गुरुवार, 25 अगस्त 2011

जो बोओगे, वही काटोगे

जो बोओगे, वही काटोगे
(द्वारा: श्रीश्रीमद्भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज)
 
एक समय की बात है, एक राजा था जिसका प्रधानमंत्री एक महान भक्त था | वह हमेशा अन्यों को सान्त्वना प्रदान करता और जो व्यक्ति अपनी सांसारिक समस्याएं लेकर उसके पास आता वह उन्हें निश्चिन्त करने के लिये कहा करता, " आपको चिंतित या निराश नहीं  होना चाहिये ।  आप नहीं जानते कि आपने अपने पिछले जन्मों में क्या किया था और न ही यह जानते हो कि भविष्य में  क्या करोगे, इसलिए अपनी वर्तमान हानि को देखकर आपको निराश नहीं होने चाहिये | हो सकता है आपके साथ इससे भी बुरा होना था किन्तु श्री कृष्ण कि कृपा से वह कम हो गया | यह सब मंगल के लिए हो रहा है, निराश मत होओ |"
 
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
    एक बार राजा अपने प्रधानमंत्री और अन्य सैनिकों के साथ जंगल में शिकार करने गया | प्राचीन समय में क्षत्रिय जंगल में शिकार के  लिए जाया करते थे | जंगल में घूमते समय राजा और प्रधानमंत्री सैनिकों से अलग हो गए | जब राजा और मंत्री जंगल में  भटक रहे थे तब राजा ने एक जानवर को देखा। राजा ने उसे मारने के लिए बाणअ चलाया। वह बाण राजा के अंगूठे से पार हो गया और उसकी उंगली कटने से अत्यधिक खून बहने लगा | अत्यंत दर्द के कारण वह अपना दुःख व्यक्त करते हुए कहना लगा, "मुझे हमेशा युद्ध करना होता है, मेरा अंगूठा धनुर्विद्या के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो अब कट गया है, यह एक बहुत बड़ा नुकसान है |" मंत्री ने राजा को सान्त्वना प्रदान करते हुए कहा, "आप यह नहीं जानते कि पिछले जन्म में आपने क्या किया और भविष्य में आप क्या करेंगे, इससे भी बड़ी समस्या हो सकती थी किन्तु श्री कृष्ण कि कृपा से वह कम हो गयी | इसलिए आपको चिंता नहीं करनी चाहिए |"
 
   राजा इससे क्रुद्ध हो गया व बोला, " मेरी उंगली कट गयी है और इससे अत्यधिक खून बह रहा है | यह मेरे लिए एक बड़ा नुकसान है किन्तु तुम कह रहे हो कि भगवान कि कृपा से जो हुआ मेरे मंगल के लिए हुआ | तुम मुझे परामर्श दे सकते हो लेकिन यदि तुम्हे पीड़ा कि अनुभूति हो और मैं तुम्हे इसी प्रकार राय दूँ तो तुम क्या सोचोगे ? मंत्री ने कहा, "यह बात सबके लिए उचित है | श्री कृष्ण सबका ध्यान रखते हैं | एक बड़ा नुकसान होने से बच गया |" राजा क्रोध में था और उसने सोचा, "मैं इसे अवश्य ही सबक सिखाऊंगा |"
 
राजा मंत्री के साथ जंगल में चलता रहा । कुछ दूर जाने पर उसने झाड़ियों और घास से ढका एक कुआँ देखा | मंत्री को लेकर राजा कुएं के पास गया और अचानक से उसने मंत्री को कुएं में धक्का दे दिया | राजा बोला, "भगवान कि कृपा से जो भी हुआ तुम्हारे मंगल के लिए हुआ |"
 
मंत्री ने कहा, " भगवान कि इच्छा के बिना आप किसी को कुएं में धक्का नहीं दे सकते | यह भगवान कि ही इच्छा थी कि आपने मुझे धक्का दिया | मेरा विश्वास करो ! क्योंकि भगवान मंगलमय हैं और वे जो करते हैं मंगल के लिए करते हैं |"
 
   राजा ने चुनौती दी, "कहाँ है तुम्हारे भगवान ? मैं यहाँ हूँ और तुम वहाँ ? कहाँ हैं तुम्हारे भगवान और यदि मैं इस स्थान से चला जाऊं तो क्या वह तुम्हे बचायेगा ?"
 
   मंत्री ने कुएं से उत्तर दिया, " यदि श्री हरि किसी कि रक्षा करते हैं तो उसे कोई नहीं मार सकता और यदि हरि किसी को मारना चाहते हैं तो कोई उसकी रक्षा नहीं कर सकता | किसी में इतनी शक्ति नहीं है |"
 
  राजा ने कहा, "ओह ! तुमने अपनी कुत्ते जैसी मानसिकता को नहीं छोड़ा इसलिए तुम यहीं रहो और यहाँ मरो |" 
 
जब एक व्यक्ति क्रुद्ध होता है तो उसका चित्त स्थिर नहीं रहता है और उस समय राजा का चित्त स्थिर नहीं था |
 
  उस जंगल में बहुत से लुटेरे रहते थे जो अपनी डकैती कि पूर्ती के लिए देवी काली कि पूजा करते थे | अभी हाल ही में वह एक डकैती में सफल हुए और इसलिए वह देवी काली कि संतुष्टि के लिए एक व्यक्ति कि बलि देना चाहते थे | वे एक पुजारी को लेकर आए और उसे पूजा करने को कहा और वे बलि देने के लिए व्यक्ति को ढूँढने निकले | उन्हें जल्द ही राजा मिल गया और उन्होंने सोचा, "माँ काली कितनी दयालू हैं ! उन्होंने स्वयं ही इस व्यक्ति को हमारे पास भेज दिया और हमें किसी गाँव या शहर में किसी को खोजने के लिए भी नहीं जाना पड़ा |"
 
   लुटेरों ने राजा को घेर लिए, उसे पकड़कर बाँध दिया | फिर वे उसे बलि देने के लिए पुजारी के पास ले गए | धार्मिक नियमों के अनुसार बलि चढाने से पूर्व  स्नान करवाकर पुजारी के पास लेकर आए | जैसे ही पुजारी राजा कि बलि देने वाला था उसने देखा कि राजा का अंगूठा भयंकर रूप से क्षतिग्रस्त है और उससे खून बह रहा है | यदि किसी क्षतिग्रस्त व्यक्ति कि बलि दी जाए तो उसका विपरीत परिणाम होता है इसलिए पुजारी ने लुटेरों से कहा, "यदि इस व्यक्ति कि बलि दोगे तो इसका परिणाम बुरा होगा क्योंकि यह क्षतिग्रस्त है |"
 
   लुटेरे ज़ोर से चिल्लाए, "ओह, नहीं ! इससे हमारे सभी प्रयास और धन नष्ट हो जाएगा | छोड़ दो इस व्यक्ति को ।"
 
जब राजा अंततः अपने राज्य की ओर आ रहा था तो उसे एहसास हुआ कि मंत्री ने जो कहा था वह सही था | "यदि मेरा अंगूठा क्षतिग्रस्त न हुआ होता तो आज मेरे जीवन का अंत हो गया होता | मैंने अपने मंत्री के प्रति बहुत बड़ा अपराध किया है | अब मैं नहीं जानता कि वह जीवित भी है या नहीं ! मैंने क्रोध में आकर निकृष्ट कार्य किया है !" राजा ने तुरंत अपने सैनिकों की सेना को जाने का आदेश दिया और मंत्री को बचाने को बोला |
 
    जब सैनिक कुएं के निकट पहुंचे तो उन्होंने देखा की मंत्री घास पर बैठकर श्रीहरिनाम कर रहा है | भगवान की कृपा से उसे ज़्यादा कष्ट नहीं पहुंचा | जब उसे राज्य में वापिस लेकर आए तो राजा  मंत्री के आगे झुक गया और सारा वृतांत सुनाते हुए कहने लगा,  "मैंने बहुत बड़ा अपराध किया है, कृपया मुझे क्षमा करें |"
 
  "नहीं ! नहीं ! यह ठीक है | आपने भगवान कि इच्छानुसार कार्य किया जिसके कारण मुझे ही फायदा हुआ | मुझे कुएं में धकेलकर वास्तव में आपने मेरी जान बचाई | यदि मैं आपके साथ होता तो वह लुटेरे आपकी जगह मेरी बलि दे देते | हम नहीं जानते कि पूर्व जन्म में हमने क्या किया और भविष्य में हम क्या करेंगे | इसलिए हम सामंजस्य नहीं देख सकते |"
 
    जो भी हुआ भगवान की इच्छा से हुआ और सबके मंगल के लिए हुआ | ' तत्ते अनुकम्पां.....मानो' ( श्रीमद भागवतम १०.१४.८ ) यदि तुम हरेक परिस्थिति में भगवान की कृपा का अनुभव कर सकते हो तभी तुम भगवान को प्राप्त कर सकते हो | यदि तुम  चिंतित हो तो भगवान को प्राप्त नहीं कर सकते |
 
 
    हम अपने कर्मानुसार फल प्राप्त कर रहे हैं इसलिए हमें अपने दुखों के लिए किसी को भी दोषारोपण नहीं करना चाहिए | हम सब अपने कर्मो का फल प्राप्त कर रहे हैं | जैसा बोओगे, वैसा पाओगे | 
 
 

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