बुधवार, 21 अप्रैल 2021

आपकी भगवान के प्रसाद के प्रति अटूट निष्ठा थी

दुनियावी दृष्टि से आपके अन्दर संसार के प्रति वैराग्य व भगवान के नाम, भगवान के धाम व भगवान के भक्तों तथा यहाँ तक कि भगवान के प्रसाद के प्रति इतना अनुराग था कि यदि कोई भक्त आपको भगवान केए प्रसाद देता तो आप 'ना' नहीं बोलते थे। आपकी धारणा ये थी कि प्रसाद तो भगवान की कृपा होती है। 

संस्कृत में प्रसाद का अर्थ तो कृपा होता है। ये भक्त मुझे भगवान की कृपा दे रहा है, मैं भला इसे मना कैसे कर दूँ? 

कई बार तो ऐसा भी हुआ कि आपके गुरुदेव को हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने प्रसाद बाँटने वाले को निर्देश दिया कि वे श्रीकृष्ण बल्लभ (श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी) को उतना प्रसाद दें जितना वे खा सकें। परमारध्य श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज 'विष्णुपाद' जी ने अपने सेवकों को बताया कि कृष्ण-वल्लभ तो परमहंस है, उसे इन बातों की सुध-बुध नहीं है, तुम्हें ध्यान से उन्हें प्रसाद देना होगा।
ऐसा तो कई बार देखा गया कि आप प्रसाद के साथ पत्तल भी खा गए, ये समझ कर कि इस पत्तल  को कैसे फेंकूँ, इसमें तो जहाँ-तहाँ भगवान का प्रसाद लगा है। ये घटनाएँ ठीक उसी प्रकार हुईं जैसे परम वैष्णव श्रीमाधवेन्द्र पुरीपाद जी के लिए जब श्रीगोपीनाथ भगवान ने खीर चोरी करके पुजारी के हाथोंं उनके पास भिजवाई तो श्रीमाधवेन्द्र पुरी जी ने श्रीगोपीनाथ भगवान के भाव में डूअबकर खीर तो खायी ही, साथ हि साथ मिट्टी के कुल्हड़ को भी तोड़-तोड़ कर खाया जिसमें गोपीनाथजी का खीर 
प्रसाद आया था।

लीला में भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के परम भक्त श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद जी व भगवान गोपीनाथ जी के खीर की कथा निम्न प्रकार से है --

उड़ीसा के श्रीगोपीनाथ मन्दिर में सायंकाल जब श्रीमाधवेन्द्र पुरी जी पहुँचे तो किसी ने उन्हें बताया कि संध्या के समय श्रीगोपीनाथ जी को प्रतिदिन खीर का भोग लगता है। खीर का नाम है ---- 'अमृतकेलि'। मिट्टी  के केंद्रीकरण बर्तनों में भरकर इस अमृत अमान खीर का भोग लगता है। यह खीर गोपीनाथजी की खीर के नाम से प्रसिद्ध है। ये ऐसा दिव्य-भोग है कि पृथ्वी पर और कहीं नहीं मिलता है। 
बात चल ही रही थी कि उसी समय 'अमृतकेलि' खीर का भोग ठाकुरजी को निवेदन किया गया। तब श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद ने मन-मन में विचार किया कि बिना माँगे ही यदि खीर का प्रसाद मिल जाता तो मैं उसका आस्वादन करता और ठीक उसी प्रकार की खीर का भोग अपने गोपालजी को लगाता किन्तु साथ-साथ उन्होंने अपने आप को धिक्कार दिया कि मेरी खीर खाने की इच्छा हुई।

अतः वे ठाकुरजी की आरती दर्शन करके और उन्हें प्रणाम करके मन्दिर से 
बाहर चले आए और सुनसान पड़े बाज़ार में बैठ कर हरिनाम करने लगे। श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद जी अयाचक वृत्ति के थे। उन्हें भूख-प्यास का कोई बोध ही न था। वे हमेशा ही प्रेमामृत पान करके तृप्त रहते थे। इधर पुजारी जी अपने ठाकुरजी की पूजा आदि कार्य स्मापन करके जब सो गए तो स्वप्न में ठाकुरजी कहने लगे ---

उठह पूजारी, कर द्वार विमोचन।
क्षीर एक राखियाछि संन्यासी कारण॥
धड़ार अंचले ढाका क्षीर एक हय।
तोमरा ना जानिला ताहा आमार मायाय॥
माधव पुरी संन्यासी आच्छे हाटेते बसिया।
ताहाके त, एइ क्षीर शीघ्र देह लैया
(चै-च-म-  4/127-129)

अर्थात्] पुजारी! उठो! मन्दिर के दरवाज़े खोलो। मैंने एक संन्यासी के लिए एक पात्र में खीर रखी हुई है जो कि मेरे आंचल के कपड़े से ढकी हुई है। मेरी माया के कारण तुम उसे नहीं जान पाये। माधवेन्द्र पुरी संन्यासी हरि (सप्ताह में एक दिन लगने वाले बाज़ार) में बैठा हुआ है। शीघ्र यह खीर ले जाकर उसे दे दो।
स्वप्न देखकर पुजारी आश्चर्यान्वित हो उठे। स्वप्न टूट्ने पर स्नान करने के पश्चात् मन्दिर स दरवाज़े खोले तो देखा ठाकुरजी के आंचल के वस्त्र के नीचे एक खीर का पात्र रखा हुआ है। उस खीर के पात्र को लेकर पुजारी जी हाट में घूम-घूम कर माधव पुरी जी को ढूँढते हुए इस प्रकार पुकारने लगे --- 

क्षीर लह एइ, याँर नाम माधव पुरी।
तोमा लागि, गोपीनाथ क्षीर कैल चुरी॥
क्षीर लञा सुखे तुमि करह भक्षणे। 
तोमा सम भाग्यवान् नाहि त्रिभुवने॥

[अर्थात् जिसका नाम माधवेन्द्रपुरी है, वह यह खीर ले ले, आपके लिए ही गोपीनाथजी ने यह क्षीर चोरी की है। यह क्षीर लेकर आप सुख से इसे खाओ। आपके समान भाग्यवान तो त्रिभुवन में कोई नहीं है।]

ऐसा सुनकर माधवेन्द्रपुरी जी अपने स्थान पर खड़े हुए और उन्होंने पुजारी
को अपन परिचय दिया। पुजारीजी ने उन्हें खीर दी तथा दण्ड्वत् प्रणाम किया। पुजारीजी ने अपने अवप्न में आए हुए आदेश की बात माधवेन्द्रपुरीपाद जी को कही। पुजारी जी की बाअ सुनकर माधवेन्द्रपुरी जी ने प्रेमाविष्ट हृदय से उस खीर-प्रसाद का सम्मान किया और खीर के बर्तन को धोकर व उसके टुकड़े-टुकड़े करके उसे अपने बहिर्वास में बाँध लिया। वे प्रतिदिन उस मिट्टी के एक टुकड़े को खाते और प्रेमाविष्ट हो उठते।

प्रारम्भ से ही भगवत्-प्रसाद के प्रति आपकी निष्ठा अद्भुत है, आज के समय में भी यदि कोई व्यक्ति आपके चरणों को हाथ लगा दे और आपके हाथ से प्रसाद लेने के लिए हाथ पसारे तो आप स्पष्ट रूप से कह देते --- जाओ पहले हाथ धोकर आओ, आपने पैरों को हाथ लगाया, इन हाथों से प्रसाद नहीं लेते।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें