गहरे अध्ययन से वह मान पायेगा की वह एक सेवक ही है। और वह सभी कार्य सुख प्राप्ति के लिये करता है। अब जिनकी सेवा वह सुख प्राप्त करने के लिये कर रहा है, जब वे सब स्वयं दु:खी हैं तो सेवक को सुख कैसे देंगे। सुख तो उसी से मिलेगा, जो सुख का भण्डार हैं, सुख के सागर हैं, अर्थात् भगवान्।

श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने बताया की वास्तव में हर प्राणी सेवक है, परन्तु सेवक है भगवान का।
भगवान को भुलाने के कारण और उनकी सेवा को भूलने के कारण दुःखों से त्रस्त है। भगवान की सेवा करने से ही वह सुखी हो सकता है। उसी सेवा के माध्यम से उसे ज्ञान प्राप्त होगा की उसका भगवान से व अन्य प्राणियों से क्या सम्बन्ध है। और उस ज्ञान प्राप्ति के बाद, भगवान की सेवा करने से दिव्य-प्रेम जागृत होगा।
भगवान के सम्बन्ध के माध्यम से तथा भगवत-प्रेम के प्रीति सम्बन्ध के माध्यम से भगवान

श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने हमारे परिवार, समाज़ व पूरे विश्व-वासिओं की एकता के लिये जो सूत्र हमें दिया, यह सनातन होने के साथ अद्वितीय भी है। कहने का तात्पर्य श्रीचैतन्य महाप्रभु के श्रीकृष्ण-प्रेम के सिद्धान्त के आधार पर हम अपने हृदयों में, अपने परिवार में, अपने प्रदेश में, देश में व पूरे विश्व में शान्ति का अनुभव कर सकते हैं व दूसरों को नित्य शान्ति का अनुभव करवा सकते हैं।

गुरुवार, 25 मार्च 2021

भगवान ने जब आप के लिये खीर चुराई

 एक बार श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद जी अपने सेवित विग्रह श्रीगोवर्धनधारी गोपाल के लिए चन्दन लेने के लिये पूर्व देश की ओर गये।


चलते चलते आप ओड़िसा के रेमुणा नामक स्थान पर पहुँचे। वहाँ पर श्रीगोपीनाथ जी के दर्शन कर आप बहुत प्रसन्न हुये। 

कुछ ही समय में 'अमृतकेलि' नामक खीर का भोग श्रीगोपीनाथ जी को निवेदन किया गया। तब आप के मन में विचार आया कि बिना माँगे ही इस खीर का प्रसाद मिल जाता तो मैं उसका आस्वादन करके, ठीक उसी प्रकार का भोग अपने गोपाल जी को लगाता……किन्तु साथ-साथ ही आपने अपने आपको धिक्कार दिया कि मेरी
खीर खाने की इच्छा हुई।

ठाकुर जी की आरती दर्शन करके और उन्हें प्रणाम करके आप मन्दिर से चले गये, व एक निर्जन स्थान पर बैठ कर हरिनाम करने लगे। 

इधर मन्दिर का पुजारी ठाकुर गोपीनाथ जी की सेवा कार्य समाप्त कर सो गया।

उसे स्वप्न में ठाकुर जी ने दर्शन दिये व कहा -- 'पुजारी उठो ! मन्दिर के दरवाज़े खोलो। मैंने
एक संन्यासी के लिये खीर रखी हुई है जो कि मेरे आंचल क कपड़े से ढकी हुई है। मेरी माया के कारण तुम उसे नहीं जान पाये। माधवेन्द्र पुरी नाम के संन्यासी कुछ ही दूर एक निर्जन स्थान पर बैठा है, शीघ्रता से ये खीर ले जाकर उसको दे दो।'

पुजारी आश्चर्य से उठा, स्नान कर मन्दिर का दरवाज़ा खोला और देखा कि ठाकुर जी के आंचल के वस्त्र के नीचे एक खीर से
भरा बर्तन रखा है। उसके खीर से भरा बर्तन उठाया व श्रीमाधवेन्द्र पुरी जी को खोजने लगा। 

कुछ दूर जाकर श्रीमाधवेन्द्र पुरी जी से उसका मिलन हो गया। पुजारी जी ने अपने स्वप्न में हुए आदेश की बात श्रील माधवेन्द्र जी को बताई। श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद जी सारी बात सुन कर प्रेमाविष्ट हो गये। बड़े ही सम्मान के साथ आपने खीर से भरा बर्तन लिया व भगवान के आदेश के अनुसार प्रसाद पाया।