शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

इस प्रकार गोवर्धन जी वृज - भूमि पर आये

श्रीकृष्ण ने अवतरण से पहले अपने निज-धाम चौरासी कोस भूमि, गोवर्धन और यमुना नदी को पृथ्वी पर भेजा। गोवर्धन भारत के पश्चिम  प्रदेश में, शालमली द्वीप में द्रोण पर्वत के पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुये। 

एक बार पुलस्त्य मुन तीर्थ भ्रमण कर रहे थे। मार्ग में विचित्र पुष्प व फलों वाले वृक्षों एवं झरने वाले परम रमणीय द्रोणाचल-नन्दन गिरिराज गोवर्धन को देखकर बड़े प्रसन्न हुये। 
मुनि द्रोणाचल से मिले और उनसे बोले - मैं काशी में रहता हूँ, काशी में गंगाजी हैं और विश्वेश्वर महादेव जी हैं, वहाँ जाने से पापी लोग भी तत्क्षण मुक्त हो जाते हैं। मेरी इच्छा है कि मैं गोवर्धन को काशी में स्थापित पर उस पर तपस्या करूँ। आप अपना पुत्र मुझे दान में दे दें। उस समय गोवर्धन का आकार आठ योजन (चौंसठ मील) लम्बा, पाँच योजन तक फैला तथा दो योजन ऊँचा था।  

(आजकल गोवर्धन की लम्बाई सात मील देखी जाती है, हालांकि परिक्रमा 
का रास्ता चौदह मील का है)

गोवर्धन ने एक शर्त पर मुनि के साथ जाना स्वीकार किया, वह ये कि मुनि यदि भारी समझ कर उन्हें रास्ते में कहीं भी नीचे उतार देंगे तो गोवर्धन वहीं रह जायेंगे। 

पुलस्त्य मुनि ने गोवर्धन को अपनी हथेली पर उठाया और धीरे-धीरे काशी की ओर चलने लगे। मार्ग में वे वृजमण्डल आये। वहाँ के अपूर्वे सौन्दर्य के दर्शन करते ही गोवर्धन को श्रीकृष्ण की बाल्यलीला, किशोर लीला आदि स्मरण हो आयी। श्रीगोवर्धन की वहीं ठहरने की इच्छा हो गयी। उन्होंने अपना भार इतना बढ़ाया कि उस भार से परेशान होकर मुनि अपनी प्रतिज्ञा भूल गये। मुनि ने प्रतिज्ञा की थी की वे रास्ते में गोवर्धन जी को नहीं उतारेंगे, सीधा काशी ले जायेंगे। 

अधिक भार होने के कारण मुनि ने श्रीगोवर्धन को वहीं उतार दिया। पुलस्त्य मुनि ने थकान के कारण थोड़ी देर विश्राम किया, फिर गोवर्धन को उनकी हथेली पर आने के लिये कहा। श्रीगोवर्धन ने इन्कार कर दिया। मुनि फिर उन्हें अपनी शक्ति से उठाने का प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुये। अन्ततः मुनि ने क्रोध में श्राप दिया - तुम ने मेरा मनोरथ पूर्ण नहीं किया इसलिये प्रतिदिन तुम्हारा तिल के समान आकार कम होता जायेगा।

तभी से गोवर्धन पर्वत एक-एक तिल करके छोटे हो रहे हैं। 
कहते हैं जब तक पृथ्वी पर भगीरथी गंगा और गोवर्धन गिरि हैं तब तक कहीं भी कलि के प्रभाव की प्रबलता नहीं होगी।

स्वयं भगवान श्रीकृष्ण जी ने श्रीगोवर्धन जी के तत्त्व को और उनकी महिमा को प्रकाशित किया है। श्रीकृष्ण ने ही देवताओं की पूजा बन्द करवाकर श्रीगोवर्धन पूजा का प्रवर्तन किया।

'गोवर्धन' शब्द का एक अर्थ इन्द्रीय-वर्द्धन भी होता है। इसलिये ऐसा भी कहा जाता है कि श्रीकृष्ण तथा कृष्ण-भक्तों के इन्द्रिय-वर्द्धन का नाम हो गोवर्धन पूजा है। 

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

पवित्र कार्तिक महीने में -- वृज दर्शन -- मानसी गंगा

मानसी गंगा एक अ-समान आकार का कुण्ड है। कुसुम सरोवर के प्राय ढेड़ मील दक्षिण-पश्चिम की तरफ ये मानसी गंगा तीर्थ अवस्थित है।

भगवान श्रीकृष्ण के मानस-संकल्प से यह सरोवर प्रकट हुआ है इसलिये इसका नाम हुआ मनसी-गंगा।

कहा जाता है कि एक बार श्रीनन्द महाराजजी व माता यशोदा देवीजी ने गंगा स्नान करने के लिये यात्रा प्रारम्भ की और रात को गोवर्धन के सान्निध्य में वास किया।

यात्रा को जाते देख श्रीकृष्ण ने मन-मन में सोचा कि सब तीर्थ तो इस वृज में विराजित हैं। किन्तु मुझ में प्रणय-विह्वल सरल वृजवासी इस विषय में बिल्कुल नहीं जानते। अतः मैं वृजवासियों को भी इस विषय में बताऊँगा।

श्रीकृष्ण द्वारा विचार करते ही नित्यकृष्ण किंकरी गंगाजी मकर वहिनी 
रूप से समस्त वृजवासियों के दृष्टिगोचर हुईं। साक्षात् गंगा जी को देखकर सभी वृजवासी आश्चर्यचकित रह गये। श्रीकृष्ण उनसे बोले - देखो, इस वृज में विराजित सब तीर्थ ही वृजमण्डल की सेवा करते हैं, और आप ने वृज के बाहर जाकर गंगा स्नान का संंकल्प किया था। पता लगने पर गंगादेवी स्वयं आपके सम्मुख प्रकट हुईं हैं इसलिये आप जल्दी से गंग़ा स्नान कर लीजिये। अब से यह तीर्थ मानसगंगा के नाम से जाना जायेगा।

कार्तिकी-अमावस्या तिथि को ये मानस गंगा प्रकट हुई थी इसलिये दीपावली को मानसी गंगा में स्नान और गंगा परिक्रमा एक महा मेले के रूप में परिणित हो गया है।
श्रील रघुनाथ दास गोस्वामीजी ने वृजविलास के स्तव में मानसी गंगा को श्रीराधा कृष्ण जी का नौका विहार का स्थान बताया है।

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

इस प्रकार राधा कुण्ड प्रकट हुआ।

एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने अरिष्टासुर को मारा। उस दिन जब आप श्रीमती राधा जी से मिलने गये तो श्रीमती राधाजी ने मिलने से मना कर दिया क्योंकि उनके अनुसार श्रीकृष्ण ने एक बैल को मारा था, चाहे वो एक दैत्य ही क्यों न था? बैल को मारने के कारण वे अपवित्र हो गये थे। अतः जब तक श्रीकृष्ण सभी तीर्थों के जल में स्नान नहीं कर लेते, तब तक वे अपवित्र ही रहेंगे।

भगवान श्रीकृष्ण यह सुन कर हँस पड़े। भगवान ने जैसे ही अपने चरणों से पृथ्वी को दबाया, तभी सारे तीर्थों का जल लिये एक कुण्ड वहाँ प्रकट हो गया। श्रीमती राधा व उनकी सखियों के विश्वास के लिये सारे तीर्थ सभी के सामने श्रीकृष्ण को अपना-अपना परिचय देकर उनका पूजन करने लगे। 

भगवान ने फिर उस में स्नान किया।

कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात को यह घटना हुई।

इस प्रकार श्याम कुण्ड प्रकाशित हुआ।

जब श्रीकृष्ण ने सखियों सहित श्रीमती राधा जी से कुछ मज़ाक में कहा तो वे सब एक अन्य कुण्ड की खुदाई करने लगीं। देखते ही देखते वहाँ एक और सरोवर खुद गया, किन्तु उसमें जल नहीं था। यह देख सभी गोपियाँ चिन्तित हो गयीं। 

तब श्रीकृष्ण ने फिर मज़ाक में कहा - मेरे कुण्ड का जल ले लो और अपना सरोवर भर लो। 

गोपियों ने कहा - वृषासुर को मारने से जो पाप हुआ, उसे इस कुण्ड में धोया होने के कारण, इस का जल पवित्र नहीं रहा। हम मानसी गंग़ा से जल लेकर आयेंगीं। 
तब श्रीकृष्ण के ईशारे पर सभी तीर्थ श्रीमती राधाजी के आगे खड़े होकर उनका स्तव करने लगे।  श्रीमती राधाजी के हामी भरते ही, श्याम कुण्ड का जल बड़ी तेजी से राधा-कुण्ड की ओर उछला। उससे राधा-कुण्ड भी भर गया।

इस प्रकार राधा कुण्ड प्रकट हुआ।

भजन स्थानों में श्रीराधा कुण्ड हि सर्वश्रेष्ठ है।

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

पवित्र कार्तिक महीने में -- वृज दर्शन -- वृन्दावन देवी / कामेश्वर शिव / धर्म कुण्ड

वृन्दावन देवी -- औरंगज़ेब के राजत्व काल में जब हिन्दु धर्म पर विपत्ति और हिन्दुओं के मंदिरों पर आक्रमण हुआ तब श्रील रूप गोस्वामी जी द्वारा सेवित विग्रह श्रीगोविन्द जी, श्रील मधु पण्डित जी के सेवित विग्रह श्रीगोपीनाथ जी और श्रील सनातन गोस्वामी जी के सेवित श्रीमदन मोहन जी के विग्रह सेवकों को सेवा प्रदान करने के लिये पहले भरतपुर राजा के राज्य में  आये परन्तु बाद में विपत्ति के बहाने से वहाँ से जयपुर चले गये।

जयपुर महाराज की कन्या के प्रेम के वशीभूत होकर श्रीमदन मोहन जी करोली में चले गये।
अभी भी जयपुर में श्रीराधा गोविन्दजी, श्रीराधा गोपीनाथजी एवं करोली में मदनमोहनजी विराजित हैं। श्रीविग्रहों के भरतपुर में आने पर काम्यवन में उनके लिये तीन मन्दिर निर्मित हुये।

श्रीगोविन्द देवजी के मन्दिर के एक प्रकोष्ठ में वृन्दादेवी पृथक रूप से विराजित हैं।

वहाँ के पण्डा लोग कहते हैं कि जब श्रीगोविन्दजी, श्रीगोपीनाथजी, श्रीमदनमोहन्जी काम्यवन से जयपुर गये थे, तब वृन्दादेवी ने वहाँ जाने की इच्छा नहींं की। इसीलिये काम्यवन मन्दिर में श्रीगोविन्दजी, श्रीगोपीनाथजी, श्रीमदनमोहनजी के प्रतिभु विग्रह हैं, किन्तु वृन्दादेवी जी का मूल विग्रह है।
श्रीकामेश्वर शिव -- कहा जाता है कि व्रजनाभजी द्वारा प्रतिष्ठित श्रीकामेश्वर शिवजी के स्थान पर व्यक्ति जो कामना करता है वह पूरी हो जाती है। मंगलाकंक्षी व्यक्ति कामेश्वर शिवजी से राधाकृष्णजी के पादपद्मों की अहैतुकि भक्तो को छोड़ कर और कुछ भी प्रार्थना नहीं करते।
धर्म कुण्ड -- भगवान नारायण धर्म रूप से यहाँ विराजित हैं।

वृजवासी कहते हैं कि युधिष्ठिर महाराज जी के पिता धर्मराजजी ने यहीं पर बक और यक्ष का रूप धारण कर प्रश्न किये थे एवं युधिष्ठिर महाराजजी द्वारा यथोधित उत्तर देने पर उनके भाई जीवित हुये थे।

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

पवित्र कार्तिक महीने में -- वृज दर्शन -- अम्बरीश टीला

चक्र तीर्थ से लगभग 70 फुट ऊँचाई पर एक टीला है, जो कि अम्बरीश टीला कहलाता है।

ऐसा कहा जाता है कि इस स्थान पर ही भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र को दुर्वासाजी के प्रति संचालित किया था व अपने भक्त अम्बरीश का महात्म्य प्रचारित किया था।

भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करने की इच्छा से अम्बरीश महाराज ने मथुरा मण्डल में आकर सम्वत्सर (एक वर्ष) तक त्रिरात्र उपवास करके द्वादशी उपवास (एकादशी उपवास) किया था। कार्तिक मास की आखरी एकादशी उपवास के अगले दिन अर्थात् द्वादशी को यमुना में स्नान करके मधुवन में श्रीहरि का अर्चन करने तथा साधुअ-ब्राह्मणों की सेवा करने के बाद जब अम्बरीश महाराज पारण (व्रत पूर्ण) करने जा ही रहे थे कि उसी समय उनके यहाँ दुर्वासा जी अतिथि रूप से पधारे।
दुर्वासाजी का स्वागत करने के बाद अम्बरीश महाराजजी ने दुर्वासाजी को भोजन के लिये प्रार्थना की तो उन्होंने अम्बरीश महाराज जी की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया तथा कहा कि मैं थोड़ा मध्याह्णिक का आऊँ, तब भोजन करूँगा।

इतना कहकर वे यमुना की ओर चल दिये और कालिन्दी के पवित्र जल में ध्यान मग्न हो गये। इधर व्रत के पारण का समय गुज़रनेलगा।

अम्बरीश महाराजजी चिन्तित हो गये और सोचने लगे कि द्वादशी के दिन ठीक समय पर पारण नहीं करने से व्रत-वैगुण्य दोष होगा। पारण करने के लिये निमन्त्रित ब्राह्मण को भोजन न करवाकर यदि स्वयं भोजन लिया जाय तो ब्राह्मण लंंघन रूपी अपराध हो जाएगा।

धर्म संकट के उपस्थित होने पर अम्बरीश महाराजजी ने ब्राह्मणों के साथ
विचार-विमर्श किया। अन्त में यह निर्णय लिया गया कि जल पीकर व्रत-सम्पन्न किया जाय।

अतः अम्बरीश महाराजजी ने जल-पान करके व्रत का पारण किया। किन्तु दुर्वासा ॠषि ने अपने बुद्धि-योग के द्वारा वहीं जान लिया कि अम्बरीशजी ने कुछ ग्रहण कर लिया है अतः वे क्रोधित हो उठे और उन्होंने अम्बरीश महाराज को मारने के लिये एक राक्षसी छोड़ी।

जैसे ही दुर्वासा जी ने कृत्या छोड़ी, ठीक उसी समय भगवान श्रीहरि का अदेश प्राप्त करके सुदर्शन चक्र ने तत्क्षण उसे भस्म कर दिया।