श्री कृष्णचैतन्य महाप्रभु इस जगत के सर्वोच्च कल्याण की इच्छा से इस जगत मे अवतीर्ण हुए | श्री कृष्ण ने व्रज में विचार किया
चिरकाल नाहि करि प्रेमभक्ति दान |
भक्ति बिना जगतेर नाहि अवस्थान || (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि, 3,14)
भक्ति बिना जगतेर नाहि अवस्थान || (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि, 3,14)
मैंने चिरकाल से प्रेम भक्ति का दान नहीं दिया किया और भक्ति के बिना इस भौतिक जगत का कोई उपयोग नहीं है |
सकल जगते मोरे करे विधि-भक्ति |
विधिभक्तये ब्रजभाव पाइते नाहि शक्ति || (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,15)
समस्त जगत मेरी विधि भक्ति करता है | परन्तु विधि -भक्ति में व्रज भाव को प्राप्त करने की शक्ति नहीं है |
एश्वर्य ज्ञानेते सब जगत मिश्रित |
एश्वर्य-शिथिल-प्रेमे नाहि मोर प्रीत || (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,16)
सम्पूर्ण जगत के लोग मेरे ऐश्वर्य को जानकर, ईश्वर बुद्धि से मेरी आराधना करते है किन्तु ऐसी भक्ति मुझे अपनी ओर आकर्षित नहीं करती ।
एश्वर्यज्ञाने विधि-भजन करिया |
वैकुण्ठके याय चतुर्विध मुक्ति पाञा || (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,17)
वैकुण्ठके याय चतुर्विध मुक्ति पाञा || (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,17)
एश्वर्यज्ञान से विधि भक्ति का भजन करके साधक चार प्रकार की मुक्ति को पाकर वैकुण्ठ में जाता है |
युगधर्म प्रवर्ताइमु नामसंकीर्तन |
चारि भाव-भक्ति दिया नाचामु भुवन || (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,19)
चारि भाव-भक्ति दिया नाचामु भुवन || (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,19)
मैं नामसंकीर्तन रूपी युगधर्म का प्रवर्तन करूँगा और चारो रस प्रदान करने वाली प्रेम भक्ति देकर इन जगत वासियों को प्रेम-भाव में नचाऊँगा |
आपनि करिमु भक्तभाव अंगीकारे |
आपनि आचरि' भक्ति सिकाइमु सबारे || (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,20)
मैं स्वयं भक्तभाव अंगीकार करके अपनी ही भक्ति का स्वयं आचरण कर, सबको भक्ति की शिक्षा दूँगा |
युगधर्म-प्रवर्तन हय अंश हैते |
आमा बिना अन्ये नारे ब्रजप्रेम दिते || (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,26)
आमा बिना अन्ये नारे ब्रजप्रेम दिते || (श्री चैतन्य चरितामृत, आदि 3,26)
युगधर्म का प्रवर्तन मेरे अंशावतार द्वारा भी हो सकता है किन्तु व्रजप्रेम को मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं दे सकता है |
इस तरह से विचार करके युगावतार श्रीनारयण, श्री कृष्ण मे प्रविष्ट होकर नदिया में श्री कृष्णचैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए | युवावस्था की लीलायों में उन्होने ने जगत को भक्ति रस से भर दिया और शेषलीला में उनहोंने श्री कृष्ण के सम्बन्ध में बताकर सम्पूर्ण विश्व को धन्य कर दिया - श्रीकृष्ण जानाये सब विश्व कैल धन्य ।
अनर्पितचरीं चिरात्त करुणयावतीर्ण: कलौ
समर्पयितु मुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम।
हरि: पुरटसुंदरद्युतिकदम्बसंदिपित:
सदा हृदयकन्दरे स्फुरतु व: शचीनंदन:॥
सुवर्णकांति से दैदीप्यमान वे श्री शचीनंदन गौरहरि, तुम्हारे हृदय में स्फूर्ति प्राप्त करें, जो सर्वोत्कृष्ट उज्जवलरस जिसे जगत को कभी दान नहीं किया था, को स्वभक्ति -रूप सम्पति के रूप में दान करने के लिए कलिकाल में अवतीर्ण हुए हैं |
स्व भक्तेभ्य: शुद्धं निज-भजन-मुद्रम उपदिशं।
उन्होंने अपने भक्तवृन्द को अपनी दिव्य भक्ति का उपदेश दिया | (श्री चैतन्य चरितामृत आदि, 3,66)
उपदिशन अर्थात उपदेश और मुद्रा अर्थात विशेष भाव या चिन्ह | इस तरह महाप्रभु मे एक वशिष्ट विशेषता है कि उन्होंने अपने भक्तों को शुद्व भक्ति का उपदेश दिया | श्रीश्री गौर-गदाधर के विग्रहों में श्रीमन्महाप्रभु के दाहिने हस्त की विशेष मुद्रा स्वयं की विशुद्व रसमय भक्ति का उपदेश दे रहे है - निज भजन मुद्रामुपदिशं।
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| भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु |
उक्त श्लोक के प्रारम्भ में 'अनर्पितचरीं चिरात्त, उन्नतोज्ज्वरसां स्वभक्तिश्रियम' अति महत्वपूर्ण हैं, अर्थात जिस सर्वोत्कृष्ट उज्ज्वल- रस , जो की इसके पूर्व, अन्य किसी अवतारों में इस प्रकार की दया का प्रकाश कर प्रदान नहीं किया गया।
