| श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी |
A: श्री भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी बताते हैं, ' एक बार गुरु महाराज जी पंजाब के कार्यकर्मों में व्यस्त थे । कुछ दिनों से गुरु महाराज जी का ‘सीता-राम मन्दिर’ मंदिर में प्रवचनों का कार्यक्रम चल रहा था । एक बुज़ुर्ग महिला प्रतिदिन कार्यक्रम में आती थी । एक दिन उन्होंने गुरूजी से प्रश्न किया, “मैं पचास वर्षों से प्रतिदिन मंदिर में आ रही हूँ । मैं मंदिर की परिक्रमा करती हूँ, कीर्तन सुनती हूँ और प्रतिदिन आरती में भी आती हूँ । जब कभी महात्मा लोग आते है तो हमेशा उनके प्रवचन सुनने आती हूँ । इतनी पूजा-पाठ करने के बाद भी मुझे इसका फल नही मिला । और तो और मेरा मेरे घरवालों के प्रति प्रेम और लगाव बढ़ता ही चला जा रहा है, क्यों?'
गुरूजी को यह प्रश्न अत्याधिक पसंद आया । गुरूजी ने वहाँ उपस्थित सभी लोगों को कहा, ‘यह बड़ा ही सुन्दर प्रश्न है और आप सब लोगों को भी इसका उत्तर जानना चाहिए । आप सब लोग भी यहाँ बहुत समय से रहे होंगे और आपकी स्थिति भी सामान्य होगी । आप सब लोग कृपया करके कल आइये और मैं आप सबको इस प्रश्न का उत्तर दूंगा ।'
दुसरे दिन गुरूजी ने उन माताजी से पूछा, “जब कभी महात्मा लोग आते है, तब कभी आपने उनसे जानने कि इच्छा की, “मैं कौन हू? 'सीता-राम जी कौन है?' 'मेरा सीता-राम जी से सम्बन्ध क्या है?”
माता जी ने कहा उन्होंने ऐसा प्रश्न कभी नही किया।
हमारे परम गुरुदेव, श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद जी हमेशा अपने शिष्यों को इस बात पर जोर देते थे,”हमेशा भजन सम्बन्ध-ज्ञान से करो । जब हमें यह ज्ञान और विश्वास होगा कि हम कौन है, यह संसार क्या है, भगवान श्री कृष्ण कौन हैं और उनसे हमारा क्या सम्बन्ध है तभी हमारी सम्बन्ध से अभिधये व अभिधये से प्रयोजन का मार्ग प्रशस्त होगा। इसलिए, अगर आप भजन ये सोच कर रहे है,”मैं इस संसार का हूँ, मैं अपने बेटे, पत्नी, पिता का हूँ, तब उस साधना का फल आपकी सांसारिक आसक्तियों को बड़ायेगा । अगर हम भजन में तरक्की करना चाहते है तो हमे अपनी साधना सम्बन्ध ज्ञान सहित करनी होगी । हमें यह सम्बन्ध ज्ञान होना चाहिये कि “मैं भगवान श्री कृष्ण का हूँ, यह संसार उन की बहिरंगा शक्ति के अधीन है, श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान हैं। वे सभी को आकर्षित करते हैं व मोहित करते हैं मैं उनका नित्य दास हूँ।'
आप बहुत भजन कर सकते हैं, प्रतिदिन आरती में आ सकते हैं, कीर्तन कर सकते हैं, मन्दिर की परिक्रमा कर सकते हैं, हरिकथा सुन सकते हैं, इत्यादि किन्तु यदि आप यह सोचते हैं कि आप संसार के हैं तो यह सारी गतिविधियां आपके अहं की पुष्टि करेंगी।
अगर हम भजन में आगे बढ़ना चाहते है तो प्रतिदिन सुबह उठ कर और रात को सोते समय हमे श्री चैतन्य महाप्रभु जी की शिक्षा को याद करना जो उन्होंने श्रील सनातन गोस्वामी को दीं - हम सब भगवान् श्री कृष्ण के है । हमें उन्हें सदा स्मरण करना चाहिये व कभी भूलना नहीं चाहिये। श्रीहरि कीर्तन करते रहना चाहिये । अपनी सारी इन्द्रियों, शरीर और मन को श्री कृष्ण की सेवा में लगाना चाहिए । यह बात हमेशा हमारी सोच में होनी चाहिये ।
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