शुक्रवार, 10 जून 2022

श्रीकृष्ण का ध्यान हटाने के लिए मैया ने क्या युक्ति लगाई।

एक दिन की बात है, हमारे नन्द लाल श्रीकृष्ण मैया के आगे ज़िद करने लगे कि मैया मैं तो चाँद लूँगा। मुझे तो वही खिलौना चाहिये।

मैया चुप हो जाती है। बाल कृष्ण ने कहा- मैया, अगर आपने मुझे ये चाँद खिलौना लाकर नहीं दिया तो मैं अभी ज़मीन पर लोट-पोट होने लग जाऊँगा। और तेरी गोद मैं भी नहीं आऊँगा। देख ले, मैं ये गाय है, उसका दूध भी नहीं पीऊँगा। अगर मुझे चन्द्रमा खिलौना नहीं ला कर दिया तो मैं तेरा लाला नहीं कहलाऊँगा, मैं तो बाबा का लाला कहलाऊँगा।

मैया अपने लाला की भोली-भाली बातों पर मन ही मन मुस्कुराती रही। फिर बोली- सुन, लाला। सुन मेरी बात। मेरे पास आ, यह बात मैं तेरे दाऊ भैया को भी नहीं बोलूँगी। देख एक बात है, तेरे लिए मैं नई दुल्हन लेकर आऊँगी। (श्रीकृष्ण के ध्यान को हटाने के लिए मैया ऐसा बोलने लगी दाऊ को नहीं बताना।)

(वैसे तो अन्तर्यामी भगवान को कौन भटका सकता है किन्तु बाल्य लीला के रस के आनन्द के लिए भगवान ऐसे बनने लगे कि उनका ध्यान भटक गया है।)

बोले- माँ तेरी कसम। मेरा ये काम कर दे। मैं अभी शादी के लिए जाने के लिए तैयार हूँ



सोमवार, 30 मई 2022

बोल तुझे यह माखन चाहिए कि वो चन्द्रमा चाहिए?

वृज में जब दो-तीन असुरों का वध हो गया तो सब गोप-गोपी इस बात से डरने लगे कि अब तो यहाँ असुर आने-जाने लगे हैं

जब उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण का बलराम जी से बहुत अधिक स्नेह है तो उन्होंने दोनों को इकट्ठा कर दिया ताकि वे घर से बाहर न निकलें।

कन्हैया भी अपने खेले से सबका मन लगाये रखते।

कभी कोई गोपी कहती-- लाला, तू मुझे ये लाकर दे।

श्रीकृष्ण फटाफट भाग कर जाते और उठा कर ले आते। सब हैरान हो जातीं कि इतना छोटा सा बच्चा, इतनी भारी वस्तु कैसे उठा लाया है?

कभी-कभी श्रीकृष्ण खाली हाथ ही लौट आते और हाथ पसार देते कि मुझे कुछ दो।  उनकी यह लीला देखकर सब हँस पड़तीं

किन्तु मैया यशोदा जब कुछ लाने के लिए बोलतीं तो श्रीकृष्ण सब कुछ छोड़ कर फटाफट भाग जाते और ले आते।

एक बार श्रीकृष्ण ने पानी की मटकी में चन्द्रमा को देखा।

बाल सुलभ हठ करने लगे कि मुझे तो ये चाहिए। मैया ने बहुत समझाने की चेष्टा की किन्तु कन्हैया माने ही नहीं

एक गोपी ने युक्तिपूर्ण तरीके से माखन का एक गोला बनाया और दूर से कन्हैया को दिखाते हुए बोली--- कन्हैया, बोल तुझे यह माखन चाहिए कि वो चन्द्रमा चाहिए?

श्रीकृष्ण ने तुरन्त माखन की ओर दोनों हाथ बढ़ा दिये।

यह देख कर सब हँस पड़े।

गोपी ने शीघ्रता से माखन का वो गोला कन्हैया को दे दिया।




गुरुवार, 26 मई 2022

अरी, बोल क्यों रही हो, भीतर ले आ उसे।

बचपन में श्रीकृष्ण व बलराम जी के साथ गोकुल में रह रहे हैं

गोपियाँ  देखतीं कि कैसे मैया यशोदा जी अपने लाला को दुलारती हैं, गोद में खिलाती हैं, पुचकारती हैं।--------------------- उनकी भी इच्छा होती कि हमें भी कभी मौका मिले तो हम भी कन्हैया को गोद में उठाकर खिलायें, दुलारे,……

भगवान तो भक्त- वत्सल हैं, भक्तों की इच्छा को पूरा कर देते हैं

जब भी ऐसी गोपियाँ नन्द भवन में होतीं तो श्रीकृष्ण रोने की लीला करते। ऐसे रोते कि चुप ही नहीं होते। तब मैया उन्हीं गोपियोंं से कहती-- इसको उठाओ, इसे चुप कराओ।

गोपियाँ नन्हे कन्हाई को उठातीं, दुलारतीं, चुप करातीं

अपनी इस लीला से भगवान उनकी इच्छा को पूरी कर देते।

कन्हैया उनकी गोद में आते ही चुप हो जाते।

श्रील रूप गोस्वामी जी वर्णन करते हैं कि श्रीकृष्ण के स्पर्श से ही गोपियाँ हर्षित हो उठतीं, उन्हें रोमांच आ जाता, हालांकि वे जान न पातीं कि ये क्यों हो रहा है किन्तु श्रीकृष्ण के स्पर्श उन्हें अद्भुत आनन्द की अनुभूति होती।

एक गोपी ऐसी थी जिसकी इच्छा थी कि मैं ही उठाऊँ नन्द-नन्दन श्रीकृष्ण को। कोई और पास में न हो।

एक दिन मैया यशोदा काम में व्यस्त थीं नन्दनन्दन श्रीकृष्ण घुटनों के बल चलते-चलते घर से बाहर बरामदे में आ गये। वो गोपी उस समय घर के अन्दर थी। उसने मैया को पूछ ही लिया-- लाला, कहाँ है?

मैया ने भी इधर-उधर देखा किन्तु लाला को न देख बोलीं--- अभी तो यहीं था, कहाँ गया। ढूँढो।

सब ढूंढने लगे।

वो गोपी ढूँढते हुए बाहर बरामदे में चली आई।

कन्हैया को वहाँ देख, बोली--- मिल गया, लाला मिल गया।

मैया ने घर के भीतर से ही कहा --- अरी, बोल क्यों रही हो, भीतर ले आ उसे।

गोपी ने लाला को उठाया और खूब प्यार करने लगी।

इस प्रकार श्रीकृष्ण ने उस गोपी की भी इच्छा पूरी की।



मंगलवार, 17 मई 2022

मैया मोरी, मैं नहीं माखन खाएओ।

 सूरदास जी ने श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं के बारे में बहुत कुछ लिखा है।

एक बार लिखते हैं कि…………………

कन्हैया-- मैया! मैया मोरी! मैं नहीं माखन खाएओ।

(श्रीकृष्ण माखन खाते हुए पकड़े गये हैं और अब मैया को मना रहे हैं वैसे तो सारा संसार ही भगवान का है अतः वे कोई वस्तु कैसे चुरा सकते हैं किन्तु लीला है, भक्तों के प्रेम का रसास्वादन करने के लिए। जैसे भगवान तो सर्वज्ञ हैं किन्तु लीला में ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे उन्हें मालूम ही नहीं है। सारी सृष्टि के एकमात्र स्वामी होते हुए भी चोरी की लीला कर रहे हैं बालक की लीला कर रहे हैं।..............

.............एक और बात है कि जिस घर में नन्द-नन्दनन्दन श्रीकृष्ण रह रहे हैं, वहाँ पर श्रीनन्द महाराज जी के 9 लाख गायें हैं जिस बालक के घर पर 9 लाख गायें हों वो भला क्यों माखन चुरायेगा?)

भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों को सुख देने के लिए विभिन्न लीलायें करते हैं

अतः कन्हैया ने कहा-- मैया! ओ मैया! मैंने माखन नहीं खाया। अब तू ही बता कि मैं चोरी कब करूँगा? सुबह-सुबह तो खाना खिला कर मुझे जंगल में भेज देती है, गो-चारण करने के लिए और सारा दिन तो मैं वहीं रहता हूँ मैं भला चोरी कब करूँगा? 

मैया को कोई जवाब न देते देख, श्रीकृष्ण ने दूसरी युक्ति बोली-- मैया, आप ही बताओ, मैं एक छोटा सा बालक हूँ नन्हें_नन्हें मेरे हाथ, इतनी ऊपर छींका लगा हुआ है, उसमें घड़ा है जिसमें माखन रखा है, तो भला मैं कैसे माखन खा सकता हूँ? मैं छींके तक कैसे पहुँच सकता हूँ?

मैया ने कन्हैया के मुख पर लगे माखन की ओर इशारा करते हुए कहा-- अच्छा, लाला ये तेरे मुख पर जो माखन लगा है………।

कन्हैया (भोला सा मुख बना कर) -- मैया, ये तुम क्या बोल रही हो? मेरे सखा लोग बहुत होशियार हैंमुझे फंसाने के लिए मेरे मुख पर ज़बरदस्ती माखन लगा दिया है। आप तो मैया हो, मन से कितनी भोली हो। इन्होंने मेरी शिकायत लगाई है। कहाँ इनकी बातों में आ जाती हो? तेरे को तो ऐसे ही घुमा देते हैं ग्वाल-बाल। इन्होंने मेरे मुख पर माखन लगा दिया और इन्होंने ही शिकायत लगा दी। अच्छा ये ले, गैया को चराने का डंडा, ये ले कम्बल जो तूने मुझे दिया था……इतने से माखन के लिए तू मुझे इतना सता रही है।

मैया हँस पड़ी व बोली-- लाला तू कैसी-कैसी बातें बोलता रहता है और मैया ने अपने लाला को गले से लगा लिया।



गुरुवार, 12 मई 2022

श्रीकृष्ण ने अपने ही घर में से मक्खन को चुराया।

 श्रीकृष्ण जब कुछ बड़े हुए तो घुटनों के बल चलने लगे और कभी-कभी चरणों के बल पर भी चलते।

एक दिन मैया से चोरी-चोरी घुटनों के बल चलते-चलते घर में ही एक कमरे में घुस गए, जहाँ पर ढेर सारा मक्खन रखा हुआ था।

धीरे-धीरे मखन के बर्तन के पास पहुँचे, उसी से सहारे से खड़े हुए और हाथ बर्तन के अन्दर डाल लिया। मक्खन को ऊँगली से निकाला और दरवाज़े से दूसरी ओर मुख करके खा लिया, चुपके से। मुख इसलिए घुमा लिया ताकि कोई उन्हें मक्खन खाते हुए न देख ले।

ऐसे में एक बार मक्खन वाले कमरे में मैया थीं तो नन्हें कृष्ण गोपियों के कमरे में चले गए। वहाँ के दीपकों को बुझाने लगे, जिससे अन्धेरा सा हो गया। चारों ओर फैल रहे इस अन्धेरे को देख मैया भी बाहर चली आईं देखने के लिए कि अन्धेरा क्यों हो रहा है?

इधर बाल-कृष्ण चुपके से माखन वाले कमरे में चले गये और माखन को खा लिया।

फिर तेजी से अपने कमरे के बिस्तर पर आकर लेट गये जैसे कुछ हुआ ही न हो।

एक बार ऐसे ही माखन चोरी करके खाने लगे तो सामने खम्बे की ओर दृष्टि चली गई। श्रीनन्द जी के भवन में सभी खम्बे मणियों से जड़े थे। उन मणियों से प्रकाश आता था जिससे कमरे में रोशनी रहती थी। उन मणिमय खम्बे में श्रीकृष्ण ने देखा अपना प्रतिबिम्ब। वैसे तो जानी-जान हैं! सब कुछ जानते हैं! फिर भी बालक की लीला कर रहे हैं>

अपनी छाया को देखकर कहने लगे-- तुझे तो मैं जानता हूँ, शायद। ले तू भी मक्खन खा ले।

जब उस छाया ने मक्खन नहीं खाया तो कहने लगे-- अच्छा, कोई बात नहीं, मेरी मैया को नहीं बताना कि मैं मक्खन खा रहा था, नहीं तो वो मुझे बहुत डाँटेगी।