रविवार, 12 जनवरी 2014

भक्तेर द्रव्य प्रभु काड़ि-काड़ि खाय

यशोदानन्दन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ही शचीसुत निमाई के रूप में आविर्भूत हुए थे। श्रीगौरांग महाप्रभु जी के पार्षदभक्तों के बिना निमाई को पुत्र रूप में स्नेह करने का परम सौभाग्य लाभ होना सम्भव नहीं हो सकता। श्रीजगदीश पण्डित प्रभु श्रीमन्महाप्रभु के कितने प्रिय थे, यह उन्होंने अपनी बाल्यलीला में छल के द्वारा प्रदर्शित किया है।

संकीर्तन पिता श्रीमन्महाप्रभु बाल्यलीला के छल से सबको हरिनाम कराते
थे। शचीमाता और अन्यान्य सब स्त्रियाँ जब हाथ से ताली बजा कर हरिनाम कीर्तन करती थीं तब ही शिशु निमाई का क्रन्दन रुकता था।

एक दिन एकादशी तिथि में श्रीजगन्नाथ मिश्र, श्रीशची माता एवं अन्यान्य सबके सब हरिनाम कीर्तन कर रहे थे, तब भी शिशु निमाई का रोना रूक नहीं रहा था तो वे अत्यन्त विचलित हो गए तथा स्नेहासिक्त होकर निमाई को कहने लगे -- ('बच्चे तुइ कि चास्, कि दिले तोर क्रन्दन थाम्बे बल') ।
(अर्थात् बेटे ! तू चाहता क्या है, क्या चीज़ दूँ जो तू चुप हो जाए ?)

शिशु ने कहा -- 'आज एकादशी तिथि है तथा श्रीजगदीश पण्डित के घर में आज जो विष्णु नैवेद्य (भगवान का भोग) तैयार किया गया है वो 'मैं' खाना चाहता हूँ । उसको खाने से मेरा रोना बन्द हो जाएगा।'
सुन कर तो श्रीजगन्नाथ मिश्र विस्मित हो गए, आज एकादशी तिथि है, ये इस बच्चे को कैसे मालूम हुआ? व एकादशी में श्रीजगदीश पण्डित ने विष्णु के नैवेद्य तैयार किए हैं, इसे कैसे पता लगा?

तभी श्रीजगन्नाथ मिश्र जी श्रीजगदीश पण्डित जे घर गये। उनके घर में श्रीविष्णुअ के नैवेद्य का विपुल आयोजन देख कर श्रीजगन्नाथ मिश्र आश्चर्यान्वित हो गए। पुत्र के नैवेद्य ग्रहण की इच्छा एवं ग्रहण नहीं करने से उसका क्रन्दन रुकेगा नहीं……इत्यादि सब बात बतायी, निमाई श्रीविष्णु के लिए बनाया गया भोग (नैवेद्य) खाना चाहता है, ये पुत्र के पक्ष में अकल्याणकर हो सकता है, इस प्रकार के भय की बात भी श्रीजगन्नाथ मिश्र ने व्यक्त की।
नित्यपार्षद श्रीजगदीश पण्डित प्रभु ने अनुभव किया कि नन्दनन्दन श्रीगोपाल जी ने ही निमाई के रूप में इसे ग्रहण करने की इच्छा की है। उन्होंने कोई भी शंका व द्विधा न करके साथ-साथ श्रीजगन्नाथ मिश्र को समस्त नैवेद्य अर्पण कर दिए। सारे नैवेद्य लेकर श्रीजगन्नाथ मिश्र जी घर आये और सारे के सारे नैवेद्य उन्होंने निमाई के आगे रख दिये। भक्त के प्रदत्त नैवेद्य पाकर शिशु का क्रन्दन रुक गया।

निमाई परमानन्द के साथ उसको खाने लगे --

'जगदीश पण्डित आर हिरण्य महाशय।
यारे कृपा कैल बाल्ये प्रभु दयामय॥
एइ दुइ घरे प्रभु एकादशी दिने।
विष्णुर नैवेद्य मागि खाइल आपने।' (चै च आ 10/70-71)

(दयामय गौरहरि जी ने अपनी बाल्यलीला में ही जिन पर कृपा की -- वे हैं
श्रीजगदीश पण्डित और हिरण्य पण्डित महाशय, इन दोनों के घर में श्रीमहाप्रभु जी ने एकादशी ने दिन माँग कर श्रीविष्णु भगवान का नैवेद्य खाया था।)

श्रीचैतन्य भागवत आदि लीला के चतुर्थ अध्याय में ये लीला वर्णित है --

भक्तेर द्रव्य प्रभु काड़ि-काड़ि खाय ।
अभक्तेर द्रव्य पाने उलटि ना चाय ॥
(भक्त की वस्तु प्रभु छीन-छीन कर खाते हैं और अभक्त की वस्तु को मुड़कर देखना भी नहीं चाहते)

श्रील जगदीश पण्डित की जय !!!!

आपके आविर्भाव तिथि पूजा महामहोत्सव की जय !!!!!!!

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