सोमवार, 29 मई 2017

1st International Bhagavata Mahotsava, Europe

From July 20th to 23rd, 2017 Goloka Dham, Germany
Dear devotees,
We have the pleasure of inviting you for a very special festival. A festival in which sravanam, hearing, will be the main focus. This hearing will not only be directly from the Srimad Bhagavatam, the ripe fruit of all vedic literature but also from that spoken by highly realized souls. Taking time out to just sit down and listen carefully to the transcendental glories of Lord Krsna will inspire and strengthen our spiritual journey. With the hope of serving the vaisnava community under the shelter of Sri Sri Radha Madana Mohan, we are honoured to organize such a festival.
“ Men become strong and stout by eating sufficient grains, but the devotee who simply eats ordinary grains but does not taste the transcendental pastimes of Lord Krsna gradually becomes weak and falls down from the transcendental position. However, if one drinks but a drop of the nectar of Krsna’s pastimes, his body and mind begin to bloom, and he begins to laugh, sing and dance.“ CC Madhya 25.278
प्यारे भक्तो,
हम आप सबको एक अद्भुत उत्सव में आमन्त्रण करना चाहते हैं, जिसमें मुख्यतः श्रवण करने के लिए बहुत कुछ होगा। केवल श्रीमद् भागवतम् ही नहीं अपितु भगवद् अनुभूति प्राप्त भक्तों के श्रीमुख से श्रवण करने का अवसर भी मिलेगा।  भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत लीलाओं को श्रवण करने से हमें आध्यात्मिक बल मिलता है। भगवान श्रीश्रीराधा मदनमोहन जी की कृपा से, सभी भक्तों की सेवा करने की इच्छा से, हम इस उत्सव का आयोजन कर रहे हैं।
मनुष्य अन्न खा कर केवल अपने शरीर को तुष्ट करता है। जबकि भगवान का भक्त भगवान की लीलाओं का रसास्वादन कर अपने शरीर, आत्मा, मन, बुद्धि, आदि सभी को तुष्ट करता है।
इस अद्भुत उत्सव में श्रीराम गोविन्द स्वामी, श्रीमुकुन्द दत्त प्रभु, श्रीब्रजसुन्दर प्रभु जैसे श्रेष्ठ भक्त विभिन्न विषयों पर चर्चा करेंगे।
http://www.vina.cc/2017/05/17/1st-international-bhagavata-mahotsava-europe/

शुक्रवार, 26 मई 2017

क्यों नहीं पहचान पाये राजा ज़रासन्ध श्रीकृष्ण को?

महाराज मुचुकुन्द सूर्यवंश में आविर्भूत हुए थे।  देवताओं के अनुरोध पर महाराज मुचुकुन्द ने बिना सोये निरन्तर काफी लम्बे समय तक असुरों के अत्याचार से देवताओं की रक्षा की थी। जब देवताओं नो स्वर्ग के रक्षक सेनापति के रूप में कार्तिकेय मिल गये तो उन्होंने महाराज मुचुकुन्द को और अधिक कष्ट देना नहीं चाहा। सन्तुष्ट होकर वे महाराज मुचुकुन्द से बोले - हे राजन! आप ने बिना शयन किये हमारे प्रहरी के रूप से बहुत कष्ट सहन किया है, इसलिये अब आप विश्राम कीजिये। आपने हमारा पालन करने के लिए मृत्युलोक के राज्यसुख तक का परित्याग किया है। समस्त विषय-भोगों का त्याग किया है। विशेष बात तो यह है कि इस अन्तराल अमें आप के पुत्र, स्त्री, मन्त्री एवं प्रजा सभी काल के मुख में जा चुके हैं। उनमें से अभी कोई भी नहीं है। पशुपालक जैसे पशुओं को इधर-उधर हाँकता है, उसी प्रकार काल भी खेल करता-करता प्राणियोंं को इधर-उधर परिचालित करता है। हे राजन! हम प्रसन्न होकर आप को आशीर्वाद करते हैं। आप मुक्ति को छोड़कर बाकी कुछ भी हम से वरदान में माँग सकते हैं, क्योंकि मुक्ति तो केवल श्रीविष्णु ही दे सकते हैं।                                            
                                                                                           महाराज 
मुचुकुन्द ने देवताओं की वन्दना की और देवताओं से लम्बी नींद की माँग की।                                                                                   
देवता उनकी इच्छा से बहुत हैरान हुए, किन्तु बोले -- ठीक है, ऐसा ही होगा। यदि कोई आपकी निद्रा भंग करेगा तो वह उसी समय भस्म हो जायेगा। वर प्राप्त कर महाराज मुचुकुन्द एक गुफा में आकर सो गये।

वृहद्रथ राजा के पुत्र ज़रासन्ध मगधदेश के महाप्रभावशाली राजा थे। ज़रासन्ध को एक वरदान प्राप्त था कि जब तक उसको समान रूप से बीच में से चीर कर फेंका नहीं जायेगा तब तक उसकी मृत्यु नहीं होगी। उसकी दोनों पुत्रियों 'अस्ति' और 'प्राप्ति' का विवाह महाराज कंस के साथ हुआ था। श्रीकृष्ण ने महाराज कंस को मारा था, इसी कारण से ज़रासन्ध की श्रीकृष्ण से शत्रुता हो गयी। उसने सतरह बार मथुरा पर आक्रमण किया था
किन्तु हर बार श्रीकृष्ण से हार ही मिली थी।

महर्षि गर्ग ने महादेवजी के वरदान से महाप्रभावशाली पुत्र प्राप्त किया था। यवन राजा के यहाँ प्रतिपालित होने के कारण उसका नाम कालयवन हुआ। ज़रासन्ध ने शिशुपाल के मित्र शाल्व के माध्यम से कालयवन से मित्रता की। ज़रासन्ध की प्रेरणा से कालयवन ने मथुरा पर आक्रमण किया तो श्रीकृष्ण ने द्वारिका भाग जाने की लीला की।  इससे कालयवन को विश्वास हो गया कि श्रीकृष्ण उसके पराक्रम से भयभीत हो गये हैं। उसने जब दूसरी बार श्रीकृष्ण को देखा तो वह श्रीकृष्ण के पीछे दौड़ा। 
श्रीकृष्ण कुशलतापूर्वक उसे दौड़ाते-दौड़ाते उस गुफा में ले आये जहाँ पर महाराज मुचुकुन्द सो रहे थे। श्रीकृष्ण वहाँ पहुँच कर अन्तर्हित हो गये। श्रीकृष्ण जब कहीं नहीं दिखे तो कालयवन ने गुफा में सोये हुए व्यक्ति को श्रीकृष्ण समझकर उसे पैर से ठोकर मारी जिससे महाराज मुचुकुन्द की निद्रा भंग हो गयी। नींद टूटने पर मुचुकुन्द ने आँखें खोलीं तो मुचुकुन्द की दृष्टि खुलने मात्र से ही कालयवन भसम हो गया। श्रीकृष्ण के महातेजोमय स्वरूप को सामने दर्शन करके राजा मुचुकुन्द ने सशंकित होकर उनके चरणों में प्रणाम किया और बोले -- आप के असहनीय तेज के प्रभाव से मेरा तेज फीका पड़ गया है। मैं बार-बार प्रयास करने पर भी लगतार आपके दर्शन नहीं कर पा रहा हूँ। आप समस्त प्राणियों के आराध्य हैं।

ज़रासन्ध और कालयवन सक्षात श्रीकृष्ण को देखकर भी भक्ति न होने के
कारण श्रीकृष्ण के भगवत्-स्वरूप की उपलब्धि नहीं कर पाये। धार्मिक व भक्तिमान मुचुकुन्द के ऊपर श्रीकृष्ण की कृपा-दृष्टि होने के कारण वे श्रीकृष्ण के भगवत्-स्वरूप को पहचान पाये। 

श्रीकृष्ण अपना तत्त्व समझाते हुए राजा ने बोले -- महाराज मुचुकुन्द! पूर्वकाल में आपने मुझसे प्रचुर रूप से कृपा प्राप्त करने के लिए प्रार्थना की थी। इसलिए अनुग्रह पूर्वक गुफा में उपस्थित होकर मैंने आपको अपन स्वरूप दिखाया है। 

राजा मुचुकुन्द ने तब श्रीकृष्ण को प्रणाम किया व वंशागति श्लोकों से उनका स्तव किया। 

श्रीकृष्ण ने संतुष्ट होकर कहा -- मैंने आपसे वरदान माँगने के लिए कहा। किन्तु आप विषयों की ओर आकृष्ट नहीं हुए। आपमें मेरे प्रति इसी प्रकार इसी प्रकार की अटूट भक्ति बनी रहे। मेरे मन लगाकर आप इच्छानुसार पृथ्वी पर विहार करें। 

मंगलवार, 23 मई 2017

आपको श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु का मन्त्र शिष्य भी कहा जाता है।

श्रील वृन्दावन दास ठाकुर जी ने परम पतित पावन श्रीनित्यानन्द प्रभु की कृपा प्राप्त की थी, इसलिए आपको श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु का मन्त्र शिष्य भी कहा जाता है।

आपने 1457 शकाब्द में 'श्रीचैतन्य भागवत' नामक अतुलनीय ग्रन्थ की रचना की थी।

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी जी ने श्रीचैतन्य चरितामृत में लिखा --

श्रीचैतन्य लीलार व्यास-दास वृन्दावन ।
मधुर करिया लीला करिला रचन॥  (चै-चै-आ / 48)
अर्थात् श्रीवृन्दावन दास ठाकुर सनातन धर्म के मूल गुरु श्रीकृष्ण द्वैपायन वेद व्यास जी के अवतार हैं । इस अवतार में आपने जो श्रीचैतन्य महाप्रभु की लीला का वर्णन किया है उसे अति मधुर और अतुलनीय कहना होगा। ग्रन्थ रचना के समय श्रीनित्यानन्द प्रभु जी की लीला वर्णन करने में ही खो जाने से कारण श्रीवृन्दावन दास ठाकुर जी ने श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की किसी किसी लीला का सूत्र रूप में ही वर्णन किया है। विशेषतः श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की अन्तिम लीला असम्पूर्ण रह गयी। श्रील वृन्दावन दास ठाकुर जी द्वारा जो सूत्र रूप में वर्णित है, और श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की असम्पूर्ण अन्तिम लीला को ही श्रीचैतन्य चरितामृत में विस्तार रूप से वर्णन किया है।

ग्रन्थ विस्तार भय छाड़िला ये ये स्थाने।
सेइ सेइ स्थाने किछु करिब ब्याख्याने॥ (चै-चै-आ / 49)

अतः श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु एवं श्रीमहाप्रभु की सम्पूर्ण लीलाओं के रसास्वादन के लिए हमें श्रील वृन्दावन दास ठाकुर द्वारा रचित श्रीचैतन्य भागवत तथा श्रील कृष्ण दास कविराज गोस्वामी द्वारा रचित श्रीचैतन्य चरितामृत ग्रन्थों को पढ़ना चाहिए।

श्रील वृन्दावन दास ठाकुर जी की जय !!!!!!!

सोमवार, 22 मई 2017

Message by Swami B.A. Paramadvaiti

I have received with great pain the wonderful news that our dear Guru Ji went back to the Nitya Lila of Sri Sri Radha Krishna. There is no comparison to how merciful he was--we lost a saint and the World Vaishnava Association lost its President as well. A service he held for more than 15 years. 

All of the devotee members of the Vrinda Family offer their obeisances to Param Pujyapad Srila Bhakti Ballabh Tirth Goswami Maharaj and to all of his beloved God brothers and disciples. Now he can reunite with his beloved Srila Gurudeva Param Pujyapad Srila Bhakti Dayita Madhav Goswami Maharaj. 

Please note that in all our temples around the world, we will simultaneously conduct a festival for his disappearance on the same day the festival is being held in Mayapur. 

Aspiring to be the servant of the servant of the servants. 

Swami B.A. Paramadvaiti

इस अद्भुत समाचार को सुनकर मेरा हृदय विरह-वेदना से कराह उठा कि श्रील गुरुदेव, भगवान श्रीश्री राधा कृष्ण जी की नित्य लीलाओं में प्रवेश कर गये हैं।  विश्व ने एक महान संत को खो दिया, जबकि विश्व वैष्णव राजसभा ने अध्यक्ष को। आपने विश्व वैष्णव राज सभा की अध्यक्ष रूप से पंद्रह वर्ष तक सेवा की। 

आप अति कृपालु थे।

वृन्दा परिवार के सभी भक्त परमपूज्यपाद श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराजजी को शत्-शत् प्रणाम करते हैं। साथ ही आपके गुरु-भाईयों तथा शिष्यों को भी प्रणाम करते हैं।  अब आप भगवान की नित्य लीलायों में अपने प्यारे गुरुदेव नित्यलीला प्रविष्ट परमपूज्यपाद श्रीश्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज 'विष्णुपाद' जी के पास चले गये हैं।

हमारी संस्था के सभी केन्द्र आपका एक ही दिन एक ही समय, सभी जगहों पर मनायेंगे। ये उसी दिन मनाया जायेगा जिस दिन आपका श्रीधाम मायापुर में यह उत्सव होगा।

भगवान की सेवा में,
स्वामी बी. ए. परमाद्वैति

जब भगवान जगन्नाथ जी आपके लिये युद्ध लड़ने गये

भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी के भक्त थे, ओड़ीसा के राजा प्रतापरुद्र। उनके समय में उनका राज्य वर्तमान आन्ध्रप्रदेश के राजमहेन्द्री नामक 
स्थान तक फैला हुआ था।

राजा प्रतापरुद्र के पिता श्रीपुरुषोत्तम देव भगवान श्रीजगन्नाथ देवजी के अनन्य-शरण भक्त थे।

जब श्रीपुरुषोत्तम देव के साथ कान्ची नगर की राजकुमारी पद्मावती का विवाह निश्चित हुआ तो कान्ची के राजा वर को मिलने के लिये पुरी आये। वो भगवान जगन्नाथ जी की रथ-यात्रा का दिन था।  राजा पुरुषोत्तम देव सोने के झाड़ू से रथ का रास्ता साफ कर रहे थे। लगभग उसी समय कान्ची के राज वहाँ पर पहुँचे और उन्होंने सारा दृश्य देखा।

ऐसा देख कर कान्चीराज ने सोचा कि वे एक झाड़ूदार चाण्डाल के साथ अपनी कन्या का विवाह नहीं करेंगे। यह विचारकर उन्होंने विवाह की बात तोड़ दी।

कांची के राजा गणेश जी के भक्त थे। उनकी जैसी श्रद्धा गणेशजी में थी, वैसी श्रद्धा भगवान जगन्नाथजी में नहीं थी।

श्रीपुरुषोत्तम देव को जब अश्रद्धा की बात मालूम हुई तो वे क्षुब्ध हो उठे और एक बड़ी सेना लेकर उन्होंने कान्चीराज पर आक्रमण कर दिया। किन्तु वे युद्ध हार गये।

हार से हताश होकर वे भगवान जगन्नाथदेव जी को मिलने गये और उनके शरणागत हो गये। जब हार के कारण की जिज्ञासा की तो भगवान जगन्नाथदेव जी ने उनसे पूछा कि क्या वे युद्ध में जाने से पहले भगवान से आज्ञा लेने आये थे?

अपनी गलती को मानते हुये राजा ने पुनः भगवान जगन्नाथ जी से आज्ञा मांगी। भगवान जगन्नाथजी के द्वारा ये आश्वासन देने पर कि वे युद्ध में राजा की सहायता करेंगे, राजा ने युद्ध कि तैयारी प्रारम्भ कर दी व भगवान जगन्नाथजी को प्रणाम कर, कुछ ही दिनों में कान्ची नगर की ओर कूच 

कर दिया।
जब उनकी सेना पुरी से 12 मील दूर आनन्दपुर गाँव पहुँची तो एक ग्वालिन ने उनका रास्ता रोका। जिज्ञासा करने पर उसने राजा से कहा -' आपकी सेना के दो अश्वरोही सैनिकों ने उससे दूध-दही और लस्सी पी। जब मैंने पैसे मांगे तो उन्होंने मुझे एक अंगूठी दी और कहा कि ये अंगूठी राजा को दे देना और मूल्य ले लेना। ऐसा बोल कर वो दोनों आगे चले गये।'

राजा पुरुषोत्तम देव कुछ चकित हुये व ग्वालिन से अंगूठी दिखाने के लिये कहा। ग्वालिन ने राजा को वो अंगूठी दे दी। अंगूठी देखकर पुरुषोत्त्म देव को समझने में देर नहीं लगी, के वे दोनों सैनिक श्रीजगन्नाथ और श्रीबलराम जी को छोड़ क्र कोई दूसरा नहीं है।

राजा ने गवालिन को उपयुक्त पुरस्कार दिया।

जब राजा कान्ची नगर पहुंचा तो वहाँ सब कुछ पहले ही नष्ट हो चुका था।

युद्ध जय कर, कान्चीराज के मणियों से बने सिंहासन को राजा ने भगवान जगन्नाथदेव जी को अर्पित कर दिया।
कान्चीराज युद्ध में पराजय के बाद अपनी कन्या को स्वयं पुरी लेकर आये एवं रथ यात्रा के समय स्वर्ण के झाड़ू से स्वयं रथ का रास्ता साफ करते हुये उन्होंने अपनी कन्या पुरुषोत्तम देव के हाथों में समर्पण कर दी।