शनिवार, 16 जनवरी 2021

और आप पर श्रील रूप गोस्वामी जी की कृपा हो गई…

श्रीकृष्ण लीला में जो विलास मंजरी हैं, वे ही श्री चैतन्य महाप्रभु जी की लीला में श्री जीव गोस्वामी हैं।

श्रीभक्ति रत्नाकर ग्रन्थ की पंचम तरंग में श्रीजीव गोस्वामी के प्रति श्रीरूप गोस्वामी की कृपा व शासन इस प्रकार वर्णित है --

गर्मियों का समय था, श्रीरूप गोस्वामी वृन्दावन में ही किसी एकान्त स्थान पर बैठकर ग्रन्थ लिख रहे थे । श्रीरूप गोस्वामी जी का शरीर पसीने से लथपथ देख श्रीजीव गोस्वामी उन्हें पंखे से हवा करने लगे। उसी समय श्रीवल्लभ भट्ट वहाँ पहुँच गए और कहने लगे --'मैं तुम्हारे भक्ति रसामृत ग्रन्थ के मंगलाचरण का संशोधन कर दूँगा।' -- ऐसा कह कर वे यमुना में स्नान करने चले गए। श्रीजीव गोस्वामी जी, वल्लभ भट्ट जी की इस प्रकार गर्व-पूर्ण बात सहन न कर सके और पानी लेने के बहाने आप भी यमुना के किनारे पहुँच गए, जहाँ वल्लभ भट्ट जी पहले ही उपस्थित थे। मौका देखकर श्रीजीव गोस्वामी जी ने श्रीवल्लभ भट्ट जी को पूछा कि आपने श्रीरूप गोस्वामी जी के लिखे ग्रन्थ भक्ति रसामृत के मंगलाचरण में गलती कहाँ देखी?

श्रीजीव गोस्वामी के पूछने पर श्रीवल्लभ ने उन्हें गलती बताई लेकिन श्रीजीव ने उनके मत का, उनकी युक्तियों का ज़ोरदार खण्डन किया और रूप गोस्वामी जी की लिखी बातों को ही भली-भान्ति स्थापित कर दिखाया। श्रीवल्लभ -- श्रीजीव गोस्वामी का अद्भुत पाण्डित्य देख कर आश्चर्यचकित रह गए एवं उन्होंने उत्सुकतावश सारी घटना श्रीरूप गोस्वामी प्रभु को सुनाई। घटना सुनकर श्रीरूप गोस्वामी जी ने श्रीजीव जी को स्नेह से डाँटते हुए कहा कि तुम शीघ्र ही पूर्व देश चले जाओ। जब तुम्हारा चंचल मन स्थिर हो जाए, तब वृन्दावन आना।

श्रीरूप गोस्वामी जी के निर्देशानुसार श्रीजीव गोस्वामी जी नन्द घाट पर 
आकर अपने गुरुजी की कृपा प्राप्त करने के लिए कभी भूखे, कभी दिने में थोड़ा सा खाकर तीव्र भजन करते हुए रहने लगे। कुछ दिन में ही आपका शरीर अत्यन्त कमज़ोर हो गया। संयोगवश एक दिन श्रील सनातन गोस्वामी उसी राह से गुज़र रहे थे तो ब्रजवासियों ने उन्हें श्रीजीव गोस्वामी के सम्बन्ध में बताया एवं भेंट कराई। श्रीजीव की इस प्रकार अवस्था देख कर श्रीसनातन गोस्वामी जी की आँखों में वात्सल्य के आँसु भर आए और उन्होंने श्रीजीव को समझा-बुझाकर श्रीरूप गोस्वामी के चरणों में पहुँचा दिया। इस प्रकार श्रीजीव गोस्वामी जी ने श्रीरूप गोस्वामी जी का स्नेह और उनकी कृपा प्राप्त की।

श्रील जीव गोस्वामी जी की जय !!!!!

जब भगवान श्रीजगन्नाथ आप के साथ चलने को तैयार हो गये…

एक बार श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के निर्देश से श्रीजगदीश पण्डित प्रभु, नीलाचल गये थे। श्रीधाम पुरी में श्रीजगन्नाथ जी के दर्शन कर आप प्रेम में आप्लावित हो गए तथा वहाँ से लौटते समय आप श्रीजगन्नाथ जी के विरह में व्याकुल हो गए। नन्दनन्दन श्रीकृष्ण, श्री चैतन्य महाप्रभु और श्री जगन्नाथ जी एक ही तत्त्व हैं। आपके विरह की अवस्था को देखकर श्रीजगन्नाथ जी ने स्वप्न में आपको सान्त्वना देते हुए कहा की आप चिन्ता न करें, मैं स्वयं आपके साथ चलूँगा । और आप मेरे श्रीविग्रह को लेकर उसकी सेवा करें। 

लेकिन श्रीजगन्नाथ जी श्रील जगदीश पण्डित के साथ कैसे जायेंगे, उसकी व्यवस्था करने के लिये भगवान ने तत्कालीन  राजा को स्वप्न में श्री जगन्नाथ देव जी के नव-कलेवर के समय उनका समाधिस्थ विग्रह श्रीजगदीश पण्डित को देने के लिये निर्देश दिया। महाराज जी, श्रीजगदीश पण्डित से मिल कर अपने को भाग्यवान समझने लगे और बड़ी श्रद्धा के साथ आपको उन्होंने श्रीजगन्नाथ जी का विग्रह अर्पण कर दिया। 
श्रीजगदीश पण्डित जी ने श्रीजगन्नाथ जी से कहा कि यह तो बड़ी प्रसन्नता की बात है कि आप मेरे साथ जायेंगे किन्तु आप के भारी विग्रह को किस प्रकार उठा कर ले जाऊँगा ? 

श्रीजगन्नाथ जी ने कहा -- तुम चिन्ता मत करो। मैं सूखी लकड़ी के खोखले तने के समान हलका हो जाऊँगा व आप मुझे एक नए वस्त्र में बाँध कर लाठी के सहारे कन्धों पर रख कर ले जायें तथा जहाँ पर स्थापन की इच्छा हो, वहीं पर रखें। 

श्रीजगदीश पण्डित प्रभु एक ब्राह्मण की सहायता से श्रीमूर्ति को कन्धे पर उठा कर पुरी से चक्रदह (पश्चिम बंगाल) के अन्तर्गत गंगा के तटवर्ती इलाका यशड़ा में आ गये। वहाँ आकर आप गंगा में स्नान-तर्पण हेतु, ब्राह्मण व्यक्ति के कन्धों पर श्रीजगन्नाथ देव को संभाल कर, गये। अचानक श्रीजगन्नाथ देव जी अत्यन्त भारी हो गए। सेवक उन्हें कन्धे पर रखने को असमर्थ हो गया और उन्हें ज़मीन पर उतार दिया। श्रीजगदीश पण्डित जब वापिस आए तो श्रीजगन्नाथ जी का ज़मीन पर अवतरण देख कर समझ गए कि श्रीजगन्नाथ देव जी ने वहीं पर ही अवस्थान करने की इच्छा की है।

चक्रदह एक ऐतिहासिक पवित्र स्थान है। पौराणिक युग में यह स्थान 'रथवर्म' नाम से प्रसिद्ध था। द्वापर के अन्त में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र श्रीप्रद्युम्न ने एक बार शम्ब्रासुर का इसी स्थान पर वध किया था। उसके बाद से इसने 'प्रद्युम्न नगर' नाम से प्रसिद्धि लाभ की, परवर्तीकाल में सगर वंश के उद्धार के लिए श्रीभगीरथ जब गंगा जी को ला रहे थे तो उसी समय उक्त स्थान में उनका रथ का पहिया (चक्र) धँस गया था इसलिए यह 'प्रद्युम्न नगर' चक्रदह नाम से प्रचारित हुआ। अब यह स्थान 'चाकदह' नाम से जाना जाता है।
श्रीजगन्नाथ देव जी पुरुषोत्तम धाम से यशड़ा श्रीपाट में आ गए हैं -- ये खबर जब चारों ओर प्रचारित हुई तो अगणित नर-नारी यशड़ा श्रीपाट में श्रीजगन्नाथ देव जी के दर्शनों के लिए आने लगे। श्रीजगन्नाथ देव जी के यशड़ा श्रीपाट में रहने के कारण श्रीजगदीश पण्डित प्रभु ने अपने घर मायापुर में न जाकर यशड़ा में ही अवस्थान करने का संकल्प लिया। श्रीजगन्नाथ का श्रीविग्रह पहले गंगा जी के किनारे एक वट वृक्ष के नीचे प्रतिष्ठित थी, बाद में गोयाड़ी कृष्ण नगर के राजा श्रीकृष्णचन्द्र के सहयोग से वहाँ पर एक मन्दिर निर्मित हुआ।

उक्त मन्दिर के जर्जर होने पर उमेश चन्द्र मजूमदार महोदय जी की सहधर्मिणी मोक्षदा दासी ने श्रीमन्दिर का पुनः संस्कार किया। मन्दिर चूड़ा-रहित व साधारण ग्रह के आकार जैसा है। श्रीमन्दिर में श्रीजगन्नाथ देव, श्रीराधा बल्लभ जी व श्री गौर गोपाल विग्रह विराजित हैं। जिस लाठी के सहयोग से श्रीजगदीश पण्डित जी पुरी से श्रीजगन्नाथ विग्रह लाए थे, वह लाठी अब भी श्रीजगन्नाथ मन्दिर में सुरक्षित है।

अखिल भारतीय श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के वर्तमान आचार्य श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी ने स्वरचित ग्रन्थ 'श्रीगौरपार्षद एवं गौड़ीय वैष्णवाचार्यों के संक्षिप्त चरितामृत' नामक ग्रन्थ में लिखा है कि भगवान श्रीकृष्ण की लीला में जो याज्ञिक ब्राह्मण पत्नी थीं, वे ही श्रीजगदीश पण्डित व श्रीहिरण्य पण्डित के रूप में श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की लीला में आविर्भूत हुईं थीं।

पाठकों की जानकारी के लिए हम बताना चाहते हैं कि चाकदह में विराजमान ये श्रीजगन्नाथ जी, जगन्नाथ पुरी के प्रसिद्ध मन्दिर से यहाँ पर आये हैं।

श्रीजगदीश पण्डित जी की जय !!!

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

क्यों आपने श्रीनित्यानन्द जी की महिमा में गीत लिखे…

 

श्रील लोचन दास ठाकुर जी ने सन् 1537 ई में 'चैतन्य मंगल' ग्रन्थ लिखा था। ऐसा कहा जाता है कि श्रील लोचन दास ठाकुर जी ने अपने घर में फूल के वृक्ष के नीचे एक पत्थर के ऊपर बैठकर 'चैतन्य मंगल' नामक ग्रन्थ लिखा था। 

आपने इसके अलावा -- 'प्रार्थना, दुर्लभसार, पदावली, जगन्नाथ-बल्लभ नाटक तथा रासपन्चाध्यायी का पद्यानुवाद' भी लिखा था।

'चैतन्य मंगल' लिखने के बाद आपके मन में विचार आया कि इस ग्रन्थ में श्रीनित्यानन्द जी की महिमा पूरी तरह से वर्णन नहीं हो पायी। इस आशंका से आपने श्रीनित्यानन्द महिमा सूचक गीतियाँ भी लिखीं।

उनमें से एक यह है --

'अक्रोध परमानन्द नित्यानन्दराय । 
अभिमान शून्य निताई नगरे बेड़ाय॥ 
अधम पतित जीवेर द्वारे-द्वारे गिया। 
हरिनाम महामन्त्र देन बिलाइया॥ 
यारे देखे तारे कहे दन्ते तृण करि'। 
आमारे किनिया लह भज गौरहरि॥ 
एत बलि नित्यानन्द भूमे गड़ि याय।
सोनार पर्वत येन धूलाते लोटाय ॥
हेन अवतारे यार रति ना जन्मिल। 
लोचन बले सेइ पापी एल आर गेल॥' 

अर्थात्,

क्रोध रहित एवं परमानन्द से भरे श्रीनित्यानन्द प्रभु जी अभिमान शून्य होकर नगर में भ्रमण कर रहे हैं। 

आप पतित जीवों के घर-घर (द्वार-द्वार) पर जाकर हरे कृष्ण महामन्त्र बाँटते फिर रहे हैं। 

आप जिनको भी देखते हैं उससे दाँतों में तिनका लेकर अर्थात् अत्यन्त दीनता से कहते हैं कि आप गौरहरि का भजन करो और मुझे खरीद लो। मैं आपके सभी काम करूँगा। 

इतना कह कर श्रीनित्यानन्द प्रभु प्रेमानन्द में विभोर होकर ज़मीन पर लोट-पोट होने लगते हैं। तब ऐसा लगता है कि मानो सोने का पर्वत ज़मीन पर लोट-पोट हो रहा हो।

इस प्रकार के अवतार में जिसकी प्रीति उदित नहीं हुई, श्रीलोचन दास ठाकुर जी कहते हैं कि उसकी ज़िन्दगी बेकार है। वह पापी तो समझो, आया और गया। 

श्रील लोचन दास ठाकुर की जय !!!!! 

शनिवार, 9 जनवरी 2021

मन तो बहुत चंचल है, जी..... -6

श्रीकृष्ण ने श्रीगीता में बताया कि भगवद् भक्ति बहुत फायदेमंद है।

कहते हैं कि भक्ति की उच्च स्थिती को प्राप्त करके और कुछ चाहने की इच्छा ही नहीं रहती।  अन्य सुख छोटे लगने लगते हैं। ध्रुव जी भगवान की तपस्या करने गये इस इच्छा से कि मैं पिताजी से भी बड़ा राज्य प्राप्त करूँगा। हो सकता है कि पिताजी अपना राज्य मेरे भाई उत्तम को दे दें, अतः मुझे उससे बड़ा राज्य का राजा होना चाहिए। 

जब भगवान के दर्शन हुए, इतना आनन्द हुआ कि उन्हें राज्य की इच्छा तुच्छ लगने लगी। भगवान के दर्शन उन्हें स्पर्श मणि और राज्य की इच्छा काँच के समान लगने लगी। वे बोले - भगवन् ! मुझे कुछ नहीं चाहिए।

श्रीभगवान -- बेटा वर माँगो! तुम शायद भूल गये कि मुझसे बड़ा राज्य माँगने के लिए तुमने तपस्या की थी।

ध्रुव जी -- हे प्रभो! मुझे सब याद है। किन्तु आपका दर्शन पाकर मैं कृतार्थ हो गया हूँ। मुझे कुछ नहीं चाहिए। 

ये ऐसा राज्य है जहाँ जो भक्ति कि उच्च स्थिति में आ जाता है, उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। ऐसा श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी ने अपनी टीका में लिखा। जब वो कुछ कार्य करने का संकल्प लेता है तो गुरू-वैष्णव-भगवान उसके पीछे खड़े हो जाते हैं। जहाँ पर गुरू-वैष्णव-भगवान आ जायें, वहाँ पर तो असम्भव भी सम्भव हो जाता है।  श्रील ठाकुर ने बोध कथा बताई कि एक छोटी सी चिड़िया थी। उसने समुद्र के किनारे अण्डे दिये। अब समुद्र में लहरें तो आती ही रहती हैं। लहरें आईं और अण्डों को बहा कर ले गईं। चिड़िया जब चुग कर वापिस आई तो उसने देखा अण्डे नहीं है। उसने वहाँ पर अन्य चिड़ियों से बात-चीत कर जानना चाहा कि उसके अण्डे कहाँ चले गए?

उन्होंने कहा कि यह स्थान क्या अण्डे देने का है? समुद्र की लहर आई होगी, अण्डों को ले गई होगी।

चिड़िया -- समुद्र मेरे अण्डे क्यों लेगा? मैंने तो उसे कभी परेशान नहीं किया? वो मुझे क्यों परेशान करेगा?

वो समुद्र के किनारे गई, अपनी भाषा में अपने अण्डे माँगती रही।

समुद्र को क्या फर्क पड़ना था।

चिड़िया को गुस्सा आ गया और उसने कहा कि मैं इतनी देर से दुहार लगा रही हूँ, अब मैं तुम्हें सुखा दूँगी।

चिड़िया चोंच में पानी लेती है, रेत में डाल देती कि समुद्र सुखा दूँगी। सौभाग्य से नारद जी वहाँ आ गये। उन्होंने चिड़िया को ऐसा करते देख उससे बातचीत की। (नारद जी सारी भाषायें जानते हैं)

नारद जी -- अरे इसको कहाँ सुखा पाओगी? 

चिड़िया -- देखो महाराज! आप मेरी कुछ सहायता कर सकते हैं तो करो, किन्तु मेरा समय खराब नहीं करो।

चिड़िया पानी लेती है और रेत में डाल देती है।

नारद जी को उसकी दृड़ता व संकल्प पर दया आ गई। सीधा गरुड़ जी के पास जा पहुँचे। उन्हें सारी बात बताई और कहा कि उसकी सहायता करो। 

गरुड़ जी तुरन्त आ गये। आते ही समुद्र पर ज़ोर से हाथ मारा।

साधारणतयः देखा जाता है कि व्यक्ति सामने वाले की ताकत से ही डरता है। समुद्र उसी वक्त प्रकट हो गया, जब उसने सुना कि गरुड़ जी कह रहे हैं - अरे समुद्र, इस चिड़िया के अण्डे वापिस कर नहीं तो मैं अपने पंखों से तुझे सुखा दूँगा।

समुद्र ने तुरन्त अण्डे लौटा दिये।

हालांकि चिड़िया के बस की बात नहीं थी किन्तु जब उसे नारद जी जैसे वैष्णव का साथ जब मिला तो गरुड़ जी खड़े हो गये, और चिड़िया का काम बन गया।

अर्थात् जब कोई भक्त कोई संकल्प ले लेता है तो गुरू-वैष्णव-भगवान उसके असंभव लगने वाला कार्य भी सम्भव कर देते हैं। 

अतः भगवद् भक्ति से किसी का घाटा नहीं होता।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भगवद् भक्त के पास दुःख फटकता ही नहीं और कभी आ भी जाए तो उसे एहसास ही नहीं होता क्योंकि वो सदा ही आनन्द में रहता है। इतना तृप्त रहता है कि उसे कोई इच्छा ही नहीं होती।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

मन तो बहुत चंचल है, जी..... -5

भजन करना घाटे का सौदा नहीं है। भजन करने वाला माला माल हो जाता है। शरणागति के साथ भजन करने वाले को हरि-भक्ति माला-माल कर देती है। हरि भक्ति करते हुए व्यक्ति ऐसी स्थिति पर पहुँच जाता है कि वो तृप्त हो जाता है, आनन्द से भर जाता है।

इस स्थिति को प्राप्त करने के बाद व्यक्ति को लगता है कि इससे श्रेष्ठ कुछ और है ही नहीं। एक बार की बात है। एक व्यक्ति महान भक्त श्रील सनातन गोस्वामी जी के पास आया व बोला - मुझे भगवान केदारनाथ जी (शिव जी महाराज जी) ने भेजा है। उन्होंने कहा था कि धन चाहिए तो सनातन गोस्वामी के पास चले जाओ।

सनातन गोस्वामी जी -- भाई! एक समय तो मेरे पास धन था। मैं प्रधान मन्त्री था तब आते तो मैं तुम्हें माला-माल कर सकता था, किन्तु अब तो मेरे पास ऐसा कुछ नहीं है।

वो व्यक्ति -- जी हाँ, मैं यह देख पा रहा हूँ।

इतना कहकर वो लौट गया।

कुछ ही देर में श्रील सनातन गोस्वामी जी को याद आया कि उनके पास एक स्पर्श मणि थी। उन्होंने शीघ्रता से उस व्यक्ति को बुलाया और कहा कि मेरे पास एक पारस मणि थी, मुझे याद नहीं कि कहाँ पर रखी थी, उसे ढूँढ सको तो ले जाओ। बहुत ढूँढने पर पारस मणि कबाड़ में पड़ी मिल गयी।

उस व्यक्ति ने उस मणी को लोहे को छुआ, वो सोने कें परिवर्तित हो गया।  यह देख वो प्रसन्न हो गया कि मेरे जैसा संसार में धनी नहीं हो सकता। मैं लोहा खरीदूँगा और सोना बनाऊँगा। वो खुशी से नाचने लगा।

श्रील सनातन गोस्वामी जी को बहुत धन्यवाद देता हुआ, वो वहाँ से चला निकला।

श्रील सनातान गोस्वामी जी की कृपा से, श्री शिव जी महाराज जी की कृपा से उसका मन बदल गया, कुछ दूर जाकर सोचने लगा कि इतनी दुर्लभ पारस मणि, श्रीसनातन गोस्वामी जी ने फेंकी हुई थी और उन्हें याद भी नहीं था कि कहाँ फेंकी हुई है। इसका अर्थ यह हुआ कि उनके पास इससे भी बड़ा धन है। कौन सा धन है उनके पास? वो लौटा।

सारी बात श्रील सनातन गोस्वामी जी को कही।

श्रील सनातन गोस्वामी जी ने कहा -- हाँ! वो तो है। हरिनाम ऐसा धन है जिसके आगे सभी धन तुच्छ हैं। 

श्रील सनातन गोस्वामी जी के दर्शन से ही उसका मन परिवर्तित हो गया। उसने कहा - प्रभो! मैं भी यह धन चाहता हूँ जिसके आप धनी हैं।

श्रीसनातन गोस्वामी जी -- यदि यह धन चाहिए तो पारस मणि तो यमुना में फेंक दो।

उसके वैसा ही किया और उसके बाद हरिनाम का रसास्वादन किया।

भगवद् भजन करने से, उसका रसास्वादन हो जाता है तो पिछ्ले कर्मानुसार अथवा कोई दुःख उसके पास भी आ जाये तो भी वो विचलित नहीं होता।

ना सुख, ना दुःख्…………वो तो भगवान की सेवा में ही लीन रहता है।