बुधवार, 9 जनवरी 2019

जब भगवान श्रीजगन्नाथ आप के साथ चलने को तैयार हो गये…


एक बार श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के निर्देश से श्रीजगदीश पण्डित प्रभु, नीलाचल गये थे। श्रीधाम पुरी में श्रीजगन्नाथ जी के दर्शन कर आप प्रेम में आप्लावित हो गए तथा वहाँ से लौटते समय आप श्रीजगन्नाथ जी के विरह में व्याकुल हो गए। नन्दनन्दन श्रीकृष्ण, श्री चैतन्य महाप्रभु और श्री जगन्नाथ जी एक ही तत्त्व हैं। आपके विरह की अवस्था को देखकर श्रीजगन्नाथ जी ने स्वप्न में आपको सान्त्वना देते हुए कहा की आप चिन्ता न करें, मैं स्वयं आपके साथ चलूँगा । और आप मेरे श्रीविग्रह को लेकर उसकी सेवा करें। 



लेकिन श्रीजगन्नाथ जी श्रील जगदीश पण्डित के साथ कैसे जायेंगे, उसकी व्यवस्था करने के लिये भगवान ने तत्कालीन  राजा को स्वप्न में श्री जगन्नाथ देव जी के नव-कलेवर के समय उनका समाधिस्थ विग्रह श्रीजगदीश पण्डित को देने के लिये निर्देश दिया। महाराज जी, श्रीजगदीश पण्डित से मिल कर अपने को भाग्यवान समझने लगे और बड़ी श्रद्धा के साथ आपको उन्होंने श्रीजगन्नाथ जी का विग्रह अर्पण कर दिया। 

श्रीजगदीश पण्डित जी ने श्रीजगन्नाथ जी से कहा कि यह तो बड़ी प्रसन्नता की बात है कि आप मेरे साथ जायेंगे किन्तु आप के भारी विग्रह को किस प्रकार उठा कर ले जाऊँगा ? 

श्रीजगन्नाथ जी ने कहा -- तुम चिन्ता मत करो। मैं सूखी लकड़ी के खोखले तने के समान हलका हो जाऊँगा व आप मुझे एक नए वस्त्र में बाँध कर लाठी के सहारे कन्धों पर रख कर ले जायें तथा जहाँ पर स्थापन की इच्छा हो, वहीं पर रखें। 

श्रीजगदीश पण्डित प्रभु एक ब्राह्मण की सहायता से श्रीमूर्ति को कन्धे पर उठा कर पुरी से चक्रदह (पश्चिम बंगाल) के अन्तर्गत गंगा के तटवर्ती इलाका यशड़ा में आ गये। वहाँ आकर आप गंगा में स्नान-तर्पण हेतु, ब्राह्मण व्यक्ति के कन्धों पर श्रीजगन्नाथ देव को संभाल कर, गये। अचानक श्रीजगन्नाथ देव जी अत्यन्त भारी हो गए। सेवक उन्हें कन्धे पर रखने को असमर्थ हो गया और उन्हें ज़मीन पर उतार दिया। श्रीजगदीश पण्डित जब वापिस आए तो श्रीजगन्नाथ जी का ज़मीन पर अवतरण देख कर समझ गए कि श्रीजगन्नाथ देव जी ने वहीं पर ही अवस्थान करने की इच्छा की है।


चक्रदह एक ऐतिहासिक पवित्र स्थान है। पौराणिक युग में यह स्थान 'रथवर्म' नाम से प्रसिद्ध था। द्वापर के अन्त में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र श्रीप्रद्युम्न ने एक बार शम्ब्रासुर का इसी स्थान पर वध किया था। उसके बाद से इसने 'प्रद्युम्न नगर' नाम से प्रसिद्धि लाभ की, परवर्तीकाल में सगर वंश के उद्धार के लिए श्रीभगीरथ जब गंगा जी को ला रहे थे तो उसी समय उक्त स्थान में उनका रथ का पहिया (चक्र) धँस गया था इसलिए यह 'प्रद्युम्न नगर' चक्रदह नाम से प्रचारित हुआ। अब यह स्थान 'चाकदह' नाम से जाना जाता है।
श्रीजगन्नाथ देव जी पुरुषोत्तम धाम से यशड़ा श्रीपाट में आ गए हैं -- ये खबर जब चारों ओर प्रचारित हुई तो अगणित नर-नारी यशड़ा श्रीपाट में श्रीजगन्नाथ देव जी के दर्शनों के लिए आने लगे। श्रीजगन्नाथ देव जी के यशड़ा श्रीपाट में रहने के कारण श्रीजगदीश पण्डित प्रभु ने अपने घर मायापुर में न जाकर यशड़ा में ही अवस्थान करने का संकल्प लिया। श्रीजगन्नाथ का श्रीविग्रह पहले गंगा जी के किनारे एक वट वृक्ष के नीचे प्रतिष्ठित थी, बाद में गोयाड़ी कृष्ण नगर के राजा श्रीकृष्णचन्द्र के सहयोग से वहाँ पर एक मन्दिर निर्मित हुआ।


उक्त मन्दिर के जर्जर होने पर उमेश चन्द्र मजूमदार महोदय जी की सहधर्मिणी मोक्षदा दासी ने श्रीमन्दिर का पुनः संस्कार किया। मन्दिर चूड़ा-रहित व साधारण ग्रह के आकार जैसा है। श्रीमन्दिर में श्रीजगन्नाथ देव, श्रीराधा बल्लभ जी व श्री गौर गोपाल विग्रह विराजित हैं। जिस लाठी के सहयोग से श्रीजगदीश पण्डित जी पुरी से श्रीजगन्नाथ विग्रह लाए थे, वह लाठी अब भी श्रीजगन्नाथ मन्दिर में सुरक्षित है।

अखिल भारतीय श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के वर्तमान आचार्य श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी ने स्वरचित ग्रन्थ 'श्रीगौरपार्षद एवं गौड़ीय वैष्णवाचार्यों के संक्षिप्त चरितामृत' नामक ग्रन्थ में लिखा है कि भगवान श्रीकृष्ण की लीला में जो याज्ञिक ब्राह्मण पत्नी थीं, वे ही श्रीजगदीश पण्डित व श्रीहिरण्य पण्डित के रूप में श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की लीला में आविर्भूत हुईं थीं।


पाठकों की जानकारी के लिए हम बताना चाहते हैं कि चाकदह में विराजमान ये श्रीजगन्नाथ जी, जगन्नाथ पुरी के प्रसिद्ध मन्दिर से यहाँ पर आये हैं।

रविवार, 6 जनवरी 2019

क्यों आपने श्रीनित्यानन्द जी की महिमा में गीत लिखे…

श्रील लोचन दास ठाकुर जी ने सन् 1537 ई में 'चैतन्य मंगल' ग्रन्थ लिखा था। ऐसा कहा जाता है कि श्रील लोचन दास ठाकुर जी ने अपने घर में फूल के वृक्ष के नीचे एक पत्थर के ऊपर बैठकर 'चैतन्य मंगल' नामक ग्रन्थ लिखा था। 

आपने इसके अलावा -- 'प्रार्थना, दुर्लभसार, पदावली, जगन्नाथ-बल्लभ नाटक तथा रासपन्चाध्यायी का पद्यानुवाद' भी लिखा था।

'चैतन्य मंगल' लिखने के बाद आपके मन में विचार आया कि इस ग्रन्थ में श्रीनित्यानन्द जी की महिमा पूरी तरह से वर्णन नहीं हो पायी। इस आशंका से आपने श्रीनित्यानन्द महिमा सूचक गीतियाँ भी लिखीं।

उनमें से एक यह है --

'अक्रोध परमानन्द नित्यानन्दराय । 
अभिमान शून्य निताई नगरे बेड़ाय॥ 
अधम पतित जीवेर द्वारे-द्वारे गिया। 

हरिनाम महामन्त्र देन बिलाइया॥ 
यारे देखे तारे कहे दन्ते तृण करि'। 
आमारे किनिया लह भज गौरहरि॥ 
एत बलि नित्यानन्द भूमे गड़ि याय।
सोनार पर्वत येन धूलाते लोटाय ॥
हेन अवतारे यार रति ना जन्मिल। 
लोचन बले सेइ पापी एल आर गेल॥' 

अर्थात्,


क्रोध रहित एवं परमानन्द से भरे श्रीनित्यानन्द प्रभु जी अभिमान शून्य होकर नगर में भ्रमण कर रहे हैं। 

आप पतित जीवों के घर-घर (द्वार-द्वार) पर जाकर हरे कृष्ण महामन्त्र बाँटते फिर रहे हैं। 

आप जिनको भी देखते हैं उससे दाँतों में तिनका लेकर अर्थात् अत्यन्त दीनता से कहते हैं कि आप गौरहरि का भजन करो और मुझे खरीद लो। मैं आपके सभी काम करूँगा। 


इतना कह कर श्रीनित्यानन्द प्रभु प्रेमानन्द में विभोर होकर ज़मीन पर लोट-पोट होने लगते हैं। तब ऐसा लगता है कि मानो सोने का पर्वत ज़मीन पर लोट-पोट हो रहा हो।

इस प्रकार के अवतार में जिसकी प्रीति उदित नहीं हुई, श्रीलोचन दास ठाकुर जी कहते हैं कि उसकी ज़िन्दगी बेकार है। वह पापी तो समझो, आया और गया। 

श्रील लोचन दास ठाकुर की जय !!!!! 

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

हरिनाम संकीर्तन सम्मेलन, हैद्राबाद में

श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के भक्तों ने हैद्राबाद में विशाल हरिनाम संकीर्तन सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें देश-विदेश के भक्तों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया।

स्थानीय अखबारों / समाचार पत्रों ने कई चले इस कार्यक्रम को भरपूर coverage  दी।

पेश हैं उसकी कुछ झलकियां।

Click on the links given below:

http://www.webmilap.com/index.php?edn=&date=2018-12-31&edid=HINDIMIL_HIN&pn=19#Article/HINDIMIL_HIN_20181231_19_5/222px/1A89B18









उनका रथ चार अंगुल के स्थान पर चौदह अंग़ुल ऊपर उठ गया होता।

महाभारत के युद्ध की बात है। 14 दिन बीत चुके थे। उस रात को दोनों दल के सैनिक बहुत थक गये थे। अर्जुन ने युद्ध विराम की घोषणा करके सबको वहीं विश्राम करने को कहा तो किसी ने भी विरोध नहीं किया। कोई मुख से भले न कहे, प्रतिपक्ष के सैनिकों के हृदय से अर्जुन के लिये आशीर्वाद ही निकला। प्रथम दिन के प्रभात से भी पूर्व जो युद्ध में आ गये थे, वे पूरे दिन और आधी रात तक युद्ध का कठोर परिश्रम करते-करते अत्यन्त क्लान्त हो गये थे। बहुत आहत हो गये थे। सब वहींं रण-भुमि में जैसे भी बना, सो गये। वह दो घड़ी का विश्राम भी बहुत सुखद लगा।

इतना अथक प्रयास करने पर भी जब आचार्य द्रोण के समीप दुर्योधन उपालम्भ देने पहुँचा तो उसकी कठोर बातें सुनकर आचार्य चिढ़ गये। उन्होंने खरी-खरी सुना दी -- तुम पापी हो, इसलिए तुम्हें सर्वत्र पाप ही दीखता है। पाण्डव पुण्यात्मा हैंं, धर्मपरायण हैं, शीलवान हैं, इसलिए कोई 
सत्पुरुष उन्से स्नेह न करे, यह सम्भव नहीं है। यह स्त्य है कि मेरा उनपर स्नेह है, किन्तु युद्ध में स्नेह नहीं, कर्तव्य प्रधान होता है। युद्ध में भी पाण्डव मेरा सम्मान करते हैं और तुम्हारे लिए मैं प्राण देने को भी प्रस्तुत हूँ तो भी तुम सन्देह करते हो। तुमने पासों के साथ छलपूर्ण क्रीड़ा की तो कुछ सोचा था? हम सब भी तुम्हारा समर्थन करके मारे जायेंगे, यह जानता हूँ। मैंने प्रतिज्ञा की है कि परपक्ष को पराजित करके ही कवच उतारूँगा अन्यथा समरभूमि में सदा को सो जाऊँगा।

दुर्योधन ने देख लिया कि आचार्य बहुत क्रुद्ध हैं। उनसे कुछ कहने से बात बिगड़ेगी ही। वह वहाँ से चला हया। सेना बहुत थोड़ी रह गयी थी। व्यूह बनाया नहीं जा सकता था। फिर भी चन्द्रोदय होने पर पुनः युद्ध चल पड़ा।

द्रोणाचार्य आज अत्यन्त क्रूद्ध थे। वे बहुत आहत थे, थके थे और युद्ध में 
कवच न उतारने का प्रण ले चुके थे। इससे वे सब मर्यादाएँ भूल गये थे। सामान्य सैनिकों के संहार के लिए भी दिव्यास्त्र ही नहीं ब्रह्मास्त्र तक का प्रयोग करने लगे। उनका वेग रोकने के लिये पाण्डवों को वहीं आना पड़ा। आज आचार्य ने युधिष्ठिर तथा अर्जुन के विरुद्ध भी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। ये दोनों अस्त्रज्ञ थे, ब्रह्मास्त्र से ब्रह्मास्त्र, इन्होंने शान्त कर दिया, किन्तु द्रोणाचार्य ने महाराज द्रुपद को मार दिया। 

पाण्डव सभी सशंक हो उठे। आचार्य महान् अस्त्रवेत्ता हैं। वे कभी भी पाशुपात, नारायणास्त्र या ऐसा ही कोई अमोघास्त्र उठा सकते हैं। श्रीकृष्ण ने देखा कि उनके आश्रित पाण्डुपुत्र भयभीत हैं। अपने शरणागतों का संकट उन्हें सहय नहीं। उनके जन भय पायें, यह वे भव-भय-भंजन कैसे सह लें? 
आचार्य द्रोण पाण्डवों को नष्ट कर देने का निश्चय कर चुक हैं, यह भी उन सर्वज्ञ ने जान लिया। कोई कितना भी समर्थ हो, श्रीकृष्ण के चरणाश्रितों को नष्ट करने का संकल्प करके वह अपना विनाश ही बुलाता है।
द्रोणाचार्य स्वयं अपने लिये अनर्थ का सृजन करने लगे थे। जो दिव्यास्त्र नहीं जानते थे, उन पर दिव्यास्त्र का प्रयोग करना पाप था, पतन का हेतु था।  श्रीकृष्ण बोले - द्रोणाचार्य ने स्वयं युद्धारम्भ में महाराज युधिष्ठिर से कहा है कि उनके हाथ में धनुष रहते इन्द्रादि देवता भी उन्हें पराजित नहीं कर सकते। वे शस्त्र त्याग कर दें तभी उनका कोई वध कर सकता है। युद्ध में बहुत अप्रिय समाचार मिलने पर वे धनुष रख देते हैं, यह अपना स्वभाव भी उन्होंने बतलाया है। अतः किसी को जाकर उनसे कहना चाहिये कि अश्व्त्थामा मारा गया। एकमात्र पुत्र आचार्य को अत्यन्त प्रिय है। उसकी मृत्यु की बात सुनकर वे शस्त्र त्याग देंगे।



अर्जुन को यह बात नहीं रुचि लेकिन श्रीकृष्ण की बात का विरोध वे नहीं कर सकते थे। पाण्डवों में कोई नहीं था जो सर्वथा झूठ बोल सकता। भीमसेन ने उपाय निकाला। पाण्डवों के अपने पक्ष में ही थे मालवा के राजा इन्द्रवर्मा। उनके विशाल हाथी का नाम अश्वत्थामा था। भीमसेन ने उसे मार डाला। इतने पर भी बड़े संकोच से लज्जापूर्वक वे आचार्य द्रोण के समीप जाकर कह सके -- अश्वत्थामा मारा गया।

द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा दुर्योधन के साथ दूर दूसरे मोर्चे पर युद्ध कर रहा था। उसकी मृत्यु के समाचार से आचार्य के प्राण सूख गये, किन्तु उनका पुत्र तो अमर है और भीम इतने मन्द स्वर में, इतने संकोच में इतनी बड़ी विजय की घोषणा करने वाले नहीं हैंं, इन्हीं कारणों से आचार्य के मन में सन्देह हो गया। वे धृष्ट्द्युम्न पर प्रचण्ड वेग से आक्रमण करने में जुट गये।

द्रोणाचार्य ने पान्चाल वीरों के विनाश के लिये ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। वहाँ वीरों के शव बिछ गये। इससे विश्व में मर्यादा की सुरक्षा पर दृष्टि रखने वाले दिव्य ॠषि उद्विग्न हो उठे। वे सब द्रोण के समक्ष आये व कहा कि तुम्हारा मनुष्य लोक में रहने का समय पूरा हो चुका। अब पाप मत करो।

आचार्य ने भीमसेन की बात सुनी थी। ॠषियों के वचन भी सुने। उनके मरण के लिए ही उत्पन्न धृष्टद्युम्न सम्मुख था। उदास होकर उन्होंने राजा युधिष्ठिर से पूछा -- मेर पुत्र क्या सचमुच मारा गया?

द्रोणाचार्य को विश्वास था की युधिष्ठिर किसी प्रकार झूठ नहीं बोलेंगे। इस समय श्रीकृष्ण अपना रथ युधिष्ठिर के रथ से सटाये बैठे थे। उन्होंने कहा - आपको इस समय द्रोण के क्रोध से अपने पक्ष के वीरों की प्राण रक्षा करनी चाहिए। जो लोग स्वजन-परिवार त्यागकर आपकी सहायता के लिए युद्ध में मर-मिटने को उद्यत हैं, उनकी प्राण-रक्षा के लिए बोला गया झूठ पाप नहीं है। उससे बड़ा पाप है सच के भ्रम में पड़कर उन्हें मृत्युमुख में डाल देना। आचार्य यदि ऐसे ही युद्ध करते रहे तो आधे दिन में ही आपकी पूरी सेना का विनाश कर डालेंगे।

महाराज! आपको सर्वथा मिथ्या नहीं बोलना है। -- भीमसेन ने समीप आकर धीरे से कहा -- अपनी सेना के इन्द्रवर्मा के महागज अश्वत्थामा को मारकर मैंने आचार्य के सम्मुख जाकर कहा कि अश्वत्थामा मारा गया किन्तु मेरी बात पर विश्वास न करके वे आपसे पूछ रहे हैं। अतः आपको भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा स्वीकार कर लेनी चाहिए।

युधिष्ठिर ने हृदय में बहुत व्यथा का अनुभव किया किन्तु श्रीकृष्ण के आदेश को सर्वथा अस्वीकार भी नहीं किया जा सकता था। उन्होंने उच्च स्वर से कहा -- अश्वत्थामा मारा गया, फिर धीरे से बोले -- किन्तु हाथी।

श्रीकृष्णचन्द्र ने अपना पान्चजन्य शंख अधरों से लगा लिया था। युधिष्ठिर का 'किन्तु हाथी' ये धीरे से बोले गये शब्द उसके भयंकर निनाद में कोई कैसे सुनता।

कहते हैं कि युधिष्ठिर के रथ चक्र उनकी सत्यवादिता के प्रभाव से पृथ्वी से सदा चार अंगुल ऊपर रहते थे। उनके मुख से असत्य निकलते ही वे पृथ्वी से सट गये। 
एक महापुरुष ने इस विषय में लिखा है -- युधिष्ठिर ने सच्चे मन से श्रीकृष्ण की बात स्वीकार कर ली होती तो उनका रथ चार अंगुल के स्थान पर चौदह अंग़ुल ऊपर उठ गया होता।

बात महापुरुष की सच है। युधिष्ठिर ने अपने सत्य को बड़ा माना, उसे महत्ता दी और तब भी उसके साथ छल किया। यदि वे धर्म के परमप्रभु श्रीकृष्ण के आदेश पर आस्था करके बिना हिचके स्पष्ट पालन करते उसका, तो उनकी किन्चित भी धर्म-हानि नहीं होती।

----- श्रीसुदर्शन सिंह चक्र जी के लेखों से।

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

नारायण इति समर्पयात् ।



आपकी सारी की सारी क्रियायें, भगवान के लिये ही होनी चाहिए। 

'नारायणेति समर्पयेत् '।

अर्थात् सभी कुछ भगवान नारायण के अर्पण करो और सभी कुछ उन्हीं की सेवा के लिए ही करो ।