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| श्रील भक्ति बिबुध बोधायन महाराज जी |
(द्वारा : श्रील बी.बी.बोधायन महाराज)
यहाँ प्रस्तुत पत्र श्रील भक्ति बिबुध बोधायन महाराज जी ने श्रील भक्ति वेदांत नारायण महाराज जी को सम्मान प्रदान करते हुए लिखा :
आज से हम सब एक शुद्ध वैष्णव, परम पूज्यपाद श्रील भक्ति वेदांत नारायण गोस्वामी महाराज जी के प्राकृतिक संग से वंचित हो गए जिन्होंने वृद्ध-अवस्था में भी निरंतर देश विदे शों में बद्ध जीवों का उद्धार करने के लिए यात्रा की|
जब भी मैं श्रील महाराज जी के पास उनके उपदेश प्राप्त करने जाता तो वे प्रसन्नतापूर्वक मेरे सभी प्रश्नों का उत्तर देते | मेरे प्रिय गुरुदेव परम दयालु श्रील भक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी महाराज जी ने २२ नवम्बर, १९९९ में नित्यलीला में प्रवेश किया और इसके बाद मैं नवद्वीप धाम में स्थित देवानंद गौड़ीय मठ में श्रील महाराज जी के उपदेश प्राप्त करने के लिए गया था|
उस समय श्रील महाराज जी ने प्रेमपूर्वक मुझे सहनशील रहने को कहा और भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के इस मिशन को मेरे गुरुदेव, श्रील भक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी महाराज जी के आश्रय में रहकर आगे बढ़ाने का उपदेश दिया |
आज तक मैं उनकी इस आज्ञा का पालन कर रहा हूँ जिसने मुझे वैष्णव समाज में सहनशील होने से क्या लाभ है इसका अनुभव करवाया और जिसके फलस्वरूप संभवत: मैं शांतिपूर्वक भक्ति मार्ग का अनुसरण कर सकता हूँ |
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| श्रील भक्ति वेदान्त नारायण महाराज जी |
२९ दिसम्बर के दिन जगन्नाथ पुरी धाम में श्रील नारायण महाराज जी प्राकृतिक रूप से इस नश्वर संसार से चले गए किन्तु यदि हम उनके उपदेशों का पालन करेंगे तो वे हमेशा हमारे साथ हैं | हमें उनके द्वारा दिए गए हरिकथा के सन्देश का पालन करना चाहिए और बहुमूल्य भक्तिमय ग्रंथों को पढ़ना चाहिए तभी हम षट-गोस्वामियों की शिक्षाओं को समझ सकते हैं और इस अनित्य संसार में मिल रहे कष्टों से मुक्त हो सकते हैं |
आज से श्रील महाराज जी की सेवा करने का हम सभी के पास केवल यही अवसर है की हम उनकी वाणी का अनुसरण करें | वास्तव में उनके उपदेशों का पालन करके ही हम उनका संग प्राप्त कर सकते हैं |
मैं दीनतापूर्वक श्रील नारायण गोस्वामी महाराज जी के पादपद्मों की कृपा प्रार्थना करता हूँ की वे कृपा करके मुझे शक्ति प्रदान करें जिससे मैं उनके उपदेशों का पालन कर सकूँ और शुद्ध रूप से अपने जीवन को गुरु परम्परा के आश्रय में रहकर महाप्रभु जी के इस मिशन को आगे बढ़ा सकूँ |
निताई गौर हरि बोल !


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