दुनियावी वस्तु को हम पकड़ सकते हैं। स्थूल पदार्थ को हाथ से पकड़ा जा सकता है। परन्तु सूक्ष्म को तो पकड़ा नहीं जा सकता। इसका मतलब यह तो नहीं की सूक्ष्म वस्तु का कोई अस्तित्व ही नहीं है।
शरीर के किसी भाग में एक सुई लगाने से, शरीर में कष्ट होगा, व्यक्ति चिल्लायेगा। परन्तु मर जाने के बाद उसे तोड़ने से, जलाने से कुछ भी कष्ट नहीं होता। जब तक शरीर में अनुभव-शक्ति, ज्ञान-शक्ति, चित्त-
शक्ति रहती है, तब तक हवा करने से आराम का अनुभव होता है, सुख-दुःख का एहसास होता है।
जब ज्ञान, बोध-सत्ता नहीं रहती, उस समय इसे जलाने से भी कुछ नहीं होता।
उस ज्ञान, चेतन, बोध सत्ता को आत्मा कहते हैं। जब तक consciousness / बोध सत्ता है, तब तक मैं हूँ। जब वह सत्ता नहीं होगी तो मैं भी नहीं होऊँगा। हालांकि हमने आत्मा को नहीं देखा, हाथों से छुआ नहीं किन्तु उसके अस्तित्त्व को मानना पड़ता है। consciousness / बोध सत्ता
ही आत्मा है।
धूएं को देखकर आग का अनुमान होता है, उसी प्रकार क्रिया से उसके कारण का अनुभव होता है।
आत्मा का कारण परमात्मा है।
नारायण शब्द का अर्थ होता है -- चेतन प्राणियों के समूह का आश्रय।
सभी प्राणियों के आश्रय हैं, श्रीनारायण।
अखिल ज्ञान-प्रमाणुओं के कारण हैं, श्रीनारायण।
नारायण को ही पूर्ण ज्ञान व कारण ज्ञान कहते हैं।
इसीलिये मेरे समेत सभी प्राणियों के कारण भगवान हैं। यद्यपि भगवान
को हम आंखों से देख नहीं पाते तो भी विचार से समझा जा सकता है। विचार करने पर भगवान को मानना ही पड़ेगा। यदि कोई भगवान को नहीं मानता उससे भगवान को कोई नुक्सान नहीं होता। नुक्सान तो अपना ही है। आग को आग नहीं मानने से आग की कोई हानि नहीं होती, उससे आग का लाभ हम नहीं पाते।
भगवान को नहीं मानने से भगवान की कृपा का अभाव रहता है। इसलिये भगवान को मानना हर एक प्राणी का कर्तव्य है, हर एक का स्वार्थ है, हर एक का प्रयोजन है।
-- परमपूज्यपाद श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी 'विष्णुपाद' के प्रवचनों से
(संस्थापक - अखिल भारतीय श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ)।
शरीर के किसी भाग में एक सुई लगाने से, शरीर में कष्ट होगा, व्यक्ति चिल्लायेगा। परन्तु मर जाने के बाद उसे तोड़ने से, जलाने से कुछ भी कष्ट नहीं होता। जब तक शरीर में अनुभव-शक्ति, ज्ञान-शक्ति, चित्त-
शक्ति रहती है, तब तक हवा करने से आराम का अनुभव होता है, सुख-दुःख का एहसास होता है।
जब ज्ञान, बोध-सत्ता नहीं रहती, उस समय इसे जलाने से भी कुछ नहीं होता।
उस ज्ञान, चेतन, बोध सत्ता को आत्मा कहते हैं। जब तक consciousness / बोध सत्ता है, तब तक मैं हूँ। जब वह सत्ता नहीं होगी तो मैं भी नहीं होऊँगा। हालांकि हमने आत्मा को नहीं देखा, हाथों से छुआ नहीं किन्तु उसके अस्तित्त्व को मानना पड़ता है। consciousness / बोध सत्ता
ही आत्मा है।
धूएं को देखकर आग का अनुमान होता है, उसी प्रकार क्रिया से उसके कारण का अनुभव होता है।
आत्मा का कारण परमात्मा है।
नारायण शब्द का अर्थ होता है -- चेतन प्राणियों के समूह का आश्रय।
सभी प्राणियों के आश्रय हैं, श्रीनारायण।
अखिल ज्ञान-प्रमाणुओं के कारण हैं, श्रीनारायण।
नारायण को ही पूर्ण ज्ञान व कारण ज्ञान कहते हैं।
इसीलिये मेरे समेत सभी प्राणियों के कारण भगवान हैं। यद्यपि भगवान
को हम आंखों से देख नहीं पाते तो भी विचार से समझा जा सकता है। विचार करने पर भगवान को मानना ही पड़ेगा। यदि कोई भगवान को नहीं मानता उससे भगवान को कोई नुक्सान नहीं होता। नुक्सान तो अपना ही है। आग को आग नहीं मानने से आग की कोई हानि नहीं होती, उससे आग का लाभ हम नहीं पाते।
भगवान को नहीं मानने से भगवान की कृपा का अभाव रहता है। इसलिये भगवान को मानना हर एक प्राणी का कर्तव्य है, हर एक का स्वार्थ है, हर एक का प्रयोजन है।
-- परमपूज्यपाद श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी 'विष्णुपाद' के प्रवचनों से
(संस्थापक - अखिल भारतीय श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ)।







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