एक दिन की बात है, हमारे नन्द लाल श्रीकृष्ण मैया के आगे ज़िद करने लगे कि मैया मैं तो चाँद लूँगा। मुझे तो वही खिलौना चाहिये।
मैया चुप हो जाती है। बाल कृष्ण ने कहा- मैया, अगर आपने मुझे ये चाँद खिलौना लाकर नहीं दिया तो मैं अभी ज़मीन पर लोट-पोट होने लग जाऊँगा। और तेरी गोद मैं भी नहीं आऊँगा। देख ले, मैं ये गाय है, उसका दूध भी नहीं पीऊँगा। अगर मुझे चन्द्रमा खिलौना नहीं ला कर दिया तो मैं तेरा लाला नहीं कहलाऊँगा, मैं तो बाबा का लाला कहलाऊँगा।
मैया अपने लाला की भोली-भाली बातों पर मन ही मन मुस्कुराती रही। फिर बोली- सुन, लाला। सुन मेरी बात। मेरे पास आ, यह बात मैं तेरे दाऊ भैया को भी नहीं बोलूँगी। देख एक बात है, तेरे लिए मैं नई दुल्हन लेकर आऊँगी। (श्रीकृष्ण के ध्यान को हटाने के लिए मैया ऐसा बोलने लगी दाऊ को नहीं बताना।)
(वैसे तो अन्तर्यामी भगवान को कौन भटका सकता है किन्तु बाल्य लीला के रस के आनन्द के लिए भगवान ऐसे बनने लगे कि उनका ध्यान भटक गया है।)
बोले- माँ तेरी कसम। मेरा ये काम कर दे। मैं अभी शादी के लिए जाने के लिए तैयार हूँ।
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