रविवार, 30 अक्टूबर 2011

महाप्रभु की मुद्रा

श्री कृष्णचैतन्य महाप्रभु इस जगत के सर्वोच्च कल्याण की इच्छा से इस जगत मे अवतीर्ण हुए | श्री कृष्ण ने व्रज में विचार किया 
 
चिरकाल नाहि करि प्रेमभक्ति दान |
भक्ति बिना जगतेर नाहि अवस्थान || (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि, 3,14)

मैंने चिरकाल से प्रेम भक्ति का दान नहीं दिया किया और भक्ति के बिना इस भौतिक जगत का कोई उपयोग नहीं है |

सकल जगते मोरे करे विधि-भक्ति |
विधिभक्तये ब्रजभाव पाइते नाहि शक्ति ||  (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,15)
समस्त जगत मेरी विधि भक्ति करता है | परन्तु विधि -भक्ति में व्रज भाव को प्राप्त करने की शक्ति नहीं है |
 

एश्वर्य ज्ञानेते सब जगत मिश्रित |
एश्वर्य-शिथिल-प्रेमे नाहि मोर प्रीत ||  (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,16)

सम्पूर्ण जगत के लोग मेरे ऐश्वर्य को जानकर, ईश्वर बुद्धि से मेरी आराधना करते है किन्तु ऐसी भक्ति मुझे अपनी ओर आकर्षित नहीं करती । 
 
एश्वर्यज्ञाने विधि-भजन करिया |
वैकुण्ठके याय चतुर्विध मुक्ति पाञा ||  (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,17)

एश्वर्यज्ञान से विधि भक्ति का  भजन करके साधक चार प्रकार की मुक्ति को पाकर वैकुण्ठ में जाता है |
 
युगधर्म प्रवर्ताइमु नामसंकीर्तन |
चारि भाव-भक्ति दिया नाचामु भुवन ||  (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,19)

मैं नामसंकीर्तन रूपी युगधर्म का प्रवर्तन करूँगा और चारो रस प्रदान करने वाली प्रेम भक्ति देकर इन जगत वासियों को प्रेम-भाव में नचाऊँगा  |

आपनि करिमु भक्तभाव अंगीकारे |
आपनि आचरि' भक्ति सिकाइमु सबारे ||  (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,20)

मैं स्वयं भक्तभाव अंगीकार करके अपनी ही भक्ति का स्वयं आचरण कर, सबको भक्ति की शिक्षा दूँगा |
 
युगधर्म-प्रवर्तन हय अंश हैते |
आमा बिना अन्ये नारे ब्रजप्रेम दिते ||  (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,26)

युगधर्म का प्रवर्तन मेरे अंशावतार द्वारा भी हो सकता है किन्तु व्रजप्रेम को मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं दे  सकता है |

इस तरह से विचार करके युगावतार श्रीनारयण, श्री कृष्ण मे प्रविष्ट होकर नदिया में श्री कृष्णचैतन्य महाप्रभु  के रूप में अवतरित हुए | युवावस्था की लीलायों में उन्होने ने जगत को भक्ति रस से भर दिया और शेषलीला में उनहोंने श्री कृष्ण के सम्बन्ध में बताकर सम्पूर्ण विश्व को धन्य कर दिया - श्रीकृष्ण जानाये सब विश्व कैल धन्य ।
 

अनर्पितचरीं  चिरात्त करुणयावतीर्ण:  कलौ
समर्पयितु मुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम।
हरि: पुरटसुंदरद्युतिकदम्बसंदिपित:
सदा हृदयकन्दरे स्फुरतु व: शचीनंदन:॥
 

सुवर्णकांति से दैदीप्यमान वे श्री शचीनंदन गौरहरि, तुम्हारे हृदय में स्फूर्ति  प्राप्त करें, जो सर्वोत्कृष्ट उज्जवलरस जिसे जगत को कभी दान नहीं किया था, को स्वभक्ति -रूप सम्पति के रूप में दान करने के लिए कलिकाल में अवतीर्ण हुए हैं |
 

स्व भक्तेभ्य: शुद्धं  निज-भजन-मुद्रम उपदिशं।

उन्होंने  अपने  भक्तवृन्द को अपनी दिव्य भक्ति का उपदेश दिया | (श्री चैतन्य चरितामृत आदि, 3,66)

उपदिशन अर्थात उपदेश और मुद्रा अर्थात विशेष भाव या चिन्ह | इस तरह महाप्रभु मे एक वशिष्ट विशेषता है कि उन्होंने अपने भक्तों को शुद्व भक्ति का उपदेश दिया | श्रीश्री गौर-गदाधर के विग्रहों में श्रीमन्महाप्रभु के दाहिने हस्त की विशेष मुद्रा स्वयं की विशुद्व रसमय भक्ति का उपदेश दे रहे है - निज भजन मुद्रामुपदिशं।
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु

उक्त श्लोक के प्रारम्भ में 'अनर्पितचरीं  चिरात्त, उन्नतोज्ज्वरसां स्वभक्तिश्रियम' अति महत्वपूर्ण हैं, अर्थात जिस सर्वोत्कृष्ट उज्ज्वल- रस , जो की इसके पूर्व, अन्य किसी अवतारों में इस प्रकार की दया का प्रकाश कर प्रदान नहीं किया गया।

वास्तव मे श्री महाप्रभु माधुर्य-रस को प्रदान करने के लिए ही जगत मे अवतीर्ण हए | यह गौड़ीय सम्प्रदाय की वशिष्ट विशेषता है, जो अन्य सम्प्रदायों में नहीं है |
 
 
मधुर रस ही मुख्य रस है क्योंकि यह अन्य रसों शान्त, दास्य, सख्य तथा वात्सल्य से युक्त है |
 
श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रकट के कारण के उद्देश्य की पुष्टि सार्वभौम भट्टाचार्य ने नीचे लिखे शलोक में की है |
 

वैराग्य-विद्या-निज-भक्तियोग-शिक्षार्थमेक: पुरुष: पुराण:
श्रीकृष्णचैतन्यशरीरधारी कृपाम्बुद्धिरयस्तमहं प्रपद्ये।

मैं उन भगवान् श्री कृष्ण की शरण ग्रहण करता हूँ जो हमें वास्तविक ज्ञान, अपनी भक्ति तथा कृष्णभावनामृत के सम्वर्धन में बाधाओं  से विरक्ति सिखलाने के लिए श्रीचैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए है । वे असाधारणकृपा के सिन्धु होने के कारण अवतरित हुए है।  मैं उनके चरणकमलो की शरण ग्रहण करता हूँ | (श्रीचैतन्य चरितामृत, मध्य 6,254)
 
गौर-प्रेमानन्दे!
हरि-हरि बोल!
 


WRITTEN BY SWAMI B.G. NARASINGHA  
WEDNESDAY, 20 OCTOBER 2010

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