रविवार, 13 नवंबर 2011

श्रीमन्महाप्रभुजी तथा श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी की धारा

श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद  जी ने विश्व वैष्णव राजसभा के इतिहास पर  सुंदर विवरण दिया है | उनके तथा सभी पाठको के पाद-पद्मों की धूल मस्तक में धारण करते हुए उसी विवरण को पुनः संग्रहित करता हूँ | वैष्णव मिशन विश्व भर में फैल रहा है | श्री चैतन्य महाप्रभु की भविष्यवाणी कि एक समय ऐसा आयेगा ---  हर शहर और हर गाँव में पवित्र हरिनाम सुनाई देगा, महाप्रभुजी की ये भविष्यवाणी दिन प्रतिदिन पूरी  होती दिखाई दे रही है | आज कल आप हर जगह अमेज़न नदी से आर्क्टिक क्षेत्र  तक  पवित्र नाम लेते और वैष्णव के दिव्य शास्त्रों को पढ़ते हुए भक्त पा सकते हैं| विशेष रूप से इन्टरनेट ने अलग अलग मिशन के अलग अलग भाषाओं पर एक वैष्णव होम पेज बना दिया है जो हर जगह उपलब्ध है |
 
श्रील भक्ति वेदान्त स्वामी महाराज
इतने विस्तृत कार्य में नि:संदेह कुछ कठिनाइयाँ भी होगीं | श्रील प्रभुपाद जी, जिन्होंने श्रीकृष्ण के सन्देश को हर एक को देने का बीड़ा उठाया, अपने व्यावहारिक उदाहरण से स्पष्ट कर दिया है कि असम्भव शब्द भक्तों की गतिविधियों पर प्रयुक्त नहीं होता | यही नहीं श्रील बी.आर श्री धर महाराज जी के शब्दों में, श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी ने जो रणनीति बनाई थी उसे श्रील भक्ति सिद्वान्त सरस्वती गोस्वामी   प्रभुपाद  जी ने शुरू किया और किसी की कल्पना से बाहर श्रील  ए.सी भक्ति वेदांत स्वामी प्रभुपाद ने  इसे पूरा किया | उन्होंने सारी दुनिया के लिये वृन्दावन का मार्ग प्रशस्त किया | आज आप को  हर जगह वैष्णव सिद्धांत से परिचित व्यक्ति मिल जायेंगे | उन्होंने पश्चिम में जन्मे हुए वैष्णवों को भारत में लाने के लिए भारत के अग्रणी समुदाय की धर्म परायण इच्छा को पुन: प्रज्वलित किया है | वे लोग जिन्होंने लगभग अपनी स्वयं की परम्परा को छोड़ दिया था और जिनका प्रयोजन भारत की उत्पादन शक्ति तथा भौतिक क्षमता से उद्योग जगत में प्रवेश करना था वो भी यह एहसास करने लगें हैं कि भारत पास जो खजाना है वह इस साधारण आर्थिक विकास से कई अधिक मूल्यवान है | नि:संदेह पश्चिम के प्रभाव ने भारत का  पहले से काफी नुक्सान किया है | अब भारत के बुद्धिजीविओं को यह ज्ञान हो गया है की भारतीय धर्म, शाकाहार, और परिवार के सरक्षण की परम्परा को खोने के कारण हानिकारक प्रभाव होंगे |
 
श्री चैतन्य महाप्रभु जी ने  दिव्य प्रेम के सन्देश को सारी दुनियां में पहुँचाया। उन्होंने बिना किसी भेद -भाव के चाहे कोई ब्राह्मण, मलेच्छ या यवन कुल इत्यादि मे जन्मा है सब  के लिए द्वार खोल कर वैष्णव प्रेम के वास्तविक अर्थ को प्रकट किया है | उन्होंने सभी को वो  सर्वोच्च सेवा प्रदान की है, जिसे कोई भी जीव अपने आप को कृष्ण नाम में समर्पित कर के पा सकता हैं | श्री कृष्ण का  पवित्र नाम ही किसी बद्व जीव को दिव्य प्रेम के  स्तर पर ला सकता हैं | उन्होंने अपनी इस उदारलीला में विशेष कृपा की है जबकि मध्वाचार्य और रामानुजचार्य के सम्प्रदाय में निम्न जाति के लोगो के लिए सक्रिय  भागीदारी पर प्रतिबन्ध था | परम वैष्णव नरोत्तम दास ठाकुर तथा मेरे अध्यात्मिक गुरु श्रील ए. सी भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपादजी, श्रीमन्महाप्रभुजी की इस उदार लीला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं |
 
महाप्रभुजी की योजना का प्रभाव सारे विश्व में फैल रहा है | कुछ मिशन हो सकता अपने संस्थापक के चले जाने के बाद इस विशिष्टता को खो दें या कुछ त्यागी प्रचारक महाप्रभुजी के ध्वज को उठाये रखने में  विफल हो जाएँ । यहाँ तक कि जिन्होंने अध्यात्मिक नेतृत्व की जिम्मेवारी ली है, वे अन्य वैष्णवों के चरणों में अपराध करने के कारण पतित हो जाएँ । शक्तिशाली मन्दिरों की जगह  खण्डहर बन जाएँ और शास्त्रों विलुप्त हों जायें परन्तु यह निश्चित है कि श्रीमहाप्रभुजी और श्रीभक्तिविनोद ठाकुर जी की यह धारा कभी भी बंद नहीं होगी | वे लोग जो महाप्रभुजी के  सर्वोच्च प्रेम को प्राप्त कर चुके हैं उन सब का परम कर्त्तव्य है कि वे महाप्रभुजी के बीड़े को लगतार आगे बड़ाते जायें।
 
विश्व वैष्णव राज सभा के पूर्व आचार्यों के दृष्टिकोण को वर्ल्ड वैष्णव ऐसोसिशन ने  पुन:प्रज्वलित किया है|  
 
श्रीलभक्ति सिद्वान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद जी के अप्रकट होने के बाद लगभग ७० वर्षो तक विश्ववैष्णव राज सभा लगभग लुप्त हो गई थी जैसे-तैसे बहुत प्रयत्न करके उनके शिष्यों ने  भारत में तथा विश्व के कई भागों में वैष्णव मिशन की स्थापना की जो कि चिर-परिचित इतिहास बन चुका है । इसके बारे में जो और अधिक जानकारी चाहते हैं वो मेरी किताब Our Family the Gaudiya Math. से एकत्रित कर सकते हैं |

 
श्रील भक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी महाराज
१७ प्रमुख मिशनों के प्रमुख सदस्यों के साथ श्रीलभक्ति सिद्वान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद जी के सर्वोतम शिष्य श्री भक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी महाराज जी जो शुरू से गौड़ीय मठ के श्री विग्रह प्रतिष्ठा तथा प्रकाशन के प्रधान रहे हैं । विश्व वैष्णव राज सभा का आधुनिक नाम वर्ल्ड वैष्णव एसोसिएशन है। ( पश्चिमी तथा पूर्व के भक्तों के विशेष निवेदन पर ) श्रील भक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी महाराज जी ने इसके  प्रधानाचार्य  पद को स्वीकार किया | 

वर्ल्ड वैष्णव एसोसिएशन ने नए युग मे प्रवेश किया है । श्रील भक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी जी ने इस की सभा के लिए सभी को अपने मठ मे आमंत्रित किया | इसी प्रकार बाकि मिशनों जिसे श्री चैतन्य गौड़ीय मठ, श्री कृष्ण चैतन्य मिशन, वृन्दा इंस्टिट्यूट, गोलोक धाम एण्ड प्रभुपाद इंस्टिट्यूट फॉर कल्चर, आदि संस्थायों ने भी ऐसा ही किया |

श्रील नयनानन्द दास बाबाजी महाराज
 श्री भक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी महाराज जी के १०२ वर्ष की आयु में नित्यलीला में प्रवेश करने के बाद श्रीलभक्ति सिद्वान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद जी के एक और महान शिष्य श्री नयनानंद  बाबा जी महाराज जी ने इस पद को स्वीकार किया । जिन्होंने मायापुर चाम्पाहाटा में पूरा जीवन श्रीगौर-गदाधरजी की सेवा की तथा जो मोदी भवन, वृन्दावन के माध्यम के द्वारा शुरू से ही WVA से जुड़े हैं।   सौभाग्य से भारत में भी वैष्णव मिशन अपनी web domains खोल रहे हैं और इन्टरनेट के माध्यम के द्वारा सारी दुनिया से संपर्क करना शुरू कर दिया है जो भविष्य की योजना के लिए बहुत लाभप्रद होगा | जैसे की आप देखेते है बंगाल के गाँव-गाँव तक पहुँचना बहुत कठिन है और मुख्य उत्सवों जैसे गौर पूर्णिमा, नियम सेवा मास में  WVA  की वार्षिक बैठकों का आयोजन करना भी  कठिन कार्य है | शुरू में कई मिशन जिन्हें शक था कि WVA फिर से लुप्त हो जाएगी, इसके साथ जुड़ने लगे हैं।
 
कार्तिक २००२ में श्री नयनानंद  बाबा जी महाराज ने WVA कि सभा में आकर बड़ी विनम्रता पूर्वक अपनी शारीरिक अक्षमता के कारण इस पद  की जिम्मेदारी से मुक्त होने की प्रार्थना की | वहां पर एकत्रित संन्यासियो और अलग अलग मिशनों के सचिवों ने  WVA के उपाध्यक्ष श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज जी को WVA के इस अध्यक्ष पद के लिए प्रार्थना की |

 

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

श्री चैतन्य गौड़ीय मठ के प्रधानाचार्य श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी, जो कि श्रील भक्ति  सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद जी कि अन्तर्धान लीला के पश्चात् श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी तथा श्री भक्ति विलास तीर्थ महाराज जी के साथ कई वर्षो तक रहे और अब कई वर्षो से श्री चैतन्य गौडीय मठ के प्रधानाचार्य हैं ने अपने उदार दृष्टिकोण के कारण इस पद को स्वीकार किया तथा पूर्व तथा पश्चिम देशों के शिष्यों का विश्वास अर्जित किया है |
 
एक ऐसा वैष्णव मंच जो किसी भी मिशन के व्यक्तिगत समस्यायों से परे हो, अपने आप में एक महत्पूर्ण साधन है जोकी विश्व के सभी लोगों को भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी के द्वारा प्रचारित सार्वजनिक प्रेम की शिक्षाओं को मूल रूप में प्रदान कर सकता है ।  श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी ने दुनिया के लोगों को बंगाली लोक परंपरा को बताने के लिए आमंत्रित नही किया । वे तो भगवान के शरणागत भक्त थे और उनकी यही चाह थी कि दुनिया के अधिक से अधिक लोग अपने आत्म-कल्याण के लिये इस युग के युग-धर्म को अपनायें । 
 
व्यक्तिगत रूप से मैं  अपने को बड़ा भाग्यशाली समझता हूँ जिसे कई वर्षों से WVA  की गतिविधियों मे भाग लेने का मौका मिला तथा इसी माध्यम से मैं  बहुत सारे वैष्णवों को मिला, जिन्हें वैसे मिलना बहुत मुश्किल था ।
 
जितना जितना हमें यह अनुभव होगा कि हम सभी का लक्ष्य एक ही है, उतनी उतनी हमारी आपसी मित्रता की जड़ें गहरी होंगी |
 
श्रील जीव गोस्वामी प्रभुपाद की जय !
 

श्रील भक्त्यालोक परमाद्वैति महाराज


(द्वारा : श्रील भक्त्यालोक परमाद्वैति महाराज)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें