सोमवार, 19 अक्तूबर 2020

श्रीमद् भगवद् गीता - 7

श्रीगीता के वक्ता  कौन हैं?  

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं  कि पूरी दुनिया क पिता मैं हूँ, माता भी मैं ही हूँ। लालन करने वाली माता, पालन करने वाला पिता मैं ही हूँ। इस संसार का आश्रय है, तो वो भी मैं ही हूँ। इस संसार का पितामह भी मैं ही हूँ। मेरा कोई कारण नहीं है। मैं सब कुछ जानने योग्य हूँ। मैं ही ॐकार हूँ, सारे वेद भी मैं ही हूँ। 

अगर इसके बाद भी कोई भगवान को लेकर संशय रखता है तो उसे श्रीगीता पढ़ने का कोई फायदा नहीं है। श्रीगीता पढ़ने का अर्थ है गीता की बात को मानना। जैसे कोई कहे कि मैं अपने पिताजी को बहुत मानता हूँ किन्तु उनकी बात नहीं मानता हूँ। तो क्या यह पिताजी को मानना हुआ?  पिताजी को मानने का अर्थ है, उनकी बात को मानना। 

दुनिया में जितने भी यज्ञ हैं उनका एकमात्र भोक्ता मैं ही हूँ। -- श्रीकृष्ण

भगवान यह भी बताते हैं कि ये देवता तो मुझ से प्रकट हुए हैं, मैं ही सबका कारण हूँ अतः ये मुझे नहीं भी जान सकते। 

जो मुझे अजन्मा, अनादि, समस्त का कारण मानता है, केवल वह व्यक्ति ही संसार से मुक्त हो सकता है। उसे ही श्रीगीता समझ में आ सकती है।

अर्जुन के भगवद् गीता समझ में आई क्योंकि अर्जुन ने कहा कि हे कृष्ण! आप ने मुझ से जो कहा मैं उसे पूर्णतयः सत्य मानता हूँ। 

तो श्रीगीता को समझने के लिए हमें भगवान की बात पर विश्वास करना होगा। यह बात समझ लेनी पड़ेगी कि श्रीकृष्ण ही परब्रह्म हैं, इस बात को जान लेने के बाद ही श्रीभगवद् गीता पढ़ना प्रारम्भ होता है।


मंगलवार, 13 अक्तूबर 2020

श्रीमद् भगवद् गीता - 6

श्रीगीता कि बातें समझ में जब आयेंगी जब हम श्रीकृष्ण को जान जायेंगे। 

दुनिया में भी देखा जाता है कि हम उसी व्यक्ति की बात पर ज्यादा ध्यान देते हैं, जिसको हम कुछ समझते हैं। जिन्हें हम कुछ समझते ही नहीं हैं, उनकी बात पर हम कुछ ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं। वो व्यक्ति जितना ज्यादा हमारे लिए महत्वपूर्ण है, उसकी बात हम उतनी अधिक मानते हैं। भगवान श्रीकृष्ण की बात पर हम ध्यान देंगे, अगर हमको श्रीकृष्ण की value पूरी तरह पता हो तो। श्रीकृष्ण की बात पर हमें विश्वास तब होगा जब हम इस शाश्वत सत्य का अनुभव करेंगे कि श्रीकृष्ण एक साधारण मानव नहीं बल्कि भगवान हैं। वे सभी कारणों के कारण हैं।  उदहारण के लिए दो व्यक्ति बार कर रहे थे --

पहला व्यक्ति --  यह जो हम सांस लेते हैं उसके लिए वायु कहाँ से आ रही है?

दूसरा व्यक्ति -- प्रकृति से।

पहला -- ये जो रोटी खा रहे हो, फल खा रहे हो, ये कहाँ से आ रहा है?

दूसरा -- प्रकृति से।

पहला -- ये जो पानी पी रहे हो, शरीर में 70% से भी अधिक मात्रा में जो है, वह कहाँ से आ रहा है?

दूसरा - प्रकृति से।

अगर कोई पूछे कि यह जो प्रकृति है, यह किसकी है, किसकी शक्ति यह सारा काम कर रही है………………………?

भगवान श्रीकृष्ण, श्रीगीता के नौवें अध्याय में बताते हैं कि जितने दुनिया में प्राणी हैं, सारे प्राणी मेरी प्रकृति में प्रवेश करते हैं व बाद में मैं ही उन्हें पुनः सृजन करता हूँ। मैं ही प्रकृति का स्वामी हूँ।

जब तक भगवान हमें नहीं बतायेंगे कि वे कौन हैं अथवा जब तक हमारा अपना उनके बारे में अनुभव न हो जाये,  तब ही हमें उनके बारे में पता चलेगा।

अतः जिस प्रकृति से हमारा खाना-पीना, जिंदा रहना आदि चल रहा है, भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वो मेरी है।

'हे कुन्तिपु्त्र ! ये जो भौतिक प्रकृति है, यह मेरी अनेक शक्तियों में से एक है व मेरी अध्यक्षता में कार्य करती है। '

श्रीगीता हमारे हर प्रश्न का जवाब देती है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मूर्ख लोग मुझे समझते ही नहीं हैं। वे मेरे दिव्य स्वभाव को नहीं जानते। मैं जो सारे प्राणियों का ईश्वर हूँ, यह वे नहीं जानते।


शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2020

श्रीमद् भगवद् गीता - 5

श्रीभगवद् गीता को समझने के लिए इस बात को स्वीकर करना पड़ेगा कि श्रीकृष्ण भगवान हैं। 

श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि जब-जब धर्म की ग्लानि होने लगती है, आत्म धर्म ह्रास होने लगता है, अधर्म बढ़ने लगता है तो भगवद्भक्तों के परित्राण के लिए और दुष्टों के संहार लिए युग-युग में मैं अवतरित होता हूँ। मेरा अवतरण दुनिया के साधारण मनुष्यों सा नहीं होता। मेरा जन्म भी दिव्य है और कर्म भी। देखो न भगवान श्रीकृष्ण कंस के कारागार में रोते हुए पैदा नहीं हुए। शास्त्रों में वर्णित है कि श्रीदेवकि-वसुदेव की आँखें चौँधिया गयी थीं प्रकाश देखकर, फिर देखा प्रकाश के बीचोबीच शंख-चक्र-पद्म-गदा लिए भगवान विराजमान हैं। दोनों ने उनकी स्तुति करी और कहा कि हमने तो आपको पुत्र रूप में चाहा था। भगवान ने कहा कि मैं अभी पुत्र रूप में हो जाता हूँ। आपके हृदय में जो कंस का डर था उसे दूर करने के लिए ही मैं इस रूप में आया। भगवान श्रीराम माता कौशल्या देवी के आगे प्रकट हुए तो वे भी चतुर्भुज रूप में ही प्रकट हुए। ये दिखाने के लिए कि मैं साधारण मनुष्य नहीं हूँ। फिर भी कोई मोटी बुद्धि वाला यह प्रश्न करे कि भगवान को भी माता-पिता चाहिए तो प्रह्लाद जी के कहने पर भगवान खम्बे में से ही प्रकट हो गये। फिर भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि निराकारवादी जिस ब्रह्म की उपासना करता, उसका कारण भी मैं ही हूँ। यह जो सारा संसार है,  ये सारा संसार मेरी माया से बना हुआ है। श्रीगीता में अनेक बातों से पता चलता है कि श्रीकृष्ण साधारण मनुष्य नहीं, भगवान हैं। 

श्रीमद् भगवद् गीता के 18वें अध्याय में जहाँ पर अर्जुन को सारा ज्ञान दे दिया, वहाँ पर उन्होंने कहा कि सारा रहस्य मैंने आपको बता दिया, अब जो मन कहता है वो करो।

भगवान ने फिर कहा कि जो सबसे गोपनीय है, अब वो सुनो! श्रीकृष्ण ने जो कहा उसे सुनने बाद अर्जुन ने कहा, हे प्रभु! मेरा सारा मोह नष्ट हो गया। मेरे सारे सन्देह चले गए।

इन सबसे पता चलता है कि श्रीकृष्ण साधारण मनुष्य नहीं हैं। फिर श्रीगीता में श्रीकृष्ण के विराट रूप का भी वर्णन है। अतः श्रीमद् भगवद् गीता को समझने के लिए, यह विश्वास बनाना होगा कि श्रीकृष्ण ही भगवान हैं।

सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

श्रीमद् भगवद् गीता - 4

श्रीगीता की कुछ मुख्य बातों में से … 


यह एक ऐसा ग्रन्थ है जिसके उपदेश, किसी दुनियावी व्यक्ति अथवा ॠषी ने नहीं दिये। 


यह एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें हर स्वाल का जवाब परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण ने दिए हैं।


श्रीगीता में एक श्लोक धृतराष्ट्र ने बोला है। वहाँ का वर्णन किया श्रीसंजय ने जो धृतराष्ट्र जी के मन्त्री हैं। उन्होंने 41 श्लोक कहे। अपने दिल के प्रश्नों अथवा बातों को पूछते हुए श्रीअर्जुन ने 84 श्लोक बोले हैं।  बाकी के सभी श्लोक श्रीकृष्ण ने कहे हैं, 574 श्लोकों में, यह सब 45 मिनट में कहा गया।


यह ग्रन्थ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने हमें प्रदान किया है।


एक और बात कि जहाँ पर धृतराष्ट ने कुछ कहा तो लिखा है धृतराष्ट्र उवाच्……


अगर श्रीसंजय ने कुछ कहा तो वहाँ पर लिखा है संजय उवाच्……


जहाँ पर अर्जुन कुछ बोल रहे हैं तो श्लोक से पहले लिखा है……अर्जुन उवाच्…


परन्तु जहाँ पर श्रीकृष्ण कुछ बोल रहे हैं तो वहाँ पर श्रीकृष्ण उवाच नहीं लिखा हुआ अथवा देवकीनन्दन उवाच् नहीं लिखा हुआ अथवा वसुदेव-नन्दन उवाच् नहीं लिखा, वहाँ पर लिखा है - श्रीभगवान उवाच्।


यानिकि अगर श्रीगीता को हमें समझ्ना है तो सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि श्रीकृष्ण कोई साधारण मनुष्य नहीं है, कोई साधारण ज्ञानी नहीं हैं, कोई साधारण अथवा असाधारण देवता नहीं है, बल्कि स्वयं भगवान हैं। 


भगवान अर्थात सर्वशक्तिमान्।


श्रीगीता की मुख्य बातों में से एक विशेष बात यह है कि श्रीमद् भगवद् गीता को समझने के लिए हमें श्रीकृष्ण को भगवान मानना होगा और यह विश्वास करना होगा कि यही सत्य है, क्योंकि यही सत्य है कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान हैं । 


श्रीगीता में ही यह प्रमाण आपको कई जगहों पर मिल जाएगा कि श्रीकृष्ण ही भगवान हैं। 


जैसे -- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा………यह जो गीता का दिव्य ज्ञान है, यह मैंने सबसे पहले सूर्य को दिया था.……मेरा जन्म-कर्म तो दुनिया के लोगों की तरह नहीं है, बल्कि दिव्य है।


मंगलवार, 29 सितंबर 2020

श्रीमद् भगवद् गीता - 3

हमें अपने ही घर में कई बार सफाई करनी पड़ती है और उस सफाई के बाद जो घर का कूड़ा इकट्ठा होता है उसे हम बाहर फेंक देते हैं। इसी प्रकार खेती-बाड़ी करते हुए, फसल बोने के बाद, देखा जाता है कि फसल के साथ घास उग आई है। समझदार किसान उसे काट कर बाहर फेंक देता है। इसी प्रकार समाज में जो गलत लोग अच्छे लोगों को परेशान करते हैं तो उन्हें दण्ड देना पड़ता है। अगर उन्हें दण्ड न दें तो,  अच्छे लोग ठीक से रह नहीं पाते हैं। अतः परिवार का मुखिया परिवार के गलत सदस्य को शासन करता है और अच्छे को शाबाशी देते हैं। इसी प्रकार स्माज के जो मुखिया हैं उन्हें भी यही करना चाहिए। भगवान ने भी यही किया। महाभारत का युद्ध क्यों हुआ? युद्ध होने का कारण ही यह है कि वो जो समाज में दुष्ट प्रकार के लोग फैल गये हैं, जिन्होंने समाज के सार नियमों को, मर्यादा को ताक पर रख दिया है, जो कि नासूर हैं, जिन्हें ठीक नहीं किया जा सकता, जिन्होंने भगवान की कही हुई बात भी नहीं मानी,  ऐसों को रखकर क्या होता?

अतः श्रीगीता के पहले श्लोक के तात्पर्य में ही वैष्णव आचार्यों ने यह स्पष्ट कर दिया कि धृतराष्ट्र हालांकि दिखा यही रहा है कि वो युद्ध नहीं चाहता है किन्तु वास्तव में वो युद्ध ही चाहता था। उसे यह विश्वास था कि मेरे पुत्रों की जीत अवश्य ही होगी क्योंकि संख्या भी है और धुरन्धर योद्धा भी, जैसे पितामह भीष्म, जिनके पास इच्छा-मृत्यु का वरदान है, एक प्रकार से जो अमर हैं। गुरू द्रोणाचार्य, आदि।

पुत्र-मोह में वह सोचता है कि एक बार युद्ध हो जाये, तो मेरे पुत्रों को यह पूर्ण राज्य मिले।

खेत में फसल बोई, साथ में घास उग आये तो उससे प्रेम थोड़ा ना किया जा सकता है। किसान अगर उस घास-फूस से प्रेम करेगा तो फसल ही नष्ट हो जायेगी।