गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

भगवान बलराम ने जब युधिष्ठर महाराज को श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के बारे में बताया…

द्वापर युग की बात है। एक बार पाँच पाण्डव वनों में घूमते-घूमते, श्रीनित्यानन्द जी के जन्म स्थान, पश्चिम बंगाल के एकचक्र नामक गाँव में पहुँचे। पाण्डव स्वभाव से ही सज्जन भक्त थे व लोगों की सेवा में व्यस्त रहते थे। स्थानीय लोगों के अनुरोध पर भीम ने एक शक्तिशाली राक्षस का वध भी किया था। 

युधिष्ठिर एकचक्र के सुन्दर वातावरण, महकते वायु मण्डल को देख अत्यधिक चकित थे। इतने वनों में वे घूमे पर ऐसा मनमोहक उपवन उन्होंने नहीं देखा था। उनके मन में रह-रह कर यही बात उठती थी की हो न हो इस स्थान का श्रीकृष्ण से जरूर कुछ सम्बन्ध है अन्यथा इसमें इतनी सुन्दरता होने का कोई कारण नहीं है।
परन्तु फिर वो यह विचार करने लगे कि श्रीकृष्ण ने कभी जिक्र नहीं किया। उसी उधेड़बुन में वे सो गये तो रात के समय स्वप्न में उन्हें भगवान बलराम जी ने दर्शन दिये। 

भगवान बलराम बोले, -- 'यहाँ से कुछ ही दूरी पर नवद्वीप नामक स्थान है गंगा नदी के किनारे । कलियुग के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण, एक ब्राह्मण के घर में, नवद्वीप में प्रकट् होंगे, हालांकि वे अपना रूप छिपाये रहेंगे। उन्हीं की इच्छा से उनके सेवक-भक्त अनेक स्थानों पर जन्म लेंगे। उन्हीं की इच्छा से मैं यहाँ पर जन्म लूँगा।' इतना कह कर श्रीबलराम जी अदृश्य हो गये।
महाराज युधिष्ठिर की नींद टूट गयी व उन्होंने, स्वप्न की बात सभी भाईयों को सुनाई।

इधर कलियुग के प्रारम्भ में श्रीबलराम जी जब श्रीनित्यानन्द रूप में आये, उससे पहले ही उनका एकचक्र गाँव बहुत प्रसिद्ध हो चुका था। इस में बहुत से मन्दिर थे। एक बहुत ही प्राचीन शिव-पार्वती जी का मन्दिर भी था। समीप ही एक विशाल नदी प्रभावती बहती थी, जिसमें 12 महीने पानी रहता था।

आसपास के वन में अहिंसक पशुओं की भरमार थी । रात-दिन कोयल की कु-कू, भ्रमरों की गुंजार, पक्षियों की चहचहाट होती रहती थी। 

किसी को भी नहीं पता था की यह गाँव कहाँ से व कब प्रकट हुआ परन्तु यहाँ के निवासी बहुत ही सुख व आनन्द से रहते थे। एकचक्र में वैभवशाली लोगों सहित विद्वान पण्डितों का भी वास था। कुछ भविष्य ज्ञान कहते थे की इस स्थान पर श्रीबलराम प्रकट होंगे, अतः यह स्थान भी मथुरा-अयोध्या की तरह धाम है।

श्रीनित्यानन्द जी की कृपा के बिना पापी और अपराधी जीवों का उद्धार का 
कोई उपाय नहीं है। श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु भक्ति लीला करते हुए भी स्वरूपतः भगवत-तत्त्व हैं, उनके पार्षद उनकी कृपा शक्ति का मूर्त-स्वरूप हैं। श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु परम पतित-पावन हैं फिर उनके अन्तरंग पार्षद परम-परम पतित पावन हैं। वस्तुतः श्रीमन् नित्यान्द प्रभु भक्तों के माध्यम से ही कृपा करते हैं। 
महा-महा वदान्य श्रीनित्यानन्द प्रभु की जय !!!!!

आपकी अविर्भाव तिथि की जय !!!!!

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

भगवान के शूकर अवतार को क्या भोग लगता है?

 

वराह अवतार दशावतारों में तीसरे अवतार हैं।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी अपनी पुस्तक दशावतार में बताते हैं कि भगवान का ये अवतार दो बार हुआ। 

स्वयंभुव-मन्वन्तर में भगवान वराह ने ब्रह्मा की नाक से प्रकट् होकर पृथ्वी को समुद्र के तल से ऊपर उठाया था। दूसरी बार आप छठे (चक्शुश-मन्वन्तर) 
में प्रकट् हुए जब आपने पृथ्वी को बचाते हुए दैत्य हिरण्याक्ष का वध किया था।

किसी किसी को ऐसा संशय है कि भगवान वराह को क्या भोग लगाया जाता है क्योंकि सुअर गंदगी खाता है ? 

पहली बात तो यह की भगवान के सभी अवतार दिव्य होते हैं, सर्वशक्तिमान होते हैं, व गुणों की खान होते हैं। दूसरा अर्चन के नियमानुसार ही भगवान को भोग लगता है। अर्थात् भक्त जो स्वयं खाता है, वही पवित्र भाव से अपने इष्टदेव को अर्पण करने के बाद, स्वयं खाता है। 

तीसरी बात, भगवान का वराह अवतार जंगली शूकर के रूप में होता है, न की शहरी सूअर के रूप में। और जंगली वराह (शूकर) मल-भोजी नहीं होता। 
एक और बात, जम्मू-कशमीर, दक्षिण भारत, इत्यादी में दशावतारों के मन्दिर पाये जाते हैं, वहाँ पर सभी में वराह भगवान की नाक के ऊपर एक सींग दिखाई देता है, जो कि साधारण सुअर के नहीं होता।

भगवान वराह की जय !!!!

आपकी प्रकट तिथि की जय !!!!!

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

जब भगवान जगन्नाथ जी आपके लिये युद्ध लड़ने गये

 

भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी के भक्त थे, ओड़ीसा के राजा प्रतापरुद्र। उनके समय में उनका राज्य वर्तमान आन्ध्रप्रदेश के राजमहेन्द्री नामक स्थान तक फैला हुआ था।

राजा प्रतापरुद्र के पिता श्रीपुरुषोत्तम देव भगवान श्रीजगन्नाथ देवजी के अनन्य-शरण भक्त थे।

जब श्रीपुरुषोत्तम देव के साथ कान्ची नगर की राजकुमारी पद्मावती का विवाह निश्चित हुआ तो कान्ची के राजा वर को मिलने के लिये पुरी आये। वो भगवान जगन्नाथ जी की रथ-यात्रा का दिन था।  राजा पुरुषोत्तम देव सोने के झाड़ू से रथ का रास्ता साफ कर रहे थे। लगभग उसी समय कान्ची के राज वहाँ पर पहुँचे और उन्होंने सारा दृश्य देखा।

ऐसा देख कर कान्चीराज ने सोचा कि वे एक झाड़ूदार चाण्डाल के साथ अपनी कन्या का विवाह नहीं करेंगे। यह विचारकर उन्होंने विवाह की बात तोड़ दी।
कांची के राजा गणेश जी के भक्त थे। उनकी जैसी श्रद्धा गणेशजी में थी, वैसी श्रद्धा भगवान जगन्नाथजी में नहीं थी।

श्रीपुरुषोत्तम देव को जब अश्रद्धा की बात मालूम हुई तो वे क्षुब्ध हो उठे और एक बड़ी सेना लेकर उन्होंने कान्चीराज पर आक्रमण कर दिया। किन्तु वे युद्ध हार गये।

हार से हताश होकर वे भगवान जगन्नाथदेव जी को मिलने गये और उनके शरणागत हो गये। जब हार के कारण की जिज्ञासा की तो भगवान जगन्नाथदेव जी ने उनसे पूछा कि क्या वे युद्ध में जाने से पहले भगवान से आज्ञा लेने आये थे?

अपनी गलती को मानते हुये राजा ने पुनः भगवान जगन्नाथ जी से आज्ञा मांगी। भगवान जगन्नाथजी के द्वारा ये आश्वासन देने पर कि वे युद्ध में राजा की सहायता करेंगे, राजा ने युद्ध कि तैयारी प्रारम्भ कर दी व भगवान जगन्नाथजी को प्रणाम कर, कुछ ही दिनों में कान्ची नगर की ओर कूच 
कर दिया।
जब उनकी सेना पुरी से 12 मील दूर आनन्दपुर गाँव पहुँची तो एक ग्वालिन ने उनका रास्ता रोका। जिज्ञासा करने पर उसने राजा से कहा -' आपकी सेना के दो अश्वरोही सैनिकों ने उससे दूध-दही और लस्सी पी। जब मैंने पैसे मांगे तो उन्होंने मुझे एक अंगूठी दी और कहा कि ये अंगूठी राजा को दे देना और मूल्य ले लेना। ऐसा बोल कर वो दोनों आगे चले गये।'

राजा पुरुषोत्तम देव कुछ चकित हुये व ग्वालिन से अंगूठी दिखाने के लिये कहा। ग्वालिन ने राजा को वो अंगूठी दे दी। अंगूठी देखकर पुरुषोत्त्म देव को समझने में देर नहीं लगी, के वे दोनों सैनिक श्रीजगन्नाथ और श्रीबलराम जी को छोड़ क्र कोई दूसरा नहीं है।

राजा ने गवालिन को उपयुक्त पुरस्कार दिया।
जब राजा कान्ची नगर पहुंचा तो वहाँ सब कुछ पहले ही नष्ट हो चुका था।

युद्ध जय कर, कान्चीराज के मणियों से बने सिंहासन को राजा ने भगवान जगन्नाथदेव जी को अर्पित कर दिया।
कान्चीराज युद्ध में पराजय के बाद अपनी कन्या को स्वयं पुरी लेकर आये एवं रथ यात्रा के समय स्वर्ण के झाड़ू से स्वयं रथ का रास्ता साफ करते हुये उन्होंने अपनी कन्या पुरुषोत्तम देव के हाथों में समर्पण कर दी।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति में बाधा क्या है?

 

एक दिन भगवान श्रीकृष्ण - श्रीबलराम गोचारण के समय बछड़ों और गोपबालकों के साथ भ्रमण करते-करते एक जलाशय के पास पहुँचे।

गोपबालकों और बछड़ों को बहुत प्यास लगी हुई थी। अतः उस जलाशय का जल पीने लगे कि तभी कंस का भेजा हुआ एक भयंकर असुर वहाँ आ गया। उसका नाम था बकासुर्। 

उसे देखकर सभी भयभीत हो गये। बकासुर उनके पास आया और गोप बालकों के सामने अपन मुँह खोल कर श्रीकृष्ण को निगल गया। ऐसा भयंकर दृश्य देखकर श्रीबलदेव व गोपबालक प्राणः शून्य हो गये। भक्त आर्तिहर श्रीकृष्ण जब उस बगुले रूपी बकासुर के तालु के नीचे पहुँचे तो आग के समान उसका तालु जलाने लगे। 

बक ने घबराकर श्रीकृष्ण को वमन कर बाहर निकाल दिया। किन्तु जब दूसरी बार फिर निगलने के लिए आया तो श्रीकृष्ण ने उसकी दोनों चोंच को चीर कर उसका वध कर दिया। 
प्रत्येक प्राणी के हृदय में स्थित बकासुर का जब तक वध नहीं हो जाता तब तक श्रीकृष्ण को प्राप्त नहीं किया जा सकता व श्रीकृष्ण भक्ति की प्राप्ति नहीं होती। 

श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी के अनुसार बकासुर 'खुटिनाटि' धूर्तता और 'शाठ्य' का प्रतीक है। धूर्तता और शठता श्रीकृष्ण की प्राप्ति में बाधा हैं। 

रविवार, 31 जनवरी 2021

आप आठ कविराजों में से एक हैं

आपको श्रीनिवासाचार्य प्रभु ने स्नेह से दीक्षा मन्त्र प्रदान कर शिष्य स्वीकार किया था। आपकी गुरु-भक्ति अतुलनीय थी। श्रील गुरुदेव की आज्ञा को आप बिना विचार किये ही पालन करते थे। 


जब आप वृन्दावन में थे तो उस समय आपको श्रीजीव गोस्वामी आदि वैष्णवों का संग और उनकी कृपा प्रार्थना करने का सौभाग्य मिला था। आपके अपूर्व कवित्त्व को सुनकर वैष्णवों को बहुत आनन्द आता था।

श्रील जीव गोस्वामी जी ने आपके कवित्त्व से प्रसन्न होकर आपको 'कविराज' की उपाधि प्रदान की थी।

आप आठ कविराजों में से एक हैं।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी ने अपने स्वरचित ग्रन्थ 'श्रीगौर-पार्षद गौड़ीय वैष्णवाचार्यों के संक्षिप्त चरितामृत' में यह बताया है कि आप श्रीकृष्ण लीला में करुणा-मंजरी हैं।

श्रील नरोत्तम ठाकुर जी ने स्वरचित 'प्रार्थना' गीति में आपके संग की कामना की है।

दया कर श्रीआचार्य प्रभु श्रीनिवास।
रामचन्द्र संग मांगे नरोत्तम दास॥


श्रील रामचन्द्र कविराज जी की जय !!!!!