यशोदानन्दन श्रीकृष्ण एक दिन चुपचाप गौशाला में एक दिन जा पहुँचे। हाथ में सोने का छोटा सा लोटा था, इस सोच के साथ कि आज दूध दुहूँगा।
इतना छुपते-छुपाते पहुँचे वहाँ कि उनके श्रीचरणों के नुपूर की आवाज़ भी नहीं हो रही थी।
गौशाला में एक किनारे खड़े सब ओर देखने लगे।
उन्होंने देखा, बहुत सी गाय हैं, बहुत से ग्वाले दूध दुह रहे हैं। कई बछ्ड़े दूध पी रहे हैं। एक छोटी सी बछ्ड़ी एक ओर किनारे पर सभी से कुछ दूरी पर खड़ी है।
नन्हें कृष्ण जी ने सोचा कि छोटी है, मैं भी छोटा हूँ! इसी का दूध दुह लेता हूँ। यह सोचकर एक ग्वाले के पास गये व बोले- ये किनारे पर क्यों खड़ी है?
ग्वाले ने कहा- अभी छोटी है। कोई बछड़ा नहीं है इसका। अभी दूध नहीं दे सकती।
श्रीकृष्ण तो भेद-भाव करना जानते ही नहीं, उस बछड़ी की ओर चल दिए।
उधर श्रीकृष्ण ने जब गौशाला में प्रवेश किया था, गौवें स्थिर सी हो गईं थी, उनकी हलचल बन्द हो गयी थी। बछड़े भी शान्त हो गये थे। सबका ध्यान प्रवेश द्वार की ओर था। श्रीनन्द जी महाराज समझ गये कि उनका लाला फिर से गौशाला में आ गया है।
उनके लाला को ये पता न चले कि उसकी चोरी पकड़ी गई है, यह सोचकर श्रीनन्द राय जी गाय कि ओट लेकर चुपके से खड़े हुए और अपने लाला को ढूँढने लगे।
उन्होंने देखा कि उनका लाला धीरे-धीरे वो दूर खड़ी बछड़ी की ओर जा रहा है। वे खड़े होकर देखने लगे कि उनका लाला अब क्या करता है/
श्रीकृष्ण ने देखा कि गाय के थनों के नीचे ग्वालों ने बाल्टियाँ रखी हैं और दूध दुहने से दूध की धार उन बाल्टियों में गिर रही है। ये देखकर नन्हें श्रीकृष्ण ने अपना लोटा भी बछड़ी के थनों के नीचे रख दिया। फिर ये भी देखा कि कुछ बछड़ों ने अपने मुखों में गाय का थन लिया हुआ है। अतः यह भी समझ गये कि थनों से दूध तभी आयेगा जब थन को मुख में लूँगा।
अपने स्वामी की इच्छा को देखकर भगवान की शक्ति योगमाया जी ने शक्ति संचार की। उधर श्रीकृष्ण ने बछड़ी के एक थन को मुख में ले लिया।
वृजराज श्रीनन्द राय जी दूर से देख रहे हैं कि ये क्या हो रहा है?
उनकी हैरान होती आँखों ने देखा कि उस बछड़ी ने अपने पैर फैलाये, कुक्षी नीचे की, मूत्र त्यागा और उसका आयान फैलने लगा। उसके थन मोटे होने लगे। श्रीनन्द राय जी बहुत हैरानी से ये अद्भुत घटना को देख रहे थे ये कैसे हो सकता है?
देखते ही देखते उस बछड़ी के मोटे होते थनों से दूध झरने नहीं लगा बल्कि बहने लगा। मोटी-मोटी धारायें गिरने लगीं। एक थन तो श्रीश्यामसुन्दर जी के मुख में था। बाकी तीने थनों का दूध उस छोटे से लोटे में गिरने लगा, बाहर नहीं गिरा।
ऐसे अद्भुत हमारे श्रीकृष्ण!
श्रीनन्द राय जी समझ गये कि लाला को अब दूध दुहने की आज्ञा देनी ही पड़ेगी।
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