शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

शुद्ध रसिक वैष्णव


(द्वारा: श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद)
 
श्री श्री राधा गोविन्द जी की श्रृंगार लीला का श्रवण और कीर्तन करना भक्ति का सर्वोत्तम अंग है और यह नित्य भजन (नित्य, अति उत्तम और अन्तरंग सेवा)  करने का अधिकार प्रदान करता है किन्तु ऐसी सर्वोत्तम भजन लीला का साधारण मनुष्यों के सामने कीर्तन करना अनुचित है और ऐसा करने से अपराध होता है | यदि हम रास-गान को, जो की रस तत्व की अत्यंत गोपनीय लीलाएं हैं, उनका व्यवसायिक गायकों के मुख से श्रवण करेंगे जो स्त्री संगी हैं और प्रतिष्ठा के अभिलाषी हैं, ऐसा करने से हम अपने पूर्व आचार्यों के उपदेशों का उल्लंघन करेंगे जिन्होंने उपदेश दिया है, "आपन भजन-कथा, न कहिबे  यथा-तथा  अर्थात अपने भजन की बातों को, अनुभूतियों को इधर उधर नहीं बताना चाहिए" (प्रेम भक्ति चन्द्रिका, भजन न. ९, श्लोक न. १९) और ऐसा करने से हम भयंकर अपराध कर बैठेंगे |
 
श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद
जब भी कहीं अलग-अलग स्थिति के साधक उपस्थित हों तो ऐसे स्थान पर हरिनाम कीर्तन करना और दास्य रस के व भगवान के प्रेमिक भक्तों की लीलाओं व उनके द्वारा की गई प्रार्थनाओं  का कीर्तन करना चाहिए | जब कभी सभा  में सब शुद्ध  वैष्णव  उपस्थित हों जो रस तत्व का आस्वादन करने के अधिकारी हैं वे भगवान के रास-गान   का श्रवण कर सकते हैं | उस समय वे भगवान की अन्तरंग लीला में अपने नित्य सिद्ध स्वरूप द्वारा सेवा करके उन गोपनीय लीलाओं का रसास्वादन कर उनका अनुभव प्राप्त कर सकते हैं |

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