सोमवार, 21 जून 2021

'गोविन्द भाष्य'

एक समय की बात है जब प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुर जी बहुत वृद्ध हो गये थे, और वृन्दावन में रह रहे थे। 


उस समय जयपुर के गलता नामक गाँव के श्रीरामानुज सम्प्रदाय के आचार्यों ने जयपुर के महाराजा को गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय का परित्याग करवा कर रामानुज सम्प्रदाय में लेने के लिये उनके सामने ये सिद्ध करने का प्रयास किया कि गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय चार प्रमाणिक सम्प्रदायों से बाहर है। इसके साथ - साथ उन्होंने जयपुर के महाराजा को पुनः रामनुज सम्प्रदाय में दीक्षा लेने का परामर्श दिया। 
इस प्रस्ताव से जयपुर के महाराज असमंजस में पड़ गये और उन्होंने वृन्दावन में रह रहे उस समय के प्रधान गौड़ीय वैष्णवाचार्य श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी के पास ये संवाद भेजा और जयपुर में आने के लिए उनसे प्रार्थना की। 
उस समय अतिवृद्ध होने व चल न पाने के कारण आपने अपने छात्र श्रील बलदेव विद्याभूषण प्रभु को जयपुर में जाकर गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय का सरंक्षण करने का निर्देश दिया।

श्रील बलदेव विद्याभूषण प्रभु, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती पाद जी से श्रीमद् भागवत शास्त्र अध्ययन करते थे। 

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी के शिष्य श्रीकृष्ण देव जी के साथ बलदेव विद्याभूषण प्रभु जी गुरु आज्ञा का पालन करने के लिये जयपुर में गलता ग्राम की गद्दी में हो रही विचार सभा में उपस्थित हुये।

चारों वैष्णव सम्प्रदायों का अपन-अपना भाष्य है किन्तु गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय का अपना वेदान्त भाष्य नहीं है । इसलिये रामानुजीय आचार्यों ने गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय की साम्प्रदायिक मर्यादा को स्वीकार नहीं करना चाहा तो श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभु ने गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय का वेदान्त का भाष्य लिखने के लिये सात दिन (किसी किसी के मत में तीन महीने) का समय मांगा।

रामानुजीय आचार्यों ने प्रार्थना के अनुसार समय दे दिया। 

श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभु जी ने श्रीगोविन्द जी के मन्दिर में श्रील गुरुदेव और श्रीगोविन्द देव जी से कृपा प्रार्थना करते हुये वेदान्त भाष्य लिखना आरम्भ किया। आपके गले मे, श्रीरूप गोस्वामी जी द्वारा सेवित श्रीगोविन्द देव जी की आशीर्वाद माला अर्पित की गयी। 

गुरु-वैष्णव-भगवान की कृपा से असम्भव भी सम्भव हो जाता है।
आपने वेदान्त के पांच सौ (500) सूत्रों के गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के शुद्ध-भक्ति-रस-पूर्ण भाष्य को निर्धारित समय पर ही लिख कर पूरा कर दिया।

गलता गद्दी की सभा में आप के श्रीमुख से प्रेमपरक भाष्य सुन कर सभी चमत्कृत हो उठे।

श्रीगोविन्द जी के आदेश से वेदान्तसूत्रों का भाष्य रचित होने के कारण ये भाष्य 'गोविन्द भाष्य' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 
वेदान्त के गोविन्द भाष्य लिखे जाने के पश्चात ही श्रीबलदेव जी 'विद्याभूषण' की उपाधि से भूषित हुये।

कहा जाता है कि आपने गलता गद्दी पर 'विजय-गोपाल' नामक विग्रह की प्रतिष्ठा की थी।

आपके मना करने पर, भगवान ने स्वप्न में आकर सेवा करने का आदेश दिया

 राजस्थान के जयपुर शहर में एक ब्राह्मण रहता था जिसका नाम था श्रीचन्द्र शर्मा। उसके घर में श्रीरसिक राय नाम के श्रीविग्रह थे (श्रीकृष्ण की मूर्ति) । किसी कारणवश उससे सेवा ठीक से नहीं हो पा रही थी।


ऐसे में भगवान जगन्नाथ जी, एक रात उसके स्वप्न में आये।  आपने उस ब्राह्मण से कहा -- तुम इन विग्रहों की सेवा पुरुषोत्तम धाम मे श्री गंगामाता जी को दे दो । इससे तुम्हारे सारे अपराध और भय दूर हो जाएंगे।

आदेश के अनुसार वो ब्राह्मण देव ,  श्रीमती राधा जी व श्रीरसिक राय विग्रहों को लेकर श्रीक्षेत्र में गगांमाता जी के पास पहुँचे । उन्होंने श्रीमती गंगा माता गोस्वामिनी जी  को श्रीविग्रह की सेवा के लिए प्रार्थना की।
पहले तो श्रीमती गंगा माता गोस्वामिनी जी ने उसे ग्रहण करना अस्वीकार कर दिया, कारण यह की, आपके लिए श्रीविग्रहों की राज-सेवा चलानी असम्भव थी, परन्तु बाद में वो ब्राह्मण द्वारा तुलसी के बगीचे में ही विग्रहों को छोड़कर चले जाने पर श्रीरसिक राय जी ने स्वयं ही अपनी सेवा के लिए गंगा माता जी को स्वप्न में आदेश दिया।

स्वप्न में आदेश मिलने पर गंगा माताजी ने उल्लास के साथ श्रीविग्रहों का प्रकट उत्सव मनाया।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी ने अपनी रचना 'श्रीगौरपार्षद और गौड़ीयवैष्णाचार्यों का संक्षिप्त चरितामृत' में बताया है कि गंगामाता जी 1601 ई के ज्येष्ठ मास की शुक्लातिथि को आविर्भूत हुयीं तथा सन् 1721 ई में आपने नित्यलीला में प्रवेश किया।
आप श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामी जी की शिष्य परम्परा में हैं। आप के पिताजी द्वारा दिया गया नाम था श्रीशची देवी'। आप बंगलादेश के राजशाही जिले के पुंटिया के राजा श्रीनरेशनारायण की कन्या थीं।

सोमवार, 7 जून 2021

आपको श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु का मन्त्र शिष्य भी कहा जाता है।

 श्रील वृन्दावन दास ठाकुर जी ने परम पतित पावन श्रीनित्यानन्द प्रभु की कृपा प्राप्त की थी, इसलिए आपको श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु का मन्त्र शिष्य भी कहा जाता है।

आपने 1457 शकाब्द में 'श्रीचैतन्य भागवत' नामक अतुलनीय ग्रन्थ की रचना की थी।

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी जी ने श्रीचैतन्य चरितामृत में लिखा --

श्रीचैतन्य लीलार व्यास-दास वृन्दावन ।
मधुर करिया लीला करिला रचन॥  (चै-चै-आ / 48)

अर्थात् श्रीवृन्दावन दास ठाकुर सनातन धर्म के मूल गुरु श्रीकृष्ण द्वैपायन वेद व्यास जी के अवतार हैं । इस अवतार में आपने जो श्रीचैतन्य महाप्रभु की लीला का वर्णन किया है उसे अति मधुर और अतुलनीय कहना होगा। ग्रन्थ रचना के समय श्रीनित्यानन्द प्रभु जी की लीला वर्णन करने में ही खो जाने से कारण श्रीवृन्दावन दास ठाकुर जी ने श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की किसी किसी लीला का सूत्र रूप में ही वर्णन किया है। विशेषतः श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की अन्तिम लीला असम्पूर्ण रह गयी। श्रील वृन्दावन दास ठाकुर जी द्वारा जो सूत्र रूप में वर्णित है, और श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की असम्पूर्ण अन्तिम लीला को ही श्रीचैतन्य चरितामृत में विस्तार रूप से वर्णन किया है।

ग्रन्थ विस्तार भय छाड़िला ये ये स्थाने।
सेइ सेइ स्थाने किछु करिब ब्याख्याने॥ (चै-चै-आ / 49)

अतः श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु एवं श्रीमहाप्रभु की सम्पूर्ण लीलाओं के रसास्वादन के लिए हमें श्रील वृन्दावन दास ठाकुर द्वारा रचित श्रीचैतन्य भागवत तथा श्रील कृष्ण दास कविराज गोस्वामी द्वारा रचित श्रीचैतन्य चरितामृत ग्रन्थों को पढ़ना चाहिए।

श्रील वृन्दावन दास ठाकुर जी की जय !!!!!!!

मंगलवार, 11 मई 2021

श्रील गदाधर पण्डित की दीक्षा

श्रीमती राधिका ही श्रीचैतन्य महाप्रभु की लीलाओं में श्रीगदाधर पण्डित बन कर आईं।


श्रीचैतन्य महाप्रभु के एक भक्त थे श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि । श्रीगदाधर पण्डित जी के पिता श्रीमाधव मिश्र, श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि जी के मित्र थे।

श्रीगदाधर पण्डित जी ने श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि जी के वास्तविक स्वरूप को न जानने की लीला की थी।

हुआ यूँ कि एक बार श्रीमुकुन्द दत्त जी, ने श्रीगदाधर पण्डित से एक अपूर्व वैष्णव के बारे में चर्चा की, व दोनों उन वैष्णव को मिलने चल दिये। श्रील गदाधर पण्डित बाल ब्रह्मचारी, अत्यन्त विषय-विरक्त और वैरागी थे। उन वैष्णव (श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि जी)  के दर्शन करके, व उनकी दूध की झाग के समान बढ़िया सफेद चादर और कोमल बिस्तर, अत्यन्त मूल्यवान वस्त्रों में इत्र की गन्ध, इत्यादि देखकर  श्रील गदाधरजी को उनमें कोई भी वैष्णवता का लक्षण न दिखाई दिया जिससे आपके मन में उनके प्रति थोड़ी अश्रद्धा हो गई ।

श्रीमुकुन्द दत्त ये ताड़ गये।

उन्होंने श्रीमद् भागवत का श्लोक बोला --

अहो बकीं यं स्तनकालकूट जिघांसयापाययदप्य साध्वी।
लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम्॥ (भा 3/2/23)

पूतना लोकबालघ्नी राक्षसी रुधिराशना।
जिघांसयापि हरये स्तनं दत्त्वाप सद्गतिम्॥ (भा 10/6/35)

(अर्थात् - क्या आश्चर्य है। बकासुर की बहिन पूतना ने प्राणों के विनाश की इच्छा से प्रेरित होकर जिनको कालकूट मिश्रित स्तन-पान कराने पर भी धात्री (श्रीकृष्ण को अपने बालक की भान्ति दूध पिलाने वाली) कि गति प्राप्त की थी, उन परम दयालु श्रीकृष्ण के बिना मैं और किसके शरणापन्न होऊँ ?

खून पीने वाली व लोगों के बच्चों को मारने वाली राक्षसी पूतना ने श्रीकृष्ण को मारने की इच्छा से स्तन-पान करवाने पर भी गोलोक की प्राप्ति की थी।)
श्रीमुकुन्द दत्त के श्लोक उच्चारण करते ही, श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि जी 'हा कृष्ण' कहते हुए कृष्ण-प्रेम के भाव में जमीन पर गिर गये व लोटपोट होने लगे। उनके पाँव की ठोकर से भोग-विलास की सारी सामग्री इधर-उधर जा गिरी। उनके शरीर में अलौकिक अष्ट-सात्विक विकार आने लगे। यह देखकर श्रील गदाधर पण्डित जी हैरान हो गये व अपने अपराध के लिये अनुतप्त हो उठे।

बाद में श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के निर्देशानुसार श्रीलगदाधर पण्डित जी ने
अपने अपराध मार्जन के लिये श्रीपुण्डरीक विद्यनिधि जी से मन्त्र दीक्षा ली थी।

श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि जी, भगवान श्रीकृष्ण की लीला में, श्रीवृषभानु जी हैं जोकि श्रीमती राधा जी के पिताजी हैं। श्रीकृष्ण के दोनों पार्षदों अर्थात् श्रीविद्यानिधि प्रभु तथा श्रीगदाधर पण्डित जी का दीक्षा के बाद फिर वही पहले की लीला वाला गाढ़ प्रीति पूर्ण सम्बन्ध प्रर्दशित होने लगा।
वैष्णव का कौन सी लीला प्रकट करते हैं, इसे उनकी कृपा के बिना कोई भी समझने में समर्थ नहीं है।

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

श्रीहनुमान जी जब भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी की लीला में आये

 श्रीमुरारी गुप्त जी के माध्यम से भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने इष्टनिष्ठा की शिक्षा प्रदान की तथा वे भी बताया कि आराध्यदेव में निष्ठा के बिना प्रेम बढ़ता नहीं। हनुमान जी के अवतार मुरारीगुप्त जी महाप्रभु जी का राम रूप से दर्शन करते थे। आपकी इष्ट निष्ठा की परीक्षा लेने के लिये श्रीमहाप्रभु जी ने आपसे कहा - 'सर्वाश्रय, सर्वांशी, स्वयं भगवान्, अखिल रसामृत मूर्ति - व्रजेन्द्रनन्दन श्री कृष्ण के भजन में जो आनन्द है, भगवान के अन्य स्वरूपों की आराधना में वह आनन्द नहीं है।' श्रीमुरारीगुप्त श्रीमहाप्रभु जी को कृष्ण-भजन करने का वचन देने पर भी घर में आकर यह सोचकर कि भगवान श्रीरघुनाथ जी के पादपद्मों को त्याग करना होगा, अस्थिर हो उठे। सारी रात जाग कर ही बिता देने पर, दूसरे दिन प्रातः महाप्रभु जी के पादपद्मों में निवेदन करते हुये बोले -'मैंने अपने इस मस्तक को श्रीरघुनाथ जी के चरणों में बेच दिया है। परन्तु अब मैं पुनः वहाँ से इस सिर को नहीं उठा सकता हूँ। अब इस दुविधा में मैं दुःख पा रहा हूँ कि श्रीरघुनाथ जी के चरण मुझसे छोड़े नहीं जाते। किन्तु यदि नहीं छोड़ता तो आपकी आज्ञा भंग होती है। कुछ समझ में नहीं आता, क्या करूँ ? आप दयामय हैं, मेरे ऊपर ऐसी कृपा करो कि आपके सामने ही मेरी मृत्यु हो जाये, तब यह संशय समाप्त हो जायेगा।'                                                                                                                            

भगवान  श्रीमन्महाप्रभु  मुरारीगुप्त के इष्टनिष्ठायुक्त वाक्य सुनकर परम सन्तुष्ट होकर बोले -'तुम तो श्रीराम जी के किंकर साक्षात् हनुमान हो, तुम भला उनके चरण कमलों को कैसे छोड़ सकते हो? सचमुच वह भक्त धन्य है, जो किसी भी परिस्थिति में अपने प्रभु के चरण नहीं छोड़ता है और वही प्रभु धन्य हैं, जो कभी भी अपने जन को नहीं छोड़ते हैं।'