सोमवार, 1 नवंबर 2021

श्रीगीता शास्त्र का मुख्य तात्पर्य

 

कुरुक्षेत्र के मैदान में जब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा --

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ (श्रीगीता - 18/66) 

तब, उनके कहने का अर्थ यह था --

ब्रह्म-ज्ञान और ईश्वर-ज्ञान प्राप्ति का उपदेश देते समय वर्ण और आश्रम धर्म, संन्यास धर्म, वैराग्य, शम दम आदि धर्म, ध्यान योग, ईश्वर की ईशिता के वशीभूत होने इत्यादि जितने प्रकार के धर्मों क उपदेश दिया है, उन सब को पूरी तरह त्याग क भगवत्-स्वरूप एक मात्र मेरी शरण स्वीकार करो।  मैं तुम्हें सारे पाप अर्थात् पहले कहे गये धर्मों के परित्याग से जो पाप होंगे, उन सब से मुक्त कर दूँगा।

आप अपने आप को अकृतकर्मा समझ कर शोक मत करना। मेरी निर्गुण भक्ति करने से जीव का, प्राणी का सत् स्वभाव (वास्तविक स्वभाव) सहज ही स्वास्थ्य लाभ करता है। धर्माचरण, कर्तव्य आचरण और प्रायश्चितादि तथा ज्ञान, योग और ध्यान का अभ्यास कुछ भी आवश्यक नहीं होता। 

वर्तमान अवस्था में शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सारे कर्म करो किन्तु उन-उन कर्मों में ब्रह्म के प्रति निष्ठा को छोड़ कर मेरे सौन्दर्य और माधुर्य से आकर्षित होकर एकमात्र मेरी ही शरण लो। 

तात्पर्य यही है कि मनुष्य अपने जीवन-निर्वाह के लिए जितने प्रकार के कर्म करता है, वे सब तीन प्रकार की उच्च निष्ठा से करता है, या फिर इन्द्रियसुख - निष्ठारूप अधमनिष्ठा से करता है। अधम निष्ठा से अकर्म और विकर्मादि होते हैं, जो अनर्थ देने वाले हैं। उत्तम निष्ठा तीन प्रकार की है -- ब्रह्म के प्रति निष्ठा, ईश्वर के प्रति निष्ठा और भगवान के प्रति निष्ठा।

वर्णाश्रम और वैराग्य इत्यादि सभी कर्म एक-एक प्रकार की निष्ठा को
अवलम्बन कर एक-एक प्रकार के भाव को प्राप्त होते हैं।  जब ये कर्म  ब्रह्म-निष्ठा के अधीन होकर किये जाते हैं तब कर्म और ज्ञानभाव का प्रकाश होता है।  जब ये कर्म ईश्वर-निष्ठा के अधीन होकर किये जाते हैं तब ईश्वर अर्पित कर्म और ध्यानयोग आदि का भाव मन में उदित होता है और जब भगवान में निष्ठा रखकर किये जाते हैं तब वे शुद्ध एवं केवला भक्ति में परिणत हो जाते हैं। 

इसलिए भक्ति का यह गुह्यतम तत्व एवं भगवद्-प्रेम ही सभी प्राणियों का चरम प्रयोजन है।

यही गीताशास्त्र का मुख्य तात्पर्य है।

(कर्मी, ज्ञानी, योगी और भक्त -- इनका जीवन क प्रकार का होने पर भी निष्ठा में भेद होने से ये बिल्कुल अलग-अलग हैं।) 

--  श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी के लेखों से ।



शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2021

इस प्रकार राधा कुण्ड प्रकट हुआ

एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने अरिष्टासुर को मारा। उस दिन जब आप श्रीमती राधा जी से मिलने गये तो श्रीमती राधाजी ने मिलने से मना कर दिया क्योंकि उनके अनुसार श्रीकृष्ण ने एक बैल को मारा था, चाहे वो एक दैत्य ही क्यों न था? बैल को मारने के कारण वे अपवित्र हो गये थे। अतः जब तक श्रीकृष्ण सभी तीर्थों के जल में स्नान नहीं कर लेते, तब तक वे अपवित्र ही रहेंगे। भगवान श्रीकृष्ण यह सुन कर हँस पड़े। भगवान ने जैसे ही अपने चरणों से पृथ्वी को दबाया, तभी सारे तीर्थों का जल लिये एक कुण्ड वहाँ प्रकट हो गया। श्रीमती राधा व उनकी सखियों के विश्वास के लिये सारे तीर्थ सभी के सामने श्रीकृष्ण को अपना-अपना परिचय देकर उनका पूजन करने लगे। 

भगवान ने फिर उस में स्नान किया।

कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात को यह घटना हुई।

इस प्रकार श्याम कुण्ड प्रकाशित हुआ।

जब श्रीकृष्ण ने सखियों सहित श्रीमती राधा जी से कुछ मज़ाक में कहा तो वे सब एक अन्य कुण्ड की खुदाई करने लगीं। देखते ही देखते वहाँ एक और सरोवर खुद गया, किन्तु उसमें जल नहीं था। यह देख सभी गोपियाँ चिन्तित हो गयीं। 


तब श्रीकृष्ण ने फिर मज़ाक में कहा - मेरे कुण्ड का जल ले लो और अपना सरोवर भर लो। 

गोपियों ने कहा - वृषासुर को मारने से जो पाप हुआ, उसे इस कुण्ड में धोया होने के कारण, इस का जल पवित्र नहीं रहा। हम मानसी गंग़ा से जल लेकर आयेंगीं। 
तब श्रीकृष्ण के ईशारे पर सभी तीर्थ श्रीमती राधाजी के आगे खड़े होकर उनका स्तव करने लगे।  श्रीमती राधाजी के हामी भरते ही, श्याम कुण्ड का जल बड़ी तेजी से राधा-कुण्ड की ओर उछला। उससे राधा-कुण्ड भी भर गया।

इस प्रकार राधा कुण्ड प्रकट हुआ।

भजन स्थानों में श्रीराधा कुण्ड हि सर्वश्रेष्ठ है।

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2021

कष्टों से निवारण

श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर जी के समय कुछ मठ वासी विभिन्न तीर्थ स्थानों पर वास करने की इच्छा से जाने लगे। उनके मन में था कि, हरिनाम ही तो करना है, तो क्यों न किसी धाम में करें? मठ में रहले वाले भक्तों की मनःस्थिती को भांपते हुए श्रील प्रभुपाद जी ने एक कीर्तन लिखा - 'वैष्णव के'।

उसमें उन्होंने लिखा-- ये जो राधा जी ने निज-जन के संग को छोड़ कर तुम एकान्त भजन करने जा रहे हो, वो एकान्त भजन मात्र कपटता है। (श्रील प्रभुपाद स्वयं ही श्रीराधा जी के निज-जन हैं)। भजन तो होता है शुद्ध भक्तों के आनुगत्य में। 

अतः हमारी एकमात्र आशा श्रीहरिनाम संकीर्तन से है। तो उच्च स्वर से हरिनाम करो। कीर्तन के प्रभाव से स्मरण होगा भगवान की लीलाओं का, गुरू की महिमा का। 

इससे दुनिया के तमाम असत्संग तुम्हारे पास नहीं आयेंगे, क्योंकि आप परमानन्दमय भगवान का स्मरण कर रहे होओगे। श्रील प्रभुपाद जी या उनके अनुगत जनों के आनुगत्य में रहकर उच्च स्वर से हरिनाम करें, सारे कष्ट कट जायेंगे।



बुधवार, 20 अक्तूबर 2021

शीश दिये गुरु मिले, तो भी सस्ता जान

 बात उन दिनों की है जब श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी के श्रीनवद्वीप धाम परिक्रमा को प्रारम्भ करने के निर्देश पर जगद्गुरु नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद 108 श्रीश्रीमद् भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद अमल कर रहे थे। उन दिनों नवद्वीप में ब्राह्मणों द्वारा कुछ ऐसी प्रथा प्रचलित थी कि, मन्दिर में प्रवेश के पूर्व, ठाकुर जी के दर्शनों के लिये मन्दिर के पण्डा अथवा महन्त को कुछ चन्दा देना पड़ता था, नहीं तो दर्शन नहीं होते थे।

श्रील प्रभुपाद ने इस प्रथा का पुरज़ोर विरोध यह कह कर किया था कि भगवान के दर्शन तो सब के लिये है। अतः श्रील प्रभुपाद जी ने मठ-मन्दिर बनाये ताकि लोग-भक्त बिना रूकावट ठाकुर के दर्शन करने आ सकें। इस बात से बहुत से महन्त/पण्डा श्रील प्रभुपाद से नाराज़ थे।
जब श्रीनवद्वीप धाम परिक्रमा का समय आया, तो सबको पता था कि श्रील
प्रभुपाद और उनके साथ सैकड़ों भक्त मायापुर से कोलद्वीप जाते हुये प्रौढ़ - माया के मन्दिर के पास से गुज़रेंगे। उस मन्दिर का रास्ता दोनों ओर मकानों से घिरी सड़क से निकलता था।
कुछ शरारती तत्त्वों ने ब्राह्मणों के कहने पर उक्त परिक्रमा कर रहे भक्तों का स्वागत ईंट-पत्थर से करने की सोची ताकि इसी हल्ले-गुल्ले में श्रील प्रभुपाद को शरीरिक तौर पर खत्म कर दिया जाये।

सभी ने गली के मकानों की छतों पर काफी सारे ईंट-पत्थर इकट्ठे कर लिये। 

जब नगर-संकीर्तन में भक्तों की टोली वहाँ पहुँची तो उस समय श्रील प्रभुपाद सभी के बीच में नृत्य-कीर्तन कर रहे थे। हरे कृष्ण महामन्त्र की ध्वनि चारों ओर गूँज रही थी।

अचानक ऊपर से ईंट-रोड़े बरसने लगे। इससे भक्तों की भीड़ तितर-बितर हो गयी। परिक्रमा के बीच एक ज़मींदार का लड़का जो श्रील प्रभुपाद जी का ही शिष्य था, सारी बात समझ गया। आपने श्रील प्रभुपाद को नज़दीक के मकान में खींच लिया। 
आपने श्रील प्रभुपाद से कहा कि आप जल्दी से वस्त्र बदलिये, आपकी सबको बहुत जरूरत है। आपका जीवन अनमोल है। साथ ही साथ आप अपने कपड़े भी उतार रहे थे। आपने अपने सफेद वस्त्र श्रील प्रभुपाद जी को पहना दिये व स्वयं उनके वस्त्र पहन लिये। आपको यह अंदेशा था कि जो लोग ऊपर से ईंटे मार रहे हैं, कुछ ही देर में नीचे आकर मार-काट करेंगे। 

आपने मठ के एक अन्य निष्ठावान शिष्य के साथ श्रीलप्रभुपाद को उस मकान के पीछे से वापिस मठ की ओर भेज दिया। 

आपकी कद-काठ श्रीलप्रभुपाद से काफी मिलती थी।

श्रील प्रभुपाद के वस्त्रों में , पगड़ी बांधे, ईंटों की बारिश में आप बाहर आ गये।
आपने अपने जीवन की परवाह न करते हुए, अपने गुरुदेव के लिये यह खतरा मोल लिया ।
अद्भुत थी आपकी गुरु-निष्ठा।

आप ही कुछ समय बाद परमपूज्यपाद श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज जी कहलाये।

किसी ने इस घटना की सूचना पुलिस को दी , पुलिस को देखकर सब उपद्रवी वहाँ से भाग खड़े हुए।

जब पुलिस ने श्रील प्रभुपाद जी को पूछा कि आपको किसी पर शक है, तो शिष्यों के कहने के बावज़ूद भी श्रील प्रभुपाद ने किसी का नाम नहीं लिया, हालांकि वे उपद्रवियों का नाम जानते थे।

शिष्यों ने श्रील प्रभुपाद से इसका कारण पूछा, तो श्रील प्रभुपाद ने कहा कि हम तो कृष्ण-प्रेम देने आये हैं, लड़ाई करने नहीं। देख लेना भविष्य में यह घटना घूमा-फिराकर हमारा ही सु-प्रचार करेगी।

अगले दिन, वहाँ के प्रसिद्ध दैनिक अखबार 'आनन्द बाज़ार पत्रिका' ने प्रथम पृष्ट पर इस घटना की विस्तृत खबर देते हुये लिखा कि आज भी नवद्वीप में श्रीकृष्ण प्रेम को देने के लिए श्रीनित्यानन्द जी हैं, और उनको चोट देने वाले जगाई-माधाई भी।

श्रीलप्रभुपाद ने अपने शिष्यों को बुलाकर कहा कि देखो जो काम हम सब 
दस साल में नहीं कर पाये, भगवान ने इस खबर के माध्यम से कुछ ही पलों में कर दिया।

जगद्-गुरु श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद जी की जय !!!

आपके प्रिय शिष्य श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज जी की जय !!!!

श्रीहनुमान जी जब भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी की लीला में आये

 

श्रीमुरारी गुप्त जी के माध्यम से भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने इष्टनिष्ठा की शिक्षा प्रदान की तथा वे भी बताया कि आराध्यदेव में निष्ठा के बिना प्रेम बढ़ता नहीं। हनुमान जी के अवतार मुरारीगुप्त जी महाप्रभु जी का राम रूप से दर्शन करते थे। आपकी इष्ट निष्ठा की परीक्षा लेने के लिये श्रीमहाप्रभु जी ने आपसे कहा - 'सर्वाश्रय, सर्वांशी, स्वयं भगवान्, अखिल रसामृत मूर्ति - व्रजेन्द्रनन्दन श्री कृष्ण के भजन में जो आनन्द है, भगवान के अन्य स्वरूपों की आराधना में वह आनन्द नहीं है।' श्रीमुरारीगुप्त श्रीमहाप्रभु जी को कृष्ण-भजन करने का वचन देने पर भी घर में आकर यह सोचकर कि भगवान श्रीरघुनाथ जी के पादपद्मों को त्याग करना होगा, अस्थिर हो उठे। सारी रात जाग कर ही बिता देने पर, दूसरे दिन प्रातः महाप्रभु जी के पादपद्मों में निवेदन करते हुये बोले -'मैंने अपने इस मस्तक को श्रीरघुनाथ जी के चरणों में बेच दिया है। परन्तु अब मैं पुनः वहाँ से इस सिर को नहीं उठा सकता हूँ। अब इस दुविधा में मैं दुःख पा रहा हूँ कि श्रीरघुनाथ जी के चरण मुझसे छोड़े नहीं जाते। किन्तु यदि नहीं छोड़ता तो आपकी आज्ञा भंग होती है। कुछ समझ में नहीं आता, क्या करूँ ? आप दयामय हैं, मेरे ऊपर ऐसी कृपा करो कि आपके सामने ही मेरी मृत्यु हो जाये, तब यह संशय समाप्त हो जायेगा।'                                                                                                                            
भगवान  श्रीमन्महाप्रभु  मुरारीगुप्त के इष्टनिष्ठायुक्त वाक्य सुनकर परम सन्तुष्ट होकर बोले -'तुम तो श्रीराम जी के किंकर साक्षात् हनुमान हो, तुम भला उनके चरण कमलों को कैसे छोड़ सकते हो? सचमुच वह भक्त धन्य है, जो किसी भी परिस्थिति में अपने प्रभु के चरण नहीं छोड़ता है और वही प्रभु धन्य हैं, जो कभी भी अपने जन को नहीं छोड़ते हैं।'