सोमवार, 6 जून 2016

एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की निन्दा करने में इतनी रुचि क्यों लेता है?

व्यक्ति किसी की निन्दा करता क्यों है?

उसके बहुत से कारण हैं।

मुख्य कारण यह है कि किसी की निन्दा करने से अपने अहंकार को सन्तुष्टि मिलती है, Ego satisfy  होती है। जब हम किसी की निन्दा करते हैं, या निन्दा सुनते हैं, हमारे अंहकार को सन्तुष्टि होती है कि मैं ऐसा नहीं हूँ, 'I am superior than him or her.'

'मैं उससे श्रेष्ठ हूँ' -- इस Ego की सन्तुष्टि के लिये ही व्यक्ति निन्दा सुनता है और करता है।
किसी स्थान पर भगवान की कथा, हरिकथा का कार्यक्रम चल रहा हो। वहाँ जाकर, व्यक्ति बार-बार घड़ी देखता है कि कितना समय हो गया, कितना समय और है? लेकिन अगर हम पाँच-सात लोग बैठ कर किसी की छिल उतारने में लग जायें, किसी का मज़ाक करने में लग जायें, किसी की खिल्ली उड़ाने में लग जायें, वहाँ घन्टों बीत जाते हैं, क्योंकि वहाँ अपने अंहकार की तुष्टि हो रही होती है। 'Ego satisfy' हो रही होती है।

अब इससे कुछ समय के लिये 'Ego satisfaction' तो अवश्य होगी किन्तु
इसका परिणाम बहुत बुरा होगा। हमारी 'Ego satisfaction' हो रही है, हमारे अहं की तुष्टि हो रही है लेकिन जिनके वो भक्त हैं, उनको कैसा लग रहा है?

जिनकी मैं भक्ति कर रहा हूँ, जिन्होंने मुझे भवसागर से पार ले जाना है, जिन्होंने मुझे गोलोक धाम में सेवा देनी है, उनको कैसा लग रहा है?

इस भावना पर अवश्य विचार करना चाहिये।
वर्तमान समय के विश्व के श्रेष्ठतम् वैष्ण्व व अनुभूति में भी श्रेष्ठ श्रीकृष्ण भक्त परमाराध्य श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराजजी कहते हैं, अगर किसी की कोई निन्दा करना है तो जिस मुख से निन्दा की उसी मुख से उस व्यक्ति की वन्दना करे तो ही वो इस पाप से मुक्त होगा। किसी ने अगर किसी भक्त की निन्दा करी, तो उसकी दोबारा तारीफ करने से नहीं हो जायेगा।  अगर आपने किसी भक्त की जान से या अनजान से निन्दा कर ली है तो पहले आपके दिल में दुःख होना चाहिये, -- ओह! मैं भगवान की प्रसन्नता के लिये इतना कुछ कर रहा हूँ, उनके लिये रसोई बनाता हूँ, ग्रन्थ प्रचार कर रहा हूँ, ठाकुरजी के वस्त्र सिलता हूँ, और मैं उन्हीं के भक्त की निन्दा कर रहा हूँ। ये मैं क्या कर रहा हूँ? भगवान मुझसे कैसे प्रसन्न होंगे? यह प्रायश्चित होना चाहिये कि मुझसे गलति हो गयी है। दोबारा मैं ऐसी गलति नहीं करूँगा, ऐसा संकल्प मन में होना चाहिये। अनुतप्त होकर अपने अपराध को स्वीकार कर, जिस भक्त की निन्दा करी है उस भक्त की महिमा बोलनी चाहिये। भगवद् भक्तों की महिमा बोलनी होगी।

जैसे किसी ने अगर ज़हर खा लिया हो, तो अमृत खा लेने से पहले ज़हर की क्रिया खत्म होगी, फिर शरीर तुष्ट होने लगेगा।

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