शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

वह पापी तो समझो, संसार में आया और ऐसे ही चला गया।

अक्रोध परमानन्द नित्यानन्दराय।
अभिमान-शून्य निताई नगरे बेड़ाई॥
अधम पतित जीवेर द्वारे-द्वारे गिया।
हरिनाम महामन्त्र देन बिलाइया॥
यारे देखे तारे कहे दन्ते तृण धरि'।
आमारे किनिया लह भज गौरहरि॥
एत बलि नित्यानन्द भूमे गड़ि याय।
सोनार पर्वत येन धूलाते लोटाय॥
हेन अवतार यार रति ना जन्मिल।
लोचन बले सेई पापी एल और गेल॥
क्रोध से रहित एवं परमानन्द से पूर्ण श्रीनित्यानन्द प्रभु, अभिमान शून्य होकर नगर में घूम रहे हैं।

वे सभी जीवों के घर-घर में जाकर हरिनाम महामन्त्र करने के लिये अनुरोध कर रहे हैं।

जिसको भी वे देखते हैं, उसे बड़ी ही दीनता के साथ विनती करते हैं कि आप श्रीकृष्ण का, श्रीगौरहरि का भजन करो। इसके बदले में आप मुझे खरीद लो। 
इतना कहकर श्रीनित्यानन्द प्रभु भगवद्-प्रेम के आनन्द में विभोर होकर, ज़मीन पर लोट-पोट होने लगते हैं। उस समय ऐसा लगता है कि जैसे सोने का पर्वत ज़मीन पर लोट-पोट हो रहा हो।

इस प्रकार के अवतार में जिसकी श्रद्धा, जिसका प्रेम नहीं हुआ, श्रीलोचन दास ठाकुरजी कहते हैं कि उसकी ज़िन्दगी तो बेकार है। वह पापी तो समझो, संसार में आया और ऐसे ही, बेकार में ही चला गया।


गुरुवार, 16 जनवरी 2020

भगवान ने जब स्वयं अपने हाथों से श्लोक को पूरा लिखा

श्रीजयदेव जी भगवान श्रीकृष्ण के प्रेमी भक्त थे।  आपके हृदय में श्रीकृष्ण प्रेम हिलोरें लेता रहता था। उसी प्रेम के ओत-प्रोत होकर आपने अमृत-रस के समान 'गीत-गोविन्द' नामक ग्रन्थ की रचना करनी प्रारम्भ की। ऐसे में एक दिन मान-प्रकरण में आप, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण श्रीमती राधा - रानी के पैर पकड़ेंगे, इस बात को लिखने का साहस नहीं कर पाये। 
उसी उधेड़बुन में आप नदी में स्नान करने चले गये। आपको स्नान जाते हुए देख, भगवान श्रीकृष्ण स्वयं, जयदेव जी के रुप में आपके घर में प्रवेश करने लगे।

आपकी पत्नी आपको इतनी शीघ्रता से अन्दर आता देख बोली -- 'अभी-अभी तो आप स्नान करने गये थे, और इतनी जल्दी आप वापिस कैसे आ गये?'

जयदेव रूपी भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया -- 'जाते-जाते एक बात मन 

में आ गई । बाद में कहीं भूल न जाऊँ, इसलिए लिखने आ गया। '

जयदेव रूपी भगवान श्रीकृष्ण ने भीतर जाकर, उन लिखे हुए पन्नों पर 'देहि पद पल्लवमुदारं' --- लिख कर कर उस श्लोक को पूरा कर दिया।

कमरे से बाहर आ कर जयदेव रूपी भगवान श्रीकृष्ण ने कहा --' अच्छा बहुत भूख लगी है। खाने के लिए कुछ है ? '

श्रीमती पद्मावती जी ने आसन बिछाया, आपको बिठाया और ठाकुर को अर्पित किया हुआ भोग, आपके आगे सजाया। भगवान रूपी जयदेव उसे

खाने लगे। कुछ देर बाद हाथ धोकर, अन्दर विश्राम को चले गए।

श्रीमती पद्मावती जी अभी पति द्वारा छोड़ा हुआ प्रसाद पाने बैठी ही थीं की किसी ने दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने उठ कर द्वार खोला तो देखा जयदेव जी खड़े हैं। बड़ी हैरानी से बोलीं --'अभी आप स्नान से आये, कुछ लिखा, प्रसाद पाया, विश्राम के लिए भीतर चले गये ---------- मेरे मन में कुछ सन्देह होता है कि वो कौन थे और आप कौन हैं?'

परम भक्त जयदेव जी सब समझ गये। आप शीघ्रता से घर के भीतर गये 

। आपका सारा ध्यान उस अधूरे श्लोक की ओर था जिसे आप आधा लिखा छोड़ कर गये थे। आप अपनी पोथी खोल कर दिव्य अक्षरों का दर्शन करने लगे। रोमांच हो आया आपको तथा प्रेमावेश में आपका हृदय उमड़ आया। आपकी आँखों से अश्रु-धारायें प्रवाहित होने लगीं। आपने अपनी पत्नी से कहा --'पहले मैं नहीं आया था, मेरे रूप में श्रीकृष्ण आये और उन्होंने वो श्लोक पूरा किया। तुम धन्य हो, तुम्हारा जीवन सार्थक है । तुमने श्रीकृष्ण का दर्शन किया और अपने
हाथों से भोजन करवाया।'

श्रीजयदेव गोस्वामी जी की जय !!!!!

मंगलवार, 14 जनवरी 2020

दीनता और आत्म निवेदन

जो भी भक्त भगवान की भक्ति करना चाहते हैं, उन्हें यह जानना ज़रूरी है कि भगवान के प्रति शरणागति के बिना भक्ति की गाड़ी नहीं चलती।

जैसे भवन के लिए नींव, जीवन के लिए प्राण ज़रूरी हैं, उसी प्रकार भक्ति लिए शरणागति ज़रूरी है।   

भगवान की भक्ति करने के लिए भगवान के अनुकूल होना जरूरी है। श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी ने लिखा कि शरणागति का पहला लक्षण  है दैन्य अर्थात् दीनता।  

दीनता का मतलब होता है कि किसी भी प्रकार के घमण्ड का ना होना। वैसे भी अगर हम सोचें तो हम किस वस्तु का घमण्ड कर सकते हैं, क्योंकि जो आज है, वो कल हो न हो। जो भी मेरे पास है उसे मैं बहुत कोशिश करके भी अपने पास हो सकता है कि न रख सकूँ। जैसे कोई व्यक्ति सुन्दरता का घमण्ड कर सकता है, कोई अधिक धन होने का घमण्ड कर सकता है तो कोई अधिक बल होने का। किन्तु ये सब वस्तुएँ बहुत ज्यादा देर तक नहीं टिकती। तो फिर घमण्ड किसका? वैसे आध्यात्मिक भाषा में दीनता का अर्थ होता है कि मैं इस दुनिया का नही हूँ। मैं तो श्रीकृष्ण के दासों के दासों का दास हूँ।

शरणागति का दूसरा अंग होता है -- आत्म निवेदन। मैं और मेरा अर्थात्  जीवात्मा, मेरा शरीर, मेरे हाथ, मेरे पैर, मेरा मन, बुद्धि इन्द्रियाँ, घर, परिवार, पैसा, सब कुछ भगवान का ही है -- ऐसे भावना को ही आत्मनिवेदन कहते हैं। वैसे भी ये सब भगवान का ही है। जिस ज़मीन को आज मैं अपना समझ रहा हूँ, उसे पहले कोई अपना समझता था, और उससे पहले कोई अन्य उस अपना समझता रहा। बस कुछ समय इंतज़ार करें, मेरे बाद कोई और उसे अपना समझेगा और उसके बाद कोई अन्य उस ज़मीन को अपना समझेगा। आप कह सकते हैं कि कोई कैसे इसे अपना बना लेगा, इसकी तो मेरे नाम पर राज़िस्ट्री है। किन्तु हम यह भूल जाते हैं कि एक समय आयेगा जब हम यहाँ से कूच करने कि तैयारी करेंगे और सब यहीं छूट जाएगा। अतः ये राजिस्ट्री नहीं, मिथ्या अभिमान है, मेरा। तो यह सोच कि मैं और मेरा सभी कुछ भगवान का ही है, इसे ही आत्म निवेदन कहते हैं। सोच होगी तो क्रिया भी होगी। 

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

जब भगवान श्रीजगन्नाथ आप के साथ चलने को तैयार हो गये…


एक बार श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के निर्देश से श्रीजगदीश पण्डित प्रभु, नीलाचल गये थे। श्रीधाम पुरी में श्रीजगन्नाथ जी के दर्शन कर आप प्रेम में आप्लावित हो गए तथा वहाँ से लौटते समय आप श्रीजगन्नाथ जी के विरह में व्याकुल हो गए। नन्दनन्दन श्रीकृष्ण, श्री चैतन्य महाप्रभु और श्री जगन्नाथ जी एक ही तत्त्व हैं। आपके विरह की अवस्था को देखकर श्रीजगन्नाथ जी ने स्वप्न में आपको सान्त्वना देते हुए कहा की आप चिन्ता न करें, मैं स्वयं आपके साथ चलूँगा । और आप मेरे श्रीविग्रह को लेकर उसकी सेवा करें। 

लेकिन श्रीजगन्नाथ जी श्रील जगदीश पण्डित के साथ कैसे जायेंगे, उसकी व्यवस्था करने के लिये भगवान ने तत्कालीन  राजा को स्वप्न में श्री जगन्नाथ देव जी के नव-कलेवर के समय उनका समाधिस्थ विग्रह श्रीजगदीश पण्डित को देने के लिये निर्देश दिया। महाराज जी, श्रीजगदीश पण्डित से मिल कर अपने को भाग्यवान समझने लगे और बड़ी श्रद्धा के साथ आपको उन्होंने श्रीजगन्नाथ जी का विग्रह अर्पण कर दिया। 


श्रीजगदीश पण्डित जी ने श्रीजगन्नाथ जी से कहा कि यह तो बड़ी प्रसन्नता की बात है कि आप मेरे साथ जायेंगे किन्तु आप के भारी विग्रह को किस प्रकार उठा कर ले जाऊँगा ? 

श्रीजगन्नाथ जी ने कहा -- तुम चिन्ता मत करो। मैं सूखी लकड़ी के खोखले तने के समान हलका हो जाऊँगा व आप मुझे एक नए वस्त्र में बाँध कर लाठी के सहारे कन्धों पर रख कर ले जायें तथा जहाँ पर स्थापन की इच्छा हो, वहीं पर रखें। 


श्रीजगदीश पण्डित प्रभु एक ब्राह्मण की सहायता से श्रीमूर्ति को कन्धे पर उठा कर पुरी से चक्रदह (पश्चिम बंगाल) के अन्तर्गत गंगा के तटवर्ती इलाका यशड़ा में आ गये। वहाँ आकर आप गंगा में स्नान-तर्पण हेतु, ब्राह्मण व्यक्ति के कन्धों पर श्रीजगन्नाथ देव को संभाल कर, गये। अचानक श्रीजगन्नाथ देव जी अत्यन्त भारी हो गए। सेवक उन्हें कन्धे पर रखने को असमर्थ हो गया और उन्हें ज़मीन पर उतार दिया। श्रीजगदीश पण्डित जब वापिस आए तो श्रीजगन्नाथ जी का ज़मीन पर अवतरण देख कर समझ गए कि श्रीजगन्नाथ देव जी ने वहीं पर ही अवस्थान करने की इच्छा की है।


चक्रदह एक ऐतिहासिक पवित्र स्थान है। पौराणिक युग में यह स्थान 'रथवर्म' नाम से प्रसिद्ध था। द्वापर के अन्त में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र श्रीप्रद्युम्न ने एक बार शम्ब्रासुर का इसी स्थान पर वध किया था। उसके बाद से इसने 'प्रद्युम्न नगर' नाम से प्रसिद्धि लाभ की, परवर्तीकाल में सगर वंश के उद्धार के लिए श्रीभगीरथ जब गंगा जी को ला रहे थे तो उसी समय उक्त स्थान में उनका रथ का पहिया (चक्र) धँस गया था इसलिए यह 'प्रद्युम्न नगर' चक्रदह नाम से प्रचारित हुआ। अब यह स्थान 'चाकदह' नाम से जाना जाता है।
श्रीजगन्नाथ देव जी पुरुषोत्तम धाम से यशड़ा श्रीपाट में आ गए हैं -- ये खबर जब चारों ओर प्रचारित हुई तो अगणित नर-नारी यशड़ा श्रीपाट में श्रीजगन्नाथ देव जी के दर्शनों के लिए आने लगे। श्रीजगन्नाथ देव जी के यशड़ा श्रीपाट में रहने के कारण श्रीजगदीश पण्डित प्रभु ने अपने घर मायापुर में न जाकर यशड़ा में ही अवस्थान करने का संकल्प लिया। श्रीजगन्नाथ का श्रीविग्रह पहले गंगा जी के किनारे एक वट वृक्ष के नीचे प्रतिष्ठित थी, बाद में गोयाड़ी कृष्ण नगर के राजा श्रीकृष्णचन्द्र के सहयोग से वहाँ पर एक मन्दिर निर्मित हुआ।


उक्त मन्दिर के जर्जर होने पर उमेश चन्द्र मजूमदार महोदय जी की सहधर्मिणी मोक्षदा दासी ने श्रीमन्दिर का पुनः संस्कार किया। मन्दिर चूड़ा-रहित व साधारण ग्रह के आकार जैसा है। श्रीमन्दिर में श्रीजगन्नाथ देव, श्रीराधा बल्लभ जी व श्री गौर गोपाल विग्रह विराजित हैं। जिस लाठी के सहयोग से श्रीजगदीश पण्डित जी पुरी से श्रीजगन्नाथ विग्रह लाए थे, वह लाठी अब भी श्रीजगन्नाथ मन्दिर में सुरक्षित है।

अखिल भारतीय श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के वर्तमान आचार्य श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी ने स्वरचित ग्रन्थ 'श्रीगौरपार्षद एवं गौड़ीय वैष्णवाचार्यों के संक्षिप्त चरितामृत' नामक ग्रन्थ में लिखा है कि भगवान श्रीकृष्ण की लीला में जो याज्ञिक ब्राह्मण पत्नी थीं, वे ही श्रीजगदीश पण्डित व श्रीहिरण्य पण्डित के रूप में श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की लीला में आविर्भूत हुईं थीं।



पाठकों की जानकारी के लिए हम बताना चाहते हैं कि चाकदह में विराजमान ये श्रीजगन्नाथ जी, जगन्नाथ पुरी के प्रसिद्ध मन्दिर से यहाँ पर आये हैं।

श्रीजगदीश पण्डित जी की जय !!!

सोमवार, 6 जनवरी 2020

प्रार्थना कैसी-कैसी?

व्यक्ति की अगर सोच ठीक होगी तो उसकी इच्छायें भी ठीक होंगीं। इच्छायें यदि ठीक होंगी तो क्रियायें भी ठीक ही होंगी। सोच ही गलत है तो क्रियायें भी गलग हो जायेंगी। इसीलिये तो भगवान कहते हैं -- जो लोग निरन्तर बड़े प्यार के साथ मेरी सेवा करते रहते हैं, मैं उनको बुद्धि देता हूँ की आगे क्या करना है, सही निर्णय कैसे लेना है। अतः व्यक्ति की सोच ठीक होनी चाहिये।

अब विचार करने की बात है कि हमारी सोच कैसी है? क्या हमारी सोच एक शरणागत भक्त जैसी है? इसके लिये  महान वैष्णव आचार्य श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी ने बहुत से भजन लिखे। जैसे एक भजन में उन्होंने लिखा कि हे प्रभु मैं तो आपसे तो मोक्ष भी नहीं चाहता हूँ, आपने अगर मुझे दोबारा जन्म देना हो तो दे देना, कोई बात नहीं…अगर आपकी इच्छा हो  मुझे दोबारा जन्म तो दे देना, बस मेरी प्रार्थना केवल इतनी है कि भक्त के घर में जन्म देना। आप पूछ सकते हैं कि उससे क्या होगा? तो उससे यह होगा कि भक्त के घर में जन्म लेने से छोटी उम्र में ही बच्चा भक्ति की क्रियायें अपने आप करने लगता है, उसके माता-पिता उसे प्रणाम कराते हैं। बचपन से ही माता-पिता उस बच्चे को कहते हैं, सिखाते हैं कि भगवान को प्रणाम कर, संतों को, गुरुजनों को प्रणाम कर, प्रसाद ले, चरणामृत ले, आदि। जन्म से ही ये संस्कार जब मिलेंगे और पिछली सुकृतियाँ भी होंगी तो बड़िया भक्त तो बनाना ही है।